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05.03.2012
बूँद-बूँद आकाश
डॉ. गौतम सचदेव
011

कुम्हलाये गीतों के मुखड़े
डॉ. गौतम सचदेव


कुम्हलाये गीतों के मुखड़े उलझ गये वीणा के तार
चंदा के माथे पर बिंदिया लगती है ख़ूनी मल्हार

साँझ विषैली विधवा रातें
जा सोई सपनों की बातें
कोयल की हर कुहू-कुहू में सुन पड़ता बस हाहाकार

रीता सावन मेघ पराये
आस भिखारिन नित बिक जाये
मिलन नहीं था उठ आई थी प्यासी काँटों की दीवार

नीड़ जले क्या कुछ जल जाये
तिनका कितना बैर कमाये
राख कहो मत जिसके दिल में तड़पे थे पागल अंगार


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