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03.18.2014

बूँद-बूँद आकाश
डॉ. गौतम सचदेव
042

ख़ाक ने हमको पुकारा

ख़ाक ने हमको पुकारा ढुलक पत्तों से चले
कोयला है राख लेकिन शान से कितना जले

पाओगे मंज़िल न तुम संसार कहता है हमें
ढूँढ़ कर तुम क्यों हमेशा रास्ता अपना चले

पत्थरों का दोष क्या है वे अगर बेदर्द हैं
ज़ुल्म सहते हैं सभी के ठोकरों में है पले

आदमी झुकता रहे तो बात डर की है ज़रा
पैर पकड़े जो वही उठकर पड़ा करता गले

पास होने से नहीं होतीं कभी नज़दीकियाँ
दूर होने पर न होते हैं हमेशा फ़ासले

डालते हैं अब कुएँ में साथ नेकी के उसे
काम जो इनसान बनने के लिए करता भले

दीजिए उनवान यह तस्वीर मेरी गर छपे
होम करने से हमेशा हाथ इसके हैं जले


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