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05.03.2012
बूँद-बूँद आकाश
डॉ. गौतम सचदेव
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परिंदे दरख़्तों का दुख जानते हैं
डॉ. गौतम सचदेव


परिंदे दरख़्तों का दुख जानते हैं
जड़ों में दबा दर्द पहचानते हैं

बुलंदी अगर कल्पना हो तो क्या है
गगन हम ख़यालों का घर मानते हैं

नहीं जानते हम कहाँ पर ख़ुदा है
है दिल आदमी का जहाँ जानते हैं

फ़रिश्ते बनें या वे मज़हब चलाएँ
मगर बैर दुनिया से क्यों ठानते हैं

सितारे नहीं मिल सके दोस्तों को
मिली है धरा तोड़ना जानते हैं

लिया है गगन इन भुजाओं में हमने
गले जब लगें वे यही मानते हैं

मिलेंगे कहाँ ख़ाक में जानने को
बहुत ख़ाक दर-दर की हम छानते हैं


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