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05.03.2012
बूँद-बूँद आकाश
डॉ. गौतम सचदेव
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चढ़ी लंदनी धूप ओढ़े लबादा
डॉ. गौतम सचदेव


चढ़ी लंदनी धूप ओढ़े लबादा
बदलता रहे नित्य उसका इरादा

निकलती कभी यह फटेहाल दुखिया
कभी बाप उसका दिखे रायज़ादा

दबे पाँव आ छेड़ती वह बगीचे
बने दो मिनट में सड़कछाप दादा

कभी काटती चुटकियाँ यह किशोरी
कभी गर्भिणी-सी पड़ी सुस्त मादा

कभी तोड़ बन्धन चली बादलों से
महाजन-सी लग जाय करने तगादा

चुभे बावली-सी सभी की नज़र में
कटे जंगलों का पड़े ज्यों बुरादा

कभी उम्र छोटी कभी छाँव लम्बी
चमक ऊपरी और ठंडक ज़ियादा

उघाड़े बदन को बहुत नस्ल गोरी
न फ़रज़ी बने देख उसको पियादा

सवेरे दुपहरी या फिर शाम को ही
कहाँ पर मिलेगी करे यह न वादा


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