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05.03.2012
बूँद-बूँद आकाश
डॉ. गौतम सचदेव
018

छेड़ते हो ख़्वाब क्यों
डॉ. गौतम सचदेव


छेड़ते हो ख़्वाब क्यों फिर-फिर पुरानी बात ज़ख़्मी
याद अब सो जा ज़रा करवट बदल ले रात ज़ख़्मी

चाँद के मुँह फेरते ही चाँदनी ने खुदकुशी की
बिन लिये डोली चली तारों भरी बारात ज़ख़्मी

कोई ख़ंजर फेरता तब तो शिकायत भी सही थी
फेरते ही मुँह किसी के हो गये जज़्बात ज़ख़्मी

आह ओंठों से बिछुड़ कर दर्द की दुश्मन हुई थी
भीगती पलकें न जानें क्यों हुईं बेबात ज़ख़्मी

खो गये लम्हे कहीं जो आपसे मिलकर मिले थे
वक़्त भी करके गया है याद की सौग़ात ज़ख़्मी

दूर था मौसम मगर अरमान थे पलकें बिछाये
रास्ते सूने रहे उम्मीद में हालात ज़ख़्मी

चोट लगती है हमेशा उस जगह जो दुख रही हो
साज़ छिड़ने से बहुत पहले हुए नग़्मात ज़ख़्मी


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