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05.03.2012
बूँद-बूँद आकाश
डॉ. गौतम सचदेव
014

ख़ूबसूरत क्या दिखी बीमार
डॉ. गौतम सचदेव


ख़ूबसूरत क्या दिखी बीमार भी दुनिया दिखी
चाकुओं के पहनई ख़ुद हार भी दुनिया दिखी
पागलों की जंग की ललकार भी दुनिया दिखी
ख़ुद बनाये जाल में लाचार भी दुनिया दिखी
ख़ाक बनकर रह गई है रूह रहकर ख़ाक में
टूटता मंदिर गिरी मिनार भी दुनिया दिखी
दुश्मनी के जोश से पागल हुई है जश्न में
गोलियों से छिद चुका त्योहार भी दुनिया दिखी
तंदुरुस्ती तन व मन की बिक रही पुड़िया बनी
कुल हकीमों की दवा बेकार भी दुनिया दिखी
आदमी से देवता तक सज गये है माल में
बेचने को जान तक तैयार भी दुनिया दिखी
साथ यह इनसानियत के रोज़ मुँह काला करे
नाम नाटक का मगर अभिसार भी दुनिया दिखी
पूजने को झूठ की प्रतिमा बने मन्दिर नये
है बड़ी मासूम पर मक्कार भी दुनिया दिखी
आदमी को देखकर वह क्यों न शरमाये भला
जानवर को रहमदिल ख़ूँख़्वार भी दुनिया दिखी
हर सुरक्षा के नये हथियार खोजे जा रहे
बंदरों के हाथ में तलवार भी दुनिया दिखी


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