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03.18.2014

बूँद-बूँद आकाश
डॉ. गौतम सचदेव
043

सुख-समय के पेड़ से कुछ पल

सुख-समय के पेड़ से कुछ पल
मिले क्या फल
कि पतझड़ हो गया
सिक्त पिघले मोतियों से मन
भरा आँगन
कि अम्बर रो गया
स्वप्न खिलते रात की रानी बने क्यों
दिन मिले थे तुहिन-रस सागर सने क्यों
छल गया लोना गगन घन रूप
मुग्धा धूप
मौसम सो गया
पवन का आँचल सुगंधित रूप महिमा
स्निग्ध सिहरा स्पर्श जैसे थी मधुरिमा
मौन है सुरभित सुध संगीत
आशातीत
मधुवन खो गया


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