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ISSN 2292-9754

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12.27.2014


भीगे पंख
 सतिया का जन्म - 1

कार्तिक का बड़ा सुहाना महीना था- न अधिक गर्म, न अधिक ठंडा। वर्षा ऋतु के पश्चात चारों ओर छाई हरियाली इतनी उत्फुल्लकारी थी कि मन और शरीर दोनों आह्लाद से भरे रहें। यह वह समय था जब मोहित सवा तीन वर्ष का हो चुका था और हवेली में धमाचौकड़ी मचाये रहता था।

ग्राम्य जीवन का यह वह महीना था जब वर्षा के प्यार से प्रस्फुटित हरी-भरी प्रकृति शरत् ऋतु को अपने अंक में भर लेने को व्याकुल होने लगी थी।

यह वह समय था जब दोपहर बाद लोग घर के बाहर नीम के पेड़ के नीचे बैठकर पीली पड़ती धूप का आनंद लेना प्रारंभ कर चुक्रे थे।

यह वह समय था जब साँध्यवेला में अवसर मिलते ही नर और मादा युवा मच्छर घने काले केशों वाले युवक-युवतियों के सिर के ऊपर मंडरा मंडरा कर काम-नृत्य करना प्रारम्भ करने लगते हैं।

यह वह समय था जब गाँव के कुत्तों ने रात रात भर कुतियों के पीछे उनको पटाने हेतु विचरण करना प्रारम्भ कर दिया था। उनमे जो सफल होते वे तो लम्बे लम्बे समय तक जीवनदायिनी क्रीड़ा में लिप्त रहते और जो प्रेयसी द्वारा दुत्कार दिये जाते अथवा अन्य प्रतियोगी के भयवश प्रतियोगिता से बाहर हो जाते, वे हृदयविदारक चीत्कार के साथ रात भर अश्रु बहाते रहते थे।

यह वह समय था जब गृहिणियों ने ऊनी कपड़े और रज़ाई टीन के बक्सों से निकालकर धूप में सुखाना प्रारंभ कर दिया था जिससे उनमे बसी नमी की बास उड़ जाये और जैसे ही शामों की ठंडक बढ़े, वे शरीर को नरम गरम रखने के काम आ सकें।

यह वह समय था जब गाँव की अंधेरी गलियों और कोठरियों में रेंगने वाले साँपों और बिच्छुओं का डर समाप्त होने लगा था और गाँव के बच्चों ने रात्रि में खेले जाने वाले खेल ‘सूंड़ी’ को निधड़क खेलना प्रारंभ कर दिया था। दो टीमों में विभक्त होकर एक टीम के बच्चे दूसरी टीम से आगे जाकर गली के एक मोड़ पर खड़े होकर ‘चल बोल’ बोलते थे और भागकर किसी अंधेरे स्थान में छिप जाते थे और दूसरी टीम के बच्चे जो गली के पिछले मोड़ पर खड़े होते थे, दौड़कर उन्हें ढूंढते थे। इस तरह देर रात तक गाँव की गलियों में धमाचौकड़ी मची रहती थी। कभी-कभी पहली टीम के कुछ शैतान बच्चे ढूंढने में देरी होने पर चुपचाप अपने घरों को खिसक लेते थे और खा पीकर सो जाते थे, और दूसरी टीम के बच्चे उन्हें देर रात्रि तक ढूंढते रह जाते थे।

यह वह समय था जब रात्रि में ब्यालू करने के बाद गाँव के बच्चों, युवकों और बड़े-बूढ़ों ने अघेना /अग्निकुंड/ के चारों ओर बैठकर चौपाल लगानी प्रारंभ कर दी थी जिसमे किस्से कहानियों के अलावा गाँव की चटपटी घटनायें जैसे, सुरेसा कहार की बहू आजकल किससे आँख लड़ा रही है, पटियाइत के सीरचंद कक्का पिछली रात ‘लाला की बगिया’ में खड़े पीपल पर रहने वाले जिन्न से कितनी देर तक लड़ते रहे आदि खूब नमक मिर्च लगाकर बखानी जातीं थीं।

यह वह समय था जब राम द्वारा रावण को जीतकर अयोध्या लौटने की स्मृति में दीपमाला जलाकर मनाया जाने वाला दीपावली का त्यौहार प्रत्येक ग्रामवासी के मनमानस पर छाने लगा था। इस अवसर पर गाँव की रियाया- नाई, धेाबी, चमार आदि- को उनकी सेवा-टहल के पुरस्कार स्वरूप ब्राह्मणों के घरों से उनकी उतरन के पुराने कपड़े, और बची खुची मिठाइयाँ व पूड़ियाँ मिलने वालीं थी, जिसकी प्रतीक्षा उनके घरों में होली के बाद से की जा रही थी।

मानिकपुर में फूस की उस टुटही झोपड़ी में जैसे कार्तिक आया ही नहीं था; वैसे भी उसमें जब भी कोई मौसम आता था तो केवल उसमें रहने वाले युगल की विपन्नता को उजागर करने एवं उनकी निरीहता से उत्पन्न कष्टों में वृद्धि करने हेतु आता था- ग्रीष्म ऋतु में लू के थपेड़े, शरत ऋतु में फूस के छप्पर को अबाध पार कर आने वाली शीतलहर और बरसात में पुराने छप्पर से टपकता पानी, इन्हें सहना ही उसमे रहने वाले दम्पति का भाग्य था। उस झोपड़ी में दीया भी होली-दीवाली पर ही जलता था। आज सायंकाल से ‘हाय अम्मा, हाय मरी.........हाय अम्मा, हाय मरी............’ के नारी स्वर की कराहें उस झोपड़ी में गूंज रहीं थीं जो झोपड़ी के बाहर कुछ दूर तक की वायु को प्रकम्पित कर विलीन हो जातीं थीं। ये कराहें बीच बीच में रुक जातीं थीं और झोपड़ी में पूर्ण शांति छा जाती थी। झोपड़ी के अंदर एक ढीले-ढाले झूलते हुए बानों से बुनी बंसखटी पर अठारह वर्षीय कमलिया लेटी हुई थी। उसके मुख से कभी कराहट निकलती थी तो कभी मात्र बुदबुदाहट, परंतु उन्हें सुननेवाला कोई न था। हाँ, एक चुहिया, जो अरहर की लकड़ियों से बनी डलिया में रखी रोटी को कुतर कुतर कर खा रही थी, अवश्य कमलिया की कराह को सुनकर सतर्क होकर कान खड़े कर लेती थी और कराह के रुक जाने पर आश्वस्त होकर पुनः अपनी क्षुधापूर्ति में जुट जाती थी। झोपड़ी की कच्ची मिट्टी की दीवालों के ऊपर रखे फूस के छप्पर के संधिस्थल पर एक झींगुर ने अपना शरणस्थल बना लिया था, जो प्रतिदिन की भाँति अंधेरा होते ही कर्कश ध्वनि में अपना राग अलापने लगा था। कमलिया के सिरहाने की दीवाल पर एक नर छिपकला एक मादा छिपकली को पटाने हेतु उसके पीछे दौड़ रहा था। कमलिया की प्रसव पीड़ा इतनी तीक्ष्ण थी कि वह जीवन की इन प्रखर प्रक्रियाओं से अनभिज्ञ थी। शनैः शनैः वह जागृति और मूर्छा की अवस्था के बीच झूलने लगी थी। उसे लगने लगा था कि वह आज नहीं बचेगी और बीते जीवन के अंतरंग क्षण उसके मस्तिष्क में चलचित्र सम घूमने लगे थे।

"अम्मा! बराइत आइ गई है। बगिया मै टिकी है। पानी-पत्ता कराय आये हैं। /अम्मा बारात आ गई है, बाग में टिकी है। जलपान करा दिया हैं/" - जब कमतिया के छोटे भाई दिन्नू ने हाँफते हुए आकर कहा था, तो उसके मन में मिसरी सी घुलने लगी थी; परंतु तभी उस मिसरी में यह सोचकर खटास पैदा हो गई थी कि लड़का दुजांहूं / दूसरे विवाह वाला/ है। फिर अम्मा की यह बात याद कर उसने संतोष कर लिया था, "लड़का की उमिर पचीस सै जांदा नांईं है और पहली वाली सै कोई औलाद नाईं है। बू तौ उनके भय्या की बिचमानी सै ऐसो लड़का मिल गओ, नाईं तौ आजकल मजूर-पेसा बूढ़े लौ दहेज मै सायकिल माँगन लगे हैं। /लड़के की उम्र पच्चीस से ज़्यादा नहीं है, और पहली पत्नी से कोई औलाद भी नहीं है। वह तो उनके भाई के बीच में पड़ने से ऐसा लड़का मिल गया है, नहीं तो आजकल मज़दूरी करने वाले बुड्ढे भी दहेज़ में सायकिल माँगने लगे हैं।/"

फिर जब भांवरें पड़ने के समय उसने लड़के /पस्सराम/ को घूंघट के अंदर से देखा था तो पीले कुर्ते और लाल मौर में साँवले मुँह पर बड़ा बड़ा काजल लगाये हुए वह कमलिया को बड़ा सुंदर लगा था। उस क्षण को यादकर अर्धमूर्छित अवस्था में भी कमलिया के मुँह पर एक क्षीण स्मित रेखा दौड़ गई थी। कमलिया एक विपन्न परिवार की लड़की थी और विपन्नता की अवस्था में पली थी। उसे एक जवान पति मिल रहा था, यही बड़ी बात थी। उसके लिये यह कौन कम सौभाग्य की बात थी कि वह किसी अधेड़ बाल-बच्चेदार पुरुष के यहाँ नहीं बैठा दी गई थी जैसे कमलिया की माँ अपनी से दूनी आयु वाले उसके पिता के यहाँ बैठाई गई थी।

पस्सराम को भी कमलिया पहली निगाह में ही भा गई थी और जब पौनछक /बारात के आगमन के पश्चात रात्रिभोज/ के समय उसके फूफा इस बात पर रूठकर वापस जाने लगे थे कि कमलिया के पिता ने उनके पैर अपने हाथ से नहीं धोये थे, तो बड़ों के बीच वह बोल पड़ा था,

"फूफा! अब गुस्सां थूक देउ। आदमियई सै भूल होत है। /फूफा, अब गुस्सा त्याग दीजिये। आदमी से ही भूल होती है।/"

दूल्हे के मुँह से यह बात सुनकर सब अवाक रह गये थे और उसके जीजा ने चुटकी ली थी,

"हाय! अबै सै जू हाल है तो अंगाऊँ का हुइअय? /हाय, अभी से यह हाल है, तो आगे क्या होगा।/"

इस पर सब लोग अनायास हँस पड़े थे और पस्सराम झेंप गया था, परंतु आसन्न झंझट टल गया था।

विवाह के अगले साल ग्रीष्म ऋतु में कमलिया का गौना हुआ था और तब वह पहली बार ससुराल आई थी। उस समय वह पंद्रह वर्ष की किशोरी थी और उसके मन में पुरुष द्वारा प्यार किये जाने के स्वप्न सोते-जागते आने लगे थे। सुहागरात में पस्सराम की चाची ने उन दोनों के लिये घर के एकमात्र मड़हे की छत पर बंसखटी डलवा थी और चाचा चाची तथा उनकी संतानें नीचे मड़हे और उसके सामने के खुले आँगन में सोये थे। पस्सराम के माता-पिता तो उसके बचपन में ही उसे बिलखता छोड़कर परलोक सिधार गये थे और उसके चाचा-चाची ने ही किसी तरह उसे पाला था। पस्सराम की पहली पत्नी विवाह के तीन माह बाद ही मलेरिया बुखार में चल बसी थी। पहले विवाह में पस्सराम के चाचा ने लगुन के मौके पर पूरे ग्यारह रुपये दहेज में लिये थे, परंतु इस बार उन्हें दहेज में लगुन, विवाह और गौने के तीनों अवसरों को मिलाकर दस-बारह रुपये से अधिक की प्राप्ति नहीं हुई थी, इसलिये चाचा चाची नई बहू से अधिक खु़श नहीं थे।

विवाह और गौने के अंतराल में कमलिया की काया गदरा गई थी और बड़ी कमनीय हो गई थी जिसे देखकर पस्सराम की खुशी उसके मन में नहीं समा रही थी और वह बेताबी से रात्रि की प्रतीक्षा कर रहा था। घर में सबका खाना पीना हो जाने पर जब सब सोने का उपक्रम करने लगे, तो पस्सराम दबे पाँव ज़ीने से छत पर चढ़ आया था। चाची ने कमलिया को पहले से ही वहाँ भेज दिया था। चतुर्दशी की चाँदनी रात्रि थी, जिसकी चाँदनी में कमलिया के कुंआरे सौंदर्य को निहारकर पस्सराम का मन प्यार से आप्लावित हो गया था। कमलिया संकोच से छुई मुई हो रही थी, परंतु उसके अधमुंदे नयन पस्सराम को निकट आने का मूक निमंत्रण दे रहे थे। नेत्रों की भाषा का यह आदान प्रदान जब असह्य होने लगा तो पस्सराम ने आगे बढ़कर कमलिया को बाँहों में भर लिया था और उसके कान में फुसफुसाया था," मेरी कमलिया......... "। पस्सराम ने ऐसे धैर्यपूर्वक एवं प्रेमपूर्वक कमलिया को अपना बनाया था कि कमलिया जी-जान से उस पर निछावर हो गई थी।

कमलिया अपनी सेवाटहल से अपने चाचा-चाची को पूर्णतः प्रसन्न रखने का प्रयत्न करती थी परंतु शीत ऋतु आते आते चाची ने उससे कह दिया था कि अब उन दोनों को अपना अलग प्रबंध कर लेना चाहिये। चाची की बात भी सही थी क्योंकि उनके पास बस एक ही मड़हा था और अब उनके बेटे के विवाह की भी बात चल रही थी।

पस्सराम बचपन से हल्ला के यहाँ चाकरी करता रहा था- उनके जानवरों का गोबर-कूड़ा करना, उन्हें चराना, पानी पिलाना, कुट्टी काटकर उन्हें खिलाना, फ़र्श को गोबर से लीपना और कंडे पाथना आदि ही उसके जीवन की दिनचर्या थी। उसके पास अपनी कोई ज़मीन नहीं थी। अतः आज ज़मीन की आवश्यकता पड़ने पर वह उन्हीं के पास अपनी फ़रियाद लेकर आया,

"मालिक! हमाये चच्चा अब हमैं अलग रहिबे कौं कह रहे हैं। थोरी सी जगह दै कें हमाये रहिबे के लैं कोई ठिकानों कर देउ। /मालिक, मेरे चाचा अब हमें अलग रहने को कह रहे हैं। थोड़ी सी जगह देकर हमारे रहने का ठिकाना कर दीजिये।/"

उसकी अनुनय सुनकर हल्ला कुछ देर तक पलकें मूंदकर कुर्सी पर ऐसे बैठे रहे जैसे उन्होंने कुछ सुना ही न हो। पस्सराम उनके इस स्वभाव को जानता था, अतः कुछ देर चुप खड़े रहने के बाद उसने अपनी अनुनय दोहरायी, तब उन्होंने अपने नेत्र खोले थे। उस समय उनकी मूंछों में एक क्षीण स्मित-रेखा विद्यमान थी। वह अपने गम्भीर स्वर में बोले,

"ठीक है तुम मेरे घर के उत्तर की ओर खाली पड़ी ज़मीन के कोने में एक मड़हा बनाय लेउ। पुखरिया सै मट्टी लै लीजौ और मेरे लाहा को फूस लै कें छप्पर डाल लीजौ। /ठीक है, तुम मेरे घर के उत्तर की ओर खाली पड़ी ज़मीन पर एक कमरा बना लो। पोखरी से मिट्टी ले लेना और मेरे खेत के लाहा के फूस का छप्पर डाल लेना।/"

पस्सराम यह सुनकर अवाक था- उसे लग रहा था कि उसकी माँग पर व्यंग्य करने हेतु हल्ला ऐसे बोल रहे हैं। अपने घर के बगल में वह एक ‘अछूत’ को कैसे बसा सकते हैं? वह उनकी बात का मर्म समझने हेतु चुपचाप खड़ा रहा, तभी वह फिर बोले,

"अब मेरो मुँह का देखत है? का बाँस बल्ली के लैं पैसा चहिंयें? /अब मेरा मुँह क्या देखता है? क्या बाँस-बल्ली के लिये रुपये चाहिये?/" और उन्होंने अपनी फतुईं की जेब से निकालकर दस रुपये उसकी तरफ़ फेंक दिये थे। कृतज्ञता से पस्सराम की खीसें निपुर गईं और वह पैसे उठाकर आभार व्यक्त करने हेतु बार बार ज़मीन छूकर अपने माथे से लगाने लगा। फिर महीने भर में ही पस्सराम ने कच्ची मिट्टी का अपना मड़हा बना लिया था और उस पर छप्पर भी छा लिया था। गाँव के अन्य ब्राह्मणों को हल्ला द्वारा अपने पडो़स में एक ‘अछूत’ को बसा लेने पर अत्यंत क्षोभ था और पीठ पीछे वे कहते भी थे कि ब्रह्मणों का नाश होने वाला है जो उनकी ऐसी मति भ्रष्ट हो रही है, परंतु हल्ला के उग्र स्वभाव के कारण कोई उनसे कुछ कहने का साहस न करता था। उनसे तब भी कोई कुछ कहने का साहस कहाँ जुटा सका था जब उन्होंने बेड़नियों को पोखर के किनारे रहने की जगह दे दी थी, अथवा जब उन्होंने गोह और साँप जैसे जंतुओं को अपने घर में पाला था, अथवा जब अपने ही खानदान में आयी हुई बारात के बारातियों पर इसलिये ईंट-पत्थर और धूल-माटी फिंकवाई थी कि बारात में नाचने को वे पतुरिया नहीं लाये थे।

अपने मड़हे में रहने के लिये कमलिया को लेकर जब पस्सराम अपने चाचा के घर से चला था तो उसकी चाची ने कमलिया को अलग ले जाकर सचेत किया था,

"सेर की माँद मैं रहन जाय तौ रही हौ, लेकिन बच कें रहियौ। /शेर की माँद में रहने तो जा रही हो, परंतु रहना बच के।/"

कमलिया चाची की बात का अर्थ नहीं समझ पाई थी और अपने घर में रहने की खुशी में वह कोई ऐसी वैसी बात सुनने समझने को उद्यत भी नहीं थी। शाहजहाँ को अपने द्वारा बनवाये गये ताजमहल में प्रवेश करते समय जितनी प्रसन्नता हुई होगी, अपनी कोठरी में आकर इन दोनों को उससे कम प्रसन्नता नहीं हुई थी। कमलिया को पहली बार पूर्ण एकांत में पाकर पस्सराम मगन हो रहा था और रात्रि आने की बेताबी से प्रतीक्षा कर रहा था। रात में प्रथम एकांत मिलन का ज्वार शांत होने पर कमलिया ने पस्सराम की छाती पर सिर रखे हुए चाची की चेतावनी के विषय में पस्सराम को बताया था और उसका अर्थ पूछा था। पस्सराम के मन में यह खटका तो प्रारम्भ से था कि हल्ला ने उसे अपने मकान के बगल में रहने की अनुमति क्यों दे दी है, परंतु आज कुछ तो पस्सराम शुतुरमुर्ग के समान बालू में मुँह छिपाकर आसन्न आशंका को जानबूझकर अनदेखा करना चाह रहा था और कुछ हल्ला के अपने प्रति व्यवहार से इतना आश्वस्त था कि उसने कह दिया,

"गाँव मैं सब लोग जलत हैं कि हम लोगन कौं हियाँ रहिबे कौं काये मिल गओ है, ता सै ऐसी बातैं करत हैं। /गाँव में सब लोग जलते हैं कि हमें यहाँ रहने को क्यों मिल गया है। इसलिये ऐसी बात करते हैं।/"


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