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ISSN 2292-9754

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01.28.2015


भीगे पंख
सतिया का जन्म - 2

 पस्सराम के अपने नये घर में आने के तीन माह पश्चात ग्राम के पोर-पोर में वसंत प्रवेश करने लगा था- चहुँ ओर होली की रंगीनी छाने लगी थी। मानिकपुर गाँव में हर वर्ष फागुन आते ही होली जैसा वातावरण बनने लगता था जो पूरे माह चलता था। माघ पूर्णिमा की रात्रि से ही होली जलाये जाने के स्थान पर लोग लकड़ियाँ ला लाकर रखने लगते थे। गाँव के बच्चे प्रायः रात में कहीं पड़े किसी के लकड़ी के कुंदे अथवा खेत में रखे छप्पर को चुपचाप उठा लाते थे और होली पर रख देते थे- इसे होली बढ़ाना कहा जाता था। एक बार कोई लकड़ी या फूस होली पर रख जाने के बाद कोई उसे उठाकर वापस ले जाने का साहस नहीं करता था क्योंकि ऐसा करने से होली माता के कुपित हो जाने की मान्यता थी। प्रायः गरीब एवं कमजो़र लोगों की लकड़ियाँ ही स्वाहा होतीं थीं क्योंकि बड़े आदमी की लकड़ी रखे जाने पर वह उसे वहाँ से उठा तो नहीं सकता था परंतु होली बढ़ाने वालों की पिटवाई तो होली माता को कुपित किये बिना ही करवा सकता था। फागुन आते ही अब हवेली के सामने के चबूतरे पर अगेहना जलना बंद हो गया था परंतु रात में गाँव वालों का जमावड़ा कम नहीं हुआ था। अब वहाँ फाग गाने के लिये रात में लोगबाग इकट्ठे होते थे। बालकों और नवयुवकों ने मस्ती आने पर रंग, पानी, कीचड़ आदि फेंककर होली की धमा-चौकड़ी भी प्रारम्भ कर दी थी। फाग के गानों में, देवर-भौजी के तानों में, और अबीर-गुलाल के गालों और बालों में लेपने के बहाने अनेक रिश्ते-नातों का अतिक्रमण हो रहा था। कहीं-कहीं कामदेव दुतरफ़ा सक्रिय थे और कहीं-कहीं स्त्रियों को जो़र-ज़बरदस्ती से भी पराजित किया जा रहा था- विशेषतः सामाजिक मापदंड में निम्न जाति की स्त्रियों को।

गाँव के एक छोर पर रहने वाले नेहरू पंडित के यहाँ नाउन भौजी गुझिया बनवाने गईं थीं तो दोनों की आँख लड़ गई थी। नाऊ भैय्या को काम से बाहर जाना पड़ता था और ऐसी ही एक रात में नेहरू पंडित नाउन भौजी के घर में कूद गये थे; और फिर यह सिलसिला चालू हो गया था। यद्यपि एक दो बार पड़ोस के नाइयों ने नेहरू पंडित को रात में घर में आते जाते देख भी लिया था, परंतु वे केवल खांसने-खूंसने भर की हिम्मत जुटा पाये थे, कोई इससे अधिक रोक-टोक का साहस नहीं कर सका था।

हल्ला ने कमलिया की सुंदरता के विषय में काफी़ सुन रखा था, परंतु पस्सराम उसे घर से बाहर कम ही निकालता था, इसलिये हल्ला ने उसे कभी भलीभाँति देखा नहीं था। होली के अवसर पर उनका मन उसके लिये चुलबुला रहा था। होली और दीवाली के त्योहार पर हर कमीन बड़े लोगों के घरों में काम करने वाले की घरवाली को ज़मींदारों तथा अन्य ब्राह्मणों के घर जाने की प्रथा थी, जिसे तोड़ने का साहस पस्सराम नहीं कर सकता था। प्रथा के पालन की अनिवार्यता के अतिरिक्त कमलिया के आज बड़े लोगों के यहाँ जाने में एक लोभ भी था- त्योहार के मौके पर कमीनों को बड़े लोगों के घर से भोजन, अनाज और पुराने कपड़ों की प्राप्ति हो जाती थी जिसका लोभ सम्वरण कर पाना उन निर्धन लोगों के लिये बड़ा कठिन था।

होली की रात्रि में 10 बजे पंडित जी ने होलिकादहन का मुहूर्त निकाला था। दूसरे दिन सबेरे से गाँव में रंग, गोबर और कीचड़ एक दूसरे पर फेंका जा रहा था। फिर दोपहर बाद फाग की टोली निकल पड़ी थी।

"होरी खेलैं स्याम बिरज मैं, मारैं भर पिचकारी,
होरी खेलैं हो..ओ............................................ओ."

भग्गी काछी ढोलक बजा रहे थे और फगुहारे होली गा रहे थे। प्रतिवर्ष की भाँति फगुहारे भग्गी काछी के दरवाज़े पर इकटठे हुए थे और बम्बा के किनारे जलती हुई होली के चारों ओर परिक्रमा करते हुए आखत/जौ के पौधों पर निकले हरे दानों को भूनकर अग्नि में डालने के अक्षत/डालने के बाद घर-घर जाकर फाग गा रहे थे।

गाँव में यह मान्यता थी कि होली आने पर पिछले वर्ष के सब गिले-शिकवे भूल जाने चाहिये और मिल-जुलकर नया वर्ष प्रारम्भ करना चाहिये। इसलिये आपस में मुकदमेबाज़ी और मनमुटाव होने के बावजूद होली के दिन लालजी शर्मा और हल्ला के परिवार के लेाग एक साथ मिलकर होली खेलते थे और आपस में गले मिलते थे। ‘अछूतों’ को छोड़कर सभी के घर जाकर ढोलक की थाप और मंजीरे की झंकार पर फाग गाई गई और रंग खेला गया। प्रथा के अनुसार हल्ला के दरवाज़े फाग सबसे बाद में पहुँची थी और यहाँ देर तक फाग चलती रही थी। यहीं से इसे विसर्जित होना था। तब तक शाम का धुंधलका होने लगा था। कमलिया अपना मन न रोक सकी और झोंपड़ी के बाहर आकर फाग सुनती रही थी। इस दौरान हल्ला नम्बरदार की गृद्ध-दृष्टि ने कमलिया की कमनीय काया को भरपूर देख लिया था और उनकी उतावली बढ़ गई थी।

फगवारों के जाने के बाद हल्ला ने नाई से तेल का उबटन लगवाया और घर्षण स्नान कर अपने बदन से रंग छुड़ाया। फिर नया कुर्ता धोती पहनकर और कान में फुलेल लगाकर आने वालों से मिलने के लिये बैठक में बैठ गये थे। देर रात तक मिलने वालों का सिलसिला चलता रहा था। कमलिया की छठी इंद्रिय उसे हल्ला के प्रति शंकालु बना रही थी और वह हल्ला के यहाँ जाने में घबरा रही थी। उस दिन सुबह से ही हल्ला ने कई काम बताकर पस्सराम को बैलगाड़ी लेकर शहर भेज दिया था। आसन्न भय को यथासम्भव टालने हेतु कमलिया पहले अन्य ब्राह्मणों व बड़े आदमियों के यहाँ होली की बख़्शीश लेने गई और वहाँ से निबटने के बाद जब वह लौटी तब तक हल्ला के यहाँ आने वालों का सिलसिला समाप्त हो चुका था। सहन को खाली देखकर वह जल्दी से बैठक के सामने से होते हुए घर में जाकर बाहरी बरामदे की दहलीज़ पर खड़ी हो गई थी। हल्लाइन उसे देखकर बोलीं थीं,

"अरे, कमलिया! तुम तौ दिखाइयै नांईं परतीं हौ? /अरे कमलिया, तुम तो दिखाई ही नहीं पड़ती हो?/"

कमलिया सकुचाकर रह गई थी, कुछ उत्तर नहीं बन पड़ा था। फिर हल्लाइन ने उसके आँचल में कुछ पूड़ियाँ और एक पुरानी धोती डाल दी थी। कृतज्ञता ज्ञापन में पैर छूने की प्रक्रिया के प्रदर्शन हेतु दहलीज छूकर कमलिया बाहर को चल दी थी। बाहर आकर जब कमलिया बैठक के सामने से गुज़र रही थी, तो हुक्का गुड़गुड़ाते हुए हल्ला नम्बरदार के नेत्र कमलिया की राह पर केन्द्रित थे। कमलिया उनके प्रभाव से आतंकित होकर जल्दी-जल्दी बैठक के सामने से निकलने लगी, कि उनकी भारी भरकम आवाज़ सुनाई दी,

"कमलिया कैसी हौ? होरी को इनाम तौ लेती जाउ। /कमलिया कैसी हो? होली का इनाम तो लेती जाओ।/"

यह कहकर उन्होंने दो रुपये का नोट उँगलियों के बीच फंसाकर कमलिया की ओर बढ़ाया था। कमलिया धर्मसंकट में पड़ गई थी कि अछूत होकर बैठक में कैसे घुसे और ज़्मींदार साहब की अवहेलना भी कैसे करे। तभी हल्ला उसकी दुविधा दूर करने हेतु बोल पड़े थे,

"अरे आज तौ होरी है। आज सब बराबर हैं। भीतर आय कें लै लेउ। /अरे आज तो होली है। आज सब बराबर हैं। अंदर आकर ले लो।/"

कमलिया के पैर मनों भारी होकर उठ रहे थे परंतु कोई अन्य विकल्प न देखकर वह बैठक के दरवाज़े से एक कदम अंदर आकर दूर खड़ी हो गई थी। तभी हल्ला अपनी कुर्सी से उठकर दरवाज़ा बंद करने लगे थे और तब कमलिया की घिग्घी ऐसे बंध गई थी जैसे बाघ को देखकर मेमने की बंध जाती है।

हल्ला ने होली के अवसर पर खूब पी रखी थी और उन्होंने कमलिया को अपनी बलिष्ठ बाँहों में उठाकर जितनी बेरहमी से बाघ की तरह नोंच खसोट कर अपनी उद्दाम कामवासना को शांत किया था, कमलिया के मन में उनका उतना अधिक आतंक समाता चला गया था और वह दर्द भरी आह भी कठिनाई से निकाल सकी थी। फिर चलते समय उन्होंनें दो रुपये का नोट कमलिया की अंगिया में खोंसते हुए चेतावनी दी थी,

"अगर काऊ कौं कानोंकान खबर भई, तौ पस्सराम की लास पुखरिया मैं मिलययै। / अगर किसी को कानोंकान खबर हुई, तो पस्सराम की लाश पोखरी में मिलेगी।/"

कमलिया किसी तरह लड़खड़ाती अपनी झोपड़ी में आयी और धम्म से बंसखटी पर पसर गई थी। उसे अब चाची की चेतावनी का अर्थ समझ में आया था, जब बहुत देर हो चुकी थी। धीरे धीरे कमलिया के नेत्र अश्रुपूरित होने लगे थे और फिर चादर में अपना मुँह छिपाकर वह फफक कर रोने लगी थी। वह ऐसी घायल हिरणी थी जिसे खुलकर रोने की भी अनुमति नहीं थी। वह किसी को कुछ बताने की बात सोच भी नहीं सकती थी क्योंकि हमारे समाज में इज्ज़त सदैव स्त्री की ही लुटती है- चाहे वह मन से, बेमन से अथवा विवश होकर कैसे भी अवैध सम्बंध स्थापित करे। पुरुष के लिये तो ऐसा सम्बंध युद्ध में विजय के समान माना जाता है जबकि स्त्री के लिये यह उसका मान, शरीर और आत्मा सब कुछ गंवा देने के समान समझा जाता है। कमलिया जानती थी कि उसके साथ हुए बलात्कार की घटना को जानकर पस्सराम भी हल्ला का तो कुछ भी नहीं बिगाड़ सकेगा, वरन् कमलिया को ही हेय दृष्टि से देखने लगेगा और हो सकता है कि घर से भी निकाल दे। राम ने भी तो सीता के बलात अपहरण पर उन्हें वनवास दे दिया था। फिर कमलिया यह भी जानती थी कि हल्ला जब चाहें अपने द्वारा दी गई धमकी को क्रियान्वित करा सकते हैं। अतः उसने चुपचाप अपने आँसू पी जाने में ही अपनी और पस्सराम की भलाई समझी थी। होली के बाद हल्ला अक्सर पस्सराम को कभी फसल बेचने के लिये, कभी बीज खरीदने के लिये या किसी रिश्तेदार को उसके घर पहुँचाने के लिये बैलगाड़ी लेकर बाहर भेजने लगे थे। इन कामों में उसे एक दो रातें बाहर बितानी पड़तीं थीं, परंतु पस्सराम को रोज़-रोज़ गोबर कूड़ा उठाने के काम से यह काम अधिक अच्छा लगता था और हल्ला उसे पगार भी कुछ बढ़ाकर देने लगे थे। पस्सराम के बाहर रहने पर रात्रि में हल्ला सुभीता के अनुसार कभी पस्सराम की झोपड़ी में प्रवेश कर जाते थे और कभी कमलिया को अपनी बैठक में बुला लेते थे। कमलिया ने अपनी नियति से समझौता कर लिया था।


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