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05.03.2012
बूँद-बूँद आकाश
डॉ. गौतम सचदेव
009

आशाएँ सोने के सिक्के
डॉ. गौतम सचदेव


 आशाएँ सोने के सिक्के बटुआ फटा उमर का
होती है अनमोल मगर है कौड़ी मोल सिफ़र का

क्या जीवन पानी है क़िस्मत क्या होती लहरों-सी
नाता है अपना जग से बस कश्ती और भँवर का

भीड़ बढ़े मुर्दा यादों या दुख की झोंपड़ियों की
होता दिल का हाल वही जो होता किसी शहर का

जिस्मों के छू जाने पर भी दूरी बनी रहेगी
यों नज़दीकी है छू जाना केवल एक नज़र का

जान डालना सीख न पाये लेने को हाज़िर हैं
फ़र्क़ मिटाया इनसानों ने आफ़त और कहर का

आज़ादी की ख़ातिर वे टकराये थे शोलों से
लाखों की क़ुरबानी को क्यों देते नाम ग़दर का

दौड़ लगाता जुत कर मन से हिरन साँस का तन में
पिंजरे में भी कितना ख़ुश है क़ैदी चिड़ियाघर का

अरमानों के बादल करते सपनों की बरसातें
मुरझाया दिल पथराता जब दर्द मिले बंजर का

दीमक बाँबी-से फैलें दुख सुख के ताश महल में
छीज गया अपने काँटों से बाना मन-चीवर का

सागर में ममता की गोदी क्या पायेगी कश्ती
सौतेला रिश्ता भी तोड़ें लहरें उठ लंगर का

प्यार मिले तो खिलती कलियाँ किरणों की तन मन में
याद प्यार बिन बनती पत्थर जीवन की काँवर का

सीस नवाया जितना ही सिर चौखट से टकराया
क्या मिलता मन्दिर से दिल को देव बना पत्थर का

फूलों का दिल छेद पिरोई ख़ुश्बू रंग-बिरंगी
दर्द न समझा कुचला पगों से पत्तों के मर्मर का


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