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05.03.2012
बूँद-बूँद आकाश
डॉ. गौतम सचदेव
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ताकती हैं पर किसी का क्या करें नुक़्सान आँखें
डॉ. गौतम सचदेव


ताकती हैं पर किसी का क्या करें नुक़्सान आँखें
देखकर ये हुस्न पर करतीं न कम अहसान आँखें

दर्द के खंडहर पर तैनात हैं दरबान आँखें
दिल उजड़ने पर मगर चश्मा बनें सुनसान आँखें

आस हो तो जोड़ती हैं टूटने वाले जिगर को
तोड़ देती हैं भुला दे जो कभी पहचान आँखें

मुश्किलें पैदा करें गर मन समंदर में न डूबें
डूबने पर मुश्क़िलें करती नहीं आसान आँखें

देखते रहना हमेशा उम्र भर की यह सज़ा है
है जलावतनी अगर हो जाएँ रेगिस्तान आँखें

शक़्ल पूरी देखना होता नहीं बिल्कुल ज़रूरी
देख ली जाएँ महज़ मुख की अगर उनवान आँखें


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