अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली मुख्य पृष्ठ
05.03.2012
बूँद-बूँद आकाश
डॉ. गौतम सचदेव
017

छीन कर दीपक हमारे
डॉ. गौतम सचदेव


छीन कर दीपक हमारे क्यों अँधेरे दे रहे हो
रात जैसी सूरतों के क्यों सवेरे दे रहे हो

छीन कर पर्वत नहीं दे पाये तुम झरना ज़रा-सा
रेत में यह किस लिए मृगजल उकेरे दे रहे हो

घोंसला उम्मीद का हरगिज़ न तिनकों से बनेगा
क्यों तसल्ली के निरे कच्चे मुँड़ेरे दे रहे हो

साँप ज़हरीले नहीं कम पालती हैं आस्तीनें
बाँबियों को दोष क्यों चातुर सँपेरे दे रहे हो

सभ्यताओं ने खिलाये फूल हैं इनसानियत के
क्यों उन्हें हैवान के आगे बिखेरे दे रहे हो


अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें