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05.03.2012
बूँद-बूँद आकाश
डॉ. गौतम सचदेव
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चाकू दिन के घायल रातें
डॉ. गौतम सचदेव


चाकू दिन के घायल रातें
बात नहीं कुछ फैलीं बातें

ओंठ बिना सब कहतीं आँखें
क़लम बिना क्या करें दवातें

खेल दिलों का शह वादों की
प्रेम बिछाता रहा बिसातें

लाज बची ख़ुद ही आँखों की
पलकों की तन गईं कनातें

बादल दिल में क्यों घिरते हैं
बिना मौसम होतीं बरसातें

स्वागत में बिछतीं ये कैसे
यादों की फट गईं बनातें

इंतज़ार पीड़ा ख़ामोशी
पढ़ लीं दिल ने तीन जमातें


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