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ISSN 2292-9754

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02.23.2015


भीगे पंख
सतिया का जन्म - 3

"कमलिया.........!" कहकर पस्सराम ने उसे बाँहों में भर लिया था और उसकी आँखों में आँखें डालकर मुस्कराने लगा था। उस दोपहर में कमलिया जैसे ही खाने बैठी थी, उसे उबकाई आने लगी थी और वह उठकर परनाले की ओर भागी थी। जब उबकाई शांत हुई तो पस्सराम उसको अंक में लेकर प्यार जताने लगा था। कमलिया स्वयं पस्सराम की मुस्कराहट देखकर हैरान थी, और तभी उसकी हैरानी दूर करने के लिये पस्सराम बोला था,

"बोल लड़का हुइयै कि मोड़ी?/बोल, लड़का होगा या लड़की?/"

कमलिया उसका अर्थ समझकर झेंप गई थी और निगाहें झुकाकर मुस्करा दी थी। परंतु कमलिया उन्मुक्त हृदय से आह्लादित नहीं हो पा रही थी क्योंकि उसके मन में बार-बार यह काँटा चुभ जाता था कि पता नहीं उसके पेट में पल रहा भ्रूण पस्सराम के प्रेम की परिणति है अथवा हल्ला की बरबरता की। फिर उसका हृदय यह सोचकर दहल गया था कि यदि पस्सराम को हल्ला से उसके सम्बंधों का पता चल गया, तब क्या होगा।

कहावत है कि ‘इश्क और मुश्क छिपाये नहीं छिपते’। एक दिन हल्ला ने पस्सराम को आलू बेचने शहर भेजा था, परंतु शहर में दंगा हो जाने और कर्फ़्यू लग जाने के कारण पस्सराम शहर के बाहर से ही बैलगाड़ी वापस लौटा लाया था। गाँव पहुँचते-पहुँचते पौष माह की कृष्णपक्ष की रात अधियाय गई थी और पस्सराम भूख और जाड़ा दोनों से त्रस्त हो रहा था। पस्सराम ने रथखाने के बाहर गाड़ी खड़ी की और बैलों को खूंटे से बाँधकर उनके सामने पुआल खाने को डाल दिया। फिर जल्दी से अपनी झोपड़ी में घुसते ही बोला,

"कमलिया! बड़ी भूख लगी है। जल्दी सै कछू खइबे कौं दै देउ। /कमलिया बड़ी भूख लगी है। जल्दी से कुछ खाने को दो।/"

झोंपड़ी में धुप्प अंधकार था और हाथों-हाथ दिखाई नहीं दे रहा था। कोई उत्तर न पाकर उसने सोचा कि कमलिया गम्भीर निद्रा में है और बंसखटी पर जाकर उसके ओढ़ने की कथरी हटाने लगा। तब कमलिया को बंसखटी पर न पाकर पस्सराम के होश उड़ गये। उसने दरवाज़े पर आकर ‘कमलिया......., कमलिया......’ की आवाज़ें भी दीं, पर प्रत्युत्तर न पाकर वह हतप्रभ होकर दरवाज़े पर खड़ा रहा। तभी हल्ला के घर की ओर से कमलिया के पैरों की आहट सुनाई दी। उसको सामने आते देखकर पस्सराम अपने पर नियंत्रण खोने लगा और दहाड़ा,

"कमलिया! कहाँ गई हती? /कमलिया, कहाँ गई थी?/"

कमलिया को काटो तो खून नहीं- उसका गला सूख गया था और वह एक शब्द भी नहीं बोल पा रही थी। वह धरती माता के फट जाने और उसमें कमलिया को छिपा लेने की प्रतीक्षा करती हुई सी थम गई थी। इससे पस्सराम का संदेह विश्वास में परिवर्तित हो गया था और उसने पास आकर कमलिया का झोंटा पकड़कर कहा,

"बोल्त काँय नाईं ससुरी? कौन नओ खसम कर लओ है? /बोलती क्यों नहीं है ससुरी? कौन नया खसम कर लिया है?/"

कमलिया के कपड़ों, गालों और बालों की दशा देखकर पस्सराम ने अपना आपा पूर्णतः खो दिया और पाशविक क्रोध के वशीभूत होकर उसने कमलिया का गला अपने दोनों हाथों से जकड़ लिया था। हाथों का दबाव बढ़ने पर जब कमलिया की साँस रुकने लगी थी, तब उसके गले से एक चीत्कार निकला, जिसे सुनकर हल्ला वहाँ आ गये और दबंग स्वर में बोले,

"पस्सराम का बात है? जल्दी कैसे लौट आये? का आलू बिके नाईं? /पस्सराम क्या बात है? जल्दी कैसे लौट आये? क्या आलू बिके नहीं?/"

हल्ला का स्वर सुनकर पस्सराम की पकड़ एकदम ढीली हो गई थी और उसका गुस्सा काफ़ूर हो गया था। उसे हल्ला के इस समय उसकी झोपड़ी पर आने का निहित उद्देश्य और अपनी नियति का भान होने में पल भर का समय न लगा था। फिर वह कर्फ़्यू के कारण शीघ्र लौट आने की बात ऐसे बताने लगा जैसे अभी कुछ असामान्य घटा ही न हो। उसकी बात सुनकर हल्ला पस्सराम की आँखों में ‘जबरा मारै रोअन न देय’ के भाव से देखते हुए बोले,

"ठीक है। आलू फिर बेंच अइयौ। अबै चुपाँ सोय जाउ। /ठीक है, आलू फिर बेच आना। अभी चुपचाप सो जाओ।/"

यह कहकर हल्ला धीरे-धीरे अपने घर की ओर चल दिये थे। पस्सराम उन्हें ठगा सा देखता रह गया था।

उन दिनों हमारे समाज में भंगी का स्वाभिमान और उसका पुरुषत्व भी उसकी सामाजिक स्थिति के समान छोटा होता था। वापस जाते हुए हल्ला की हर पदचाप के साथ पस्सराम का अपमानजनित क्षोभ अपनी अवशता के भान के ताप से आँसुओं के रूप में पिघलता गया और उनके आँखों से ओझल होते ही वह बच्चे की तरह फुक्का मारकर रो पड़ा था। उसे यूं बच्चों की भाँति रोते देखकर कमलिया का साहस लौट आया था और वह स्पष्टीकरण देते हुए बोली,

"हम का कत्ते? हल्ला ने तौं जब होली पै पहले दांय जबरजत्ती करी हती, तभईं कह दई हती कि काऊ कौं कानौंकान खबर भई तौ तुम्हाई लास पुखरिया मैं परी मिलययै। अब हम तुमैं बचाते कि अपईं इज्जत बचाते? /मैं क्या करती? हल्ला ने तो जब होली के अवसर पर पहली बार जबरदस्ती की थी, तभी कह दिया था कि किसी को कानोंकान खबर हुई तो तुम्हारी लाश पोखरी में मिलेगी। अब मैं तुम्हें बचाती या अपनी इज्ज़त बचाती?/"

परिस्थिति से समझौता करना पस्सराम की मजबूरी थी- कमलिया की इस बात से उसके मन को इतना सम्बल अवश्य मिल गया कि कमलिया ने स्वतः उसके पौरुष को ठेस नहीं पहुँचाई थी। वह पहले ही समझ चुका था कि हंगामा करने अथवा कमलिया को मारने-पीटने से बदनामी, जेल अथवा मौत ही मिल सकती है; हल्ला से अपने अपमान का प्रतिकार करना उसके साहस और सामर्थ्य दोनों के बाहर था। परंतु इस घटना के बाद पस्सराम प्रायः अवसादग्रस्त रहने लगा था और कभी-कभी कमलिया जब उसकी बाँहों में होती, तो वह अचानक सिसक-सिसक कर कहने लगता था,

"कोई हमैं बस जा बताय देय कि तुम्हाई कोख में जू बच्चा हमाओ है कि नाईं। /कोई मुझे सिर्फ़ इतना बता दे कि तुम्हारी कोख का यह बच्चा मेरा है या नहीं।/"



उसी अनजाने बाप के बच्चे ने आज जब कमलिया अकेली थी, तब उसके पेट से बाहर आने की ठान ली थी और पूर्वान्ह से कमलिया के पेट में पीड़ा उठने लगी थी। आज सुबह ही हल्ला ने पस्सराम को दिन भर के लिये शहर भेज दिया था और बच्चा, जैसे अपने प्रति पिता की आशंका का भाव जानता हो, पिता की अनुपस्थिति में ही संसार में आने को कुलबुलाने लगा था। दिन ढलते ही कमलिया की पीड़ा असह्य होने लगी थी और रात्रि आते-आते कमलिया आती-जाती चेतना की स्थिति में आ गई थी। रात में जब पस्सराम घर आया तो कमलिया की ऐसी हालत देखकर चन्नी चाची के घर को दौड़ पड़ा और उन्हें जल्दी आने को कहकर वापस अपनी झोपड़ी में आया, तब तक वहाँ कमलिया एक नन्हीं सी बच्ची को जन्म देकर मूर्छित पड़ी थी और वह नन्हीं बच्ची ‘कहों कहों’ चीख रही थी। तब चन्नी चाची आ गईं और उन्होंनें जच्चा-बच्चा को सम्भाला। कमलिया के मूर्छित होने के कारण बच्ची को माँ के पेट के सुरक्षित वातावरण से इस निष्ठुर संसार में आने के पश्चात काफ़ी देर तक वांछित सुरक्षा और प्यार न मिल सका था। कमलिया के होश में आने पर चन्नी चाची ने बच्ची को उसके बगल में लिटा दिया- बच्ची ने जब आँख खोली तब एकटक माँ का मुँह देखने लगी जैसे शिकायत कर रही हो, "माँ! इतनी देर तक आपने मुझ निरीह को निस्सहाय क्यों छोड़ दिया था?"
कमलिया ने बच्ची को ऐसे देखते देखकर उसे छाती से चिपका लिया था और उसके मुख से अनायास निकल गया था, "मेरी सतिया"।

बच्ची के लिये सतिया नाम स्वतः निकलने के पीछे कमलिया के मन की वह घनीभूत पीड़ा थी कि चाहते हुए भी वह अपना सतीत्व न बचा सकी। अब उसका मन अपनी बच्ची के सतीत्व की रक्षा की मातृवत कामना कर रहा था- सम्भवतः उसका अवचेतन अपनी बेटी के सतीत्व की रक्षा में अपने सतीत्व की रक्षा का काल्पनिक आभास भी कर रहा था।

"बिटिया कौं एक आध दांय तौ गोदी मैं लै लेउ करौ। /बिटिया को एक आध बार तो गोद में ले लिया करो।" - कमलिया ने कई दिन की प्रतीक्षा के बाद पस्सराम से अनुनय की थी। छः दिन बीत जाने पर आज तक पस्सराम ने सतिया की ओर ढंग से देखा भी नहीं था। आज छठी के दिन भी बस कमलिया ने अकेले उसे काजल का टीका लगा दिया था, पर पस्सराम दूर ही रहा था। पस्सराम का मन वितृष्णा से भरा हुआ था और वह जवाब में व्यंग्यपूर्ण स्वर में बोल पड़ा था,

"तुम्हईं सम्हारौ अपईं सतिया कौं। / तुम्हीं सम्हालो अपनी सतिया को।"

ज्यों-ज्यों दिन बीतने लगे थे, अपने पिता की अवहेलना का गूढ़ अनुभव सतिया को होने लगा था और अपने पिता का प्यार पाने की उसकी लालसा बढ़ने लगी थी। कभी-कभी जब वह रो रही होती थी और पस्सराम झोंपड़ी में आ जाता, तब पिता को देखकर उनका ध्यान आकृष्ट करने हेतु और चीखकर रोने लगती थी जिसे सुनकर पस्सराम के मन में एक नपुंसक प्रतिशोध जाग पड़ता था और वह सतिया पर बुरी तरह चिल्ला पड़ता था। सतिया इससे घबराकर चुप हो जाती थी परंतु पिता के उसके प्रति क्रोध का कारण अथवा औचित्य न समझ पाने के कारण शनैः-शनैः विद्रोह का भाव भी उसके मन में जन्म लेता जा रहा था। यह विद्रोह का भाव ही ‘आई एम. ओ.के.: यू आर नॉट ओ.के.’ की प्रारम्भिक मनःस्थिति थी।



"कैसी हो कमलिया?" हल्ला का भारी भरकम स्वर झोपड़ी के बाहर सुनकर कमलिया को ग्रीष्म ऋतु में ही झुरझुरी आ गई थी। उसी दोपहर को पस्सराम शहर गया हुआ था और कमलिया दाहिनी करवट लेटी हुई सतिया को अपने वक्ष का दूध पिला रही थी। झोपड़ी के बाहर कृष्णपक्ष की रात्रि का अंधकार छाया हुआ था और झोपड़ी के अंदर जलती-बुझती सी डिब्बी की लौ का मद्धिम प्रकाश था। कमलिया के मन में पहले से चोर था- सतिया के जन्म के बाद वह अब तक किसी न किसी तरह हल्ला के चंगुल से बचती रही थी- कभी पस्सराम के बाहर जाने पर उसको उसी रात्रि लौट आने की ज़िद कर और कभी बीमारी का बहाना बनाकर; परंतु वह आज इस समय हल्ला की आवाज़ सुनकर समझ गई कि ‘बकरे की अम्मा कितनी भी ख़ैर मनावे, बकरा को तो एक दिन काटा ही जाना है’। कमलिया का हाथ अप्रयास अपने वक्ष को ढकने हेतु सतिया के द्वारा मुटठी में पकड़ी हुई साड़ी खींचने लगा। हल्ला उसके वक्ष ढकने के इस प्रयास पर और कामातुर हो गये और उन्होंने जल्दी से झोपड़ी में घुसकर टट्टर को उढ़काकर अंदर से बंद कर दिया और सतिया को कमलिया से अलग कर दिया। फिर सतिया के भयभीत नेत्रों के समक्ष उसकी माँ को निर्वस्त्र कर अपनी बाँहों में दबोचकर फ़र्श पर लिटा दिया और बहशी की तरह उससे सम्भोग करने लगे। सतिया अपनी माँ की आहें कराहें सुनकर भयभीत होकर रोती रही पर उसकी चीखों पर ध्यान देने वाला कोई न था। हल्ला के जाने के बाद कमलिया देर तक सिसकती रही और सतिया उसे ऐसे देखती रही जैसे अपनी माँ की निरीहता भांप रही हो और उसके मानस में हल्ला के प्रति घृणा उबलती रही।

फिर माँ की इस लाचारी और बेबसी का दृश्य यदा-कदा देखते रहना सतिया का भाग्य बन गया। साथ ही उसके मन में घृणा और विद्रोह का भाव स्थायी होने लगा था।


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