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05.03.2012
बूँद-बूँद आकाश
डॉ. गौतम सचदेव
016

चाँद दिखता है सदा बीमार
डॉ. गौतम सचदेव


चाँद दिखता है सदा बीमार दुबला-सा हमें
क्रॉस पर लगता चढ़ाया एक पुतला-सा हमें

फूल या पत्थर न था यह जो बिछाया ही गया
ख़ास फिर क्यों दिल मिला है ख़ूब कुचला-सा हमें

दोस्ती में वे हमेशा शब्द मीठा ही कहें
पर लगे बरताव कड़ुवा एक जुमला-सा हमें

हाथ की सारी लकीरें और भी ज़ाहिर हुईं
दिख रहा लेकिन मुक़द्दर आज धुँधला-सा हमें

आफ़तों की चाह रख इतरा रहा दिल क़ैद में
यह डुबो देगा अवश तालाब उथला-सा हमें

काटते हैं रात काली हम इसी उम्मीद में
कल मिल शायद सवेरा एक उजला-सा हमें


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