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05.03.2012
बूँद-बूँद आकाश
डॉ. गौतम सचदेव
010

कुछ दर्द ख़ास होने दो
डॉ. गौतम सचदेव


कुछ दर्द ख़ास होने दो
मिलकर उदास होने दो

होशो-हवास खोने दो
टूटा गिलास होने दो

है वक़्त लूटता पल-पल
अब आसपास होने दो

फिर याद को कसकने दो
चुभती मिठास होने दो

यह रात बाँसुरी-सी है
रस और रास होने दो

दोहे बनेंगे अधरों के
अन्त्यानुप्रास होने दो

ओंठों के जुर्म से मिलकर
मुजरिम न प्यास होने दो

हँस गुदगुदी करें बूँदें

भीगा लिबास होने दो
है रात सर्द अँधियारी

लिपटा उजास होने दो
कच्ची हैं चाह की कलियाँ

खिल अमलतास होने दो

हर फूल एक आँसू है
होगा क़यास होने दो

कुछ मौन शब्द पलकों के
अब उपन्यास होने दो


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