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03.03.2014

बूँद-बूँद आकाश
डॉ. गौतम सचदेव
044

बूँद-बूँद आकाश

मुक्तक

दीप का सत्संग करके फूल मुरझाने लगे
शोर जय-जयकार सुनकर कलश उकताने लगे

जगत् का मालिक मगर इनसान पर निर्भर हुआ
पूजता है भक्त पर भगवान् तो पत्थर हुआ

आँसुओं से यह न पिघलेगा नहीं सन्ताप से
देवता पत्थर बना है आदमी के शाप से

रह नहीं जाये पड़ा बेघर कहीं भगवान
इसलिए मन्दिर बनाता है सदा इनसान

घास मज़हब की बनाई आदमी ने लाल
आदमी ही ओढ़ता है जानवर की खाल

कलश सोने का रुपहला आरती का थाल
भीख माँगें मंदिरों के द्वार पर कंगाल

पूछता रोकर ख़ुदा से इक नया दरवेश
क्यों न नोटों पर छपे होते तिरे उपदेश?


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