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05.03.2012
बूँद-बूँद आकाश
डॉ. गौतम सचदेव
002

भीड़ में भटका हुआ अनजान हूँ
डॉ. गौतम सचदेव


भीड़ में भटका हुआ अनजान हूँ
मैं न पहचाना गया इनसान हूँ

ज़िंदगी की रेल से फेंका गया
जंगलों में गुमशुदा सामान हूँ

दे न पाया घूस मैं भगवान को
पर पुजारी मैं न ’बे-ईमान’ हूँ

मैं न जीवन भर अदा हो पाऊँगा
उम्र का बढ़ता हुआ तावान हूँ

मैं मुलाज़िम हूँ बिना तनख़्वाह का
दर मुक़द्दर के खड़ा दरबान हूँ

आँसुओं की क़ैद से भागी हुई
मेह्‍रबानी चाहती मुस्कान हूँ

हूँ बड़ा मजबूर लावारिस पड़ा
शहर का इक हाशिया सुनसान हूँ

तोड़कर जब भी क़लम लिखने लगा
बस बना केवल ग़लत उनवान हूँ

दर्द मजबूरी ग़रीबी बेबसी
मैं इन्हीं का रूप हिन्दुस्तान हूँ


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