अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली

मुख पृष्ठ
03.18.2014

बूँद-बूँद आकाश
डॉ. गौतम सचदेव
045

दोहे पर मोहे

दिल्ली में डौड़ी पिटी राजा का ऐलान।
मौत हुई संगीत की भेजी क़ब्रिस्तान॥
सरगम का घोंटा गला ख़ुश था औरंगज़ेब।
दिल्ली थर-थर काँपती टूट गई पाज़ेब॥
फिर भी कविता आ जमी राजमहल में ख़ास।
जैसे पत्थर फोड़कर उगते पीपल घास॥
उपमाओं को मिल गया सुरभित मन आगार।
सरस्वती का भक्त था जेठा राजकुमार॥
नित्य मुअज़्ज़म के यहाँ सजता कवि दरबार।
दोहे पद चौपाइयाँ गीतों की ज्यौनार॥
आलम कवि रचना निपुण करता रस-विस्तार।
महलों में जिससे बही प्रेमानन्द बयार॥
कवितामय प्रासाद में रचते अद्भुत छंद।
जैसे उपवन में उड़े नित्य नया मकरंद॥
दिल्ली भी सुन राग वह रस से हुई विभोर।
बाज़ारों में नाम की चर्चा थी हर ओर॥
एक वहीं बाज़ार में महिला थी रँगरेज़।
रँगने में जितनी कुशल रचना उतनी तेज़॥
आलम से कम थे नहीं उसके प्रेम-कवित्त।
नाम भले था शेख पर कामिनियों-सा चित्त॥
ग्राहक थे उसके सभी दरबारी उमराव।
चतुर मधुर उत्साह से करती थी बरताव॥
सरदी बीती जब लगा वासन्ति मधुमास।
पगड़ी रँगने के लिए आई उसके पास॥
पगड़ी किसकी शेख़ ने पहचानी तत्काल।
लेकिन उसकी खूँट में पाया एक सवाल॥
"कनक छरी-सी कामिनी काहे को कटि छीन।"
शंका आलम की पढ़ी शेख़ हुई तल्लीन॥
आलम विस्मित क्यों हुए लखकर नारी रूप?
यह शंका है पुरुष की आदिम और अनूप॥
आलम ने कल्पित किया "कनक छरी" उपमान।
मुझस पूछा या नहीं कर पाये संधान?
नारी तन सोना अगर कहाँ कमर का भाग?
विधना ने रक्खा नहीं ख़र्च किया बेलाग॥
यह तो उसमें ही छिपा लिया शेख़ ने सोच।
पीन पयोधन कर दिये भरी कमर में लोच॥
कनक छरी-सी कामिनी काहे को कटि छीन?
"कटि को कंचन काट विधि कुचन मध्य धरि दीन"॥
पगड़ी में दोहा छिपा दिया शेख़ ने भेज।
मानो देखा ही नहीं ऐसे दिया सहेज॥
रँगरेज़िन ने कर दिया मानो कायाकल्प।
आलम को पगड़ी मिली समय लगा अत्यल्प॥
देख अचानक छंद तब हुए बहुत हैरान।
आधा ख़ुद ही था धरा भूला था यह ज्ञान॥
रचना पढ़ते ही हुए कविवर हर्षोन्मत्त।
फिर-फिर कर गुणगान वे रह न सके स्वायत्त॥
रँगरेज़िन ने कर दिया क्या अद्भुत बदलाव।
आधा आधे से मिला शतगुण हुआ प्रभाव॥
उठ भागे उन्माद में रँगरेज़िन के द्वार।
बोले मैं दिल-जान से तुम पर हुआ निसार॥
दोहा मृत पैदा हुआ तुमने डाली जान।
स्वर्ण सुगंधित कर दिया चमत्कार प्रणिधान॥
शर्मिंदा मत कीजिए मुश्किल हो आसान।
सोचा कुछ सेवा करूँ चिंतित लख श्रीमान॥
दिल में अब तो हो गया सजनि तुम्हारा वास।
प्रतिभा के आगे हुआ नतशिर मैं अनुदास॥
रँगरेज़िन हूँ क्या कहूँ छंद नहीं अनुप्रास।
तुकबंदी ही बस बनी मुझसे कुछ सायास॥
आलम ने ज्यों-ज्यों सुना और बढ़ा अनुराग।
शेख़ हृदय में बस गई ज्यों दीपक में आग॥
तब कविता का रंग से हुआ अनोखा मेल।
मानो गुंजित हो गई कुसुमित सुषमा बेल॥
कवि की सागर से गहन उन्मन गहरी चाह।
रँगरेज़िन से कर लिया उसने प्रेम-विवाह॥
दोनों मिलकर प्रेम से रचते पद संयुक्त।
जैसे वीणा तार से रागयुक्त उन्मुक्त॥
इक रचना सन्तान की दोनों ने की और।
वे "जहान" कहते जिसे अपना प्रिय सिरमौर॥
शहज़ादे ने एक दिन गहरा किया मज़ाक।
गुट्ठल चाकू से यथा काट रहा था नाक॥
"आलम की औरत हुईं क्या सचमुच में आप?"
बोली पर धीरज सहित शेख़ बिना सन्ताप॥
"जी हाँ मैं माता वही जिसका पुत्र जहान"।
उत्तर सुन गौरव भरा शहज़ादा हलकान॥
पर नारी से कीजिए आदर से व्यवहार।
सिद्ध किया यह शेख़ ने करके प्रत्याहार॥
राजा का सह जाइए चुपके तिक्त मज़ाक।
मत आगे से कीजिए कोई तूम-तड़ाक॥
कवियों पर होती नहीं पर लागू यह बात।
रखते निज सम्मान वे कर गहरा प्रतिघात॥


अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें