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05.03.2012
बूँद-बूँद आकाश
डॉ. गौतम सचदेव
015

चली जा रात लेकर चुप्पियाँ
डॉ. गौतम सचदेव


चली जा रात लेकर चुप्पियाँ दिल में अँधेरों की
सुनेगा कौन तेरी दास्ताँ होगी सवेरों की

न पानी और मौसम याद रखते दर्द के रिश्ते
दरख़्तों ने धरोहर कब सँभाली है बसेरों की

अकेले को सहारा दे सकी है रात कब कोई
ग़ुलामी से न फ़ुर्सत पा सके वह धन-कुबेरों की

ज़हर के दाँत रखकर भी न समझा साँप कुछ कोई
भला ज़ाहिर करेगी बीन क्या नीयत सँपेरों की

मिलेंगे मुस्कुराकर और वे देंगे दुआएँ भी
न रस्मों में रहा अब फ़र्क़ सन्तों या लुटेरों की

उजाला रोज़ खिलता है निराले रंग-रूपों में
मगर क्यों डबडबायी ही मिलें आँखें सवेरों की


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