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03.18.2014

बूँद-बूँद आकाश
डॉ. गौतम सचदेव
041

हीरों की माला फेरत हैं

हीरों की माला फेरत हैं प्रभु के पक्के भक्त गुसैयाँ
राजनीति से धरम जुड़ावत नेता नित्य दबावत पैयाँ

फुटपाथों पर रेंगत प्यासे इनसानी शक्लों के कीड़े
गंदे नालों पर पलती हैं ये भूखी तरसी लरिकैयाँ

जीने का हक़ गोपालों से माँगें तन चुसवातीं माएँ
खाल उधड़वाने को बैठी सड़कों या घूरों पर गैयाँ

लोकतन्त्र मतदाताओं पर बार-बार उपकार करत है
निर्वाचन आने पर समझे लोगों को निज लोग-लुगैयाँ

पापों से पाप कटत हैं ज्यों लोहे को काटत लोहा
पाप ज़रूरी हैं जीवन में ठलुए काहे करत रिसैयाँ

काला धन अति पावन होवत राम भजन घनश्याम भजन से
काला धन उजले का संगी धूप संग ज्यों रहती छैयाँ

हाथ उठाकर गाँधी की यह मूरत ख़ुद संकेत करत है
पाँच गुणा जो लूटे सबको दुनिया उसकी लेत बलैयाँ

महलों की है दया कि उनकी छाया में पलतीं झोंपड़ियाँ
शहरों के उदरों के बल पर फलतीं गाँवों की अमरैयाँ

चीरहरण होवत है खुलकर हर घाटी की हरियाली का
बेचत वनदेवी की इज़्ज़त उसके नवल युधिष्ठिर सैयाँ

पहचानी सूरत को भी अब पहचानें तो डर लागत है
क्या जाने धोखा हो कोई या फिर कोई भूल-भलैयाँ


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