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05.03.2012
बूँद-बूँद आकाश
डॉ. गौतम सचदेव
007

आज का दिन है अँधेरे में
डॉ. गौतम सचदेव


आज का दिन है अँधेरे में ढला तो सकल उजले कल, गये क्या?
देव वरदानों सरीखे मधुर बचपन के सुहाने पल, गये क्या?

क्या ख़ज़ाने आँसुओं के सिर्फ़ नक़ली थे वचन थे सिर्फ़ झूठे
सामने बैठे रहे मुस्कान के भंडार बनकर छल गये क्या?

हम नहीं कुछ साथ लाये थे धरा पर श्वास के विश्वास ही थे
साथ धड़कन भी अगर ये छोड़ जाये आस के सम्बल, गये क्या?

छोड़ दी ज्वार में अपनी तरी लंगर बनेंगी आज लहरें
क्यों रहें इस पार केवल पूछते तूफ़ान संकट टल गये क्या?

चाँदनी के फूल लाने जो चले थे कल्पवृक्षों से रुपहले
आँसुओं को लूट वे गुदड़ी फटी में छोड़कर सेमल, गये क्या?

झोंपड़ों पर तनिक छाजन ही बना दें बीन महलों से उजाला
आदमी पहचान ले औक़ात अपनी वे विनय कौशल, गये क्या?

ज़िंदगी के सूखते तट पर जमा कीं सिर्फ़ थोड़ी सीपियाँ ही
रौंद कर जाते समय क्यों पूछते हो टूट मुक्ताफल, गये क्या?

तोड़कर दर्पण समय ने प्यार में किस शौक़ से किरचें बनाईं
पाँव ज़ख़्मी देख फाहे पंखुड़ी जैसे बनें आँचल, गये क्या?

कौन-सी धूनी न जाने यह धरा जोगन रमाये जा रही है
जो प्रिया तक ले गये थे यक्ष के संदेश वे बादल, गये क्या?


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