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05.03.2012
बूँद-बूँद आकाश
डॉ. गौतम सचदेव
006

अढ़ैये
डॉ. गौतम सचदेव


रात की जागी सुबह मुँद गई कली
फीकी-सी बुझी घुली चाँद की डली
आज दिन का बदन गरम है।

कमसिन बिटिया थी झट लगी हल्दी
पेड़ों को पड़ती है पतझड़ की जल्दी
माँ-बाप भी ज़ालिम होते हैं।

जवानी में फूलों के तेवर कँटीले
उड़ीं तितलियाँ लुट गये हैं रसीले
क्या वे वेश्याएँ थीं?

समस्या से हुई शादी उसी के संग रहना है
हमीं ने उलझनों के बाजुओं का हर पहना है
सवाल तभी तो पैदा हुए।

रात हुई तो चुपके कोई हमदर्दी टपकाता है
हरे-हरे ज़ख़्मों पर गीले फाहे रखता जाता है
घूरे पर फिंके नाजायज़ बच्चों पर भी।

आग से आग लड़ी मौत का कुआँ
उस तरफ़ त्रास इधर ज़हरीला धुआँ
गीता से रहित हुआ महाभारत।

चलो यादें जमा कर दें बचाकर बैंक खातों में
इन्हें रखना ज़रूरी हो गया रिश्तों व नातों में
तलाक़ होने पर बच्चों के काम आयेंगी।

आँख से टपके नहीं दिल में दबे मजबूर आँसू
चाँद मिट्टी में मिलाते पोंछकर सिंदूर आँसू
क्या ये हैं जंग के तारे और तमग़े?

लहर उमड़ी या ठुमकते शौक़ ने हँसकर पुकारा
दिल हुआ कश्ती मगर नित छूटता जाये किनारा
नारी फ़ैशनों की मारी।

तुम मुलम्मों पर फ़िदा दुश्मन दुलारे हो गये
हम तुम्हारे हों न हों पर तुम हमारे हो गये
भारत का रुख़ अमरीका की तरफ़।


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