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05.03.2012
बूँद-बूँद आकाश
डॉ. गौतम सचदेव
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मुक्तक
डॉ. गौतम सचदेव


आपस में न फूलों ने सभी दर्द हैं बाँटे
कुछ पास थे दुखते हुए बदनाम ये काँटे
कर ज़ख़्म इरादों में व यादों में समाये
ख़ुद मेरे लिए ख़ास ये तक़्दीर ने छाँटे

लम्हे भी निकलते हैं कुछ वक़्त से बचकर
सूखे हुए आँसू रहें यादों में पिघलकर
तब दर्द का मौसम न गुज़रता है दिलों से
अहसास भी बच जाय है काँटों में बदलकर

बीज याद के चुपके दिल में उगते बिन बोये-से
चाहत के अंकुर सिहराये सपनों के धोये-से
छुआ न जाने किस आँचल ने छुई-मुई बन बैठे
तितली मन की खोज रही पल फूलों में खोये-से

सुबह-सुबह खिल गई यादों की कली
पूरी नहीं घुली अभी चंदा की डली
आँखों की डिबिया में रुनझुन-सी किरणें
मन की गुड़िया नहीं परचे मनचली

कट गया पल इक ख़ुशी का कतरनें बिखरी पड़ी हैं
कौन पतझड़ रोक पाया पत्तियाँ फिर-फिर झड़ी हैं


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