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05.03.2012
बूँद-बूँद आकाश
डॉ. गौतम सचदेव
004

चाँदनी रुस्वा हुई दीवार पीछे
डॉ. गौतम सचदेव


चाँदनी रुस्वा हुई दीवार पीछे
आदमी लगते रहे ख़ूँख़्वार पीछे

आग पकड़ी किस तरह पूरे जहाँ ने
एक चिनगारी गिरी मीनार पीछे

खाद है बारूद की कमसिन जड़ों में
टहनियाँ बन जाएँगी अंगार पीछे

भेड़ महजब की दिखे निर्दोष कितनी
भेड़ियों की फ़ौज है तैयार पीछे

क्या मिली जन्नत उन्हें दीवानगी में
छोड़ कर दुनिया गये बेकार पीछे

रोशनी देतीं ख़ुदाओं की किताबें
जिल्द पर भोंकी गई तलवार पीछे

हो गये तहज़ीब को नासूर कितने
ख़ून छलके हर ख़ुशी-त्योहार पीछे

टूट जाने दो बुतों को आज ’गौतम’
दिख सकें मुँह सब छिपे बीमार पीछे

(न्यू यॉर्क स्थित वर्ल्ड ट्रेड सेंटर के विध्वंस से प्रेरित)


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