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ISSN 2292-9754

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11.01.2016


भीगे पंख
सतिया /एक/दो (२)

"अरे! आप लोग कब आ गये ?"
काम से वापस लौटकर अपने घर आने पर दरवाज़े के बाहर पस्सराम, कमलिया और सतिया को सूखे मुँह उकड़ूँ बैठा देखकर विमलसिंह आश्चर्यचकित था। उसकी "अरे" में आश्चर्य, स्वागत अथवा अनावश्यक झमेले में पड़ने की आशंका में से क्या छिपा था, यह बैठे हुए तीनों लोगों में से कोई नहीं समझ पाया। विमलसिंह को दिल्ली में "पॉलिटिक्स" करते-करते 7-8 साल बीत चुके थे और उसने अपने हाव-भावों, स्वरों एवं वाक्यों को ऐसे ढालने की कला का अभ्यास कर लिया था कि परिस्थिति के अनुसार आगे उनका कोई भी अर्थ निकाला जा सके। भूख-प्यास से सूखे-सिकुड़े उन तीनों जीवों पर विमलसिंह द्वारा पहिचान लिये जाने की स्वीकार्यता ने ही अमृतवर्षा का प्रभाव डाला था। यद्यपि पस्सराम की जेब में राजा साहब द्वारा दिये हुए रुपयों में से आराम से खाने-पीने हेतु पर्याप्त रुपये बचे थे, परंतु उसमें से मात्र आठ आने की मूँगफली लेकर ही तीनों ने खाई थी- सदियों से आर्थिक असुरक्षा झेल रहे ग्रामीण प्रायः इतने कृपण होते हैं कि उनके जीने का उद्देश्य ही येन केन प्रकारेण धन संचित करना हो जाता है, और इस समय तो पस्सराम का परिवार हर प्रकार की अनिश्चितता की स्थिति में था।

दयनीय नेत्रों से विमलसिंह की ओर देखते हुए पस्सराम बोला था,

"साहब! गाँव मैं पुलिस के एक अफ़सर जांच के लैं अइबे बाले हैं, जा बात जानकें राजा साहब ने हमसै जबरजस्ती एक सादे काग़ज़ पै अंगूठा लगबाइ कें हमैं गाँव सै निकार दओ है। हमाओ और कहूँ ठिकाना नाईं हतो, सो सिर छिपये भर के सहारा की भीख मंगबे कौं आप के पास चले आये हैं। आप सिर छिपये की जगह दिबाय देव, तौ हम तीनौं कहूँ मेहनत मजूरी करकें गुजर-बसर कर लियैं।/ साहब! गाँव में एक पुलिस अफ़सर जाँच के लिये आने वाले हैं, यह बात जानकर राजा साहब ने हमसे एक सादा काग़ज़ पर ज़बरदस्ती अंगूठा लगवाकर हमें गाँव से निकाल दिया है। हमारा और कहीं ठिकाना नहीं था, अतः सिर छिपाने भर के सहारा की भीख माँगने हम आप के पास चले आये हैं। आप सिर छिपाने भर की जगह दिला दो, तो हम तीनों कहीं मेहनत मजदूरी करके गुज़र कर लेंगे।"

विमलसिंह ने इस बीच तीनों व्यक्तियों की परिस्थिति एवं उपयोगिता का अनुमान लगा लिया था- उसे सतिया कुछ अधिक ही उपयोगी लगी थी। उसने अपनी आवाज़ में मिठास लाकर कहा,

"काका, अच्छा किया जो ऐसे में आप लोग मेरे पास चले आये। मेरे पास दो कोठरी हैं- एक में मैं रहता हूँ और दूसरी खाली पड़ी रहती है। जब तक और कहीं इंतज़ाम न हो जाय, आप लोग उसी में रहे। यहाँ पास ही एक बड़ी बिल्डिंग बन रही है, आप लोगों को उसमें काम भी दिलवा दूँगा।"

अंधा क्या चाहे? दो आँखें। तीनों व्यक्ति विमलसिंह के प्रति कृतज्ञता से भर गये थे- कमलिया उसे आशीष देते नहीं अघा रही थी और पस्सराम की आँखों में कृतज्ञता के आँसू छलक आये थे। विमलसिंह ने इन तीनों के लिये कमरे का ताला खोल दिया और पास में लगे ठेले से पूड़ी सब्जी़ लाकर खाने का प्रबंध कर दिया। दूसरे दिन उन्हें मज़दूरी का काम दिला दिया।

विमलसिंह प्रतिदिन सबेरे काम पर निकल जाता था और शाम को ही लौटता था। अभी तक उसका खाना पीना बाहर ही किसी ढाबे पर होता था, परंतु अब कमलिया के कहने और ज़ोर देने पर उसने घर में ही खाना प्रारम्भ कर दिया था। कमलिया और सतिया मिलकर विमलसिंह के काम पर जाने के पहले उसके लिये खाना बना देतीं थीं और शाम को उसके लौटने पर उसे गरम रोटी खिलातीं थीं।

विमलसिंह का व्यवहार उन लोगों के प्रति बड़ा संयत एवं सम्मानपूर्ण था- वह पस्सराम को काका और कमलिया को काकी कहने लगा था। घर में रहने पर ऐसे व्यवहार करता था कि जैसे सतिया से निगाह चुरा रहा हो और अपरिहार्य होने पर ही उसका नाम पुकारता था। परंतु सतिया को यह भान था कि वह चोरी छिपे उसे देख लेता था। सतिया इसका बुरा नहीं मानती थी, वरन् इससे यदा-कदा उसे गुदगुदी ही होती थी। एक शाम खाना खाते समय पस्सराम के बात चलाने पर विमलसिंह जब दिल्ली में अपने राजनैतिक कार्यों के उद्देश्य के विषय में बता रहा था, तो उसने कहा था,

"मैं अभी तक दलित स्त्रियों को अपने काम में साथ नहीं जोड़ पाया हूँ क्योंकि उनमें ऐसी पढ़ी-लिखी स्त्रियाँ जो अपने अधिकारों को समझ सकें और उनके हेतु झंडा उठा सकें, हैं ही नहीं।... मुझे सतिया में ऐसा साहस दिखाई देता है और वह कुछ पढ़ी लिखी भी है। पर सब बातें समझने के लिये और पढ़ने की आवश्यकता है। अगर आप कहें तो मैं सतिया को शाम को पढ़ा दिया करूँ? मुझे लगता है कि एक दिन वह ऊँची जातियों से बदला लेने हेतु हमारे आंदोलन का झंडा उठा सकती है।"

यह सुनकर पस्सराम और कमलिया फिक्क से हँस दिये थे। सतिया द्वारा झंडा उठाना उनके लिये कल्पनातीत हास्य का विषय था। हँसी रुकने पर कमलिया बोली,

"बेटा कहूँ लड़किनी झंडा उठाय कें नेता बनतीं हैं?/ बेटा! कहीं लड़कीं झंडा उठाकर नेता बनती हैं?"

विमलसिंह कुछ बोलता उसके पहले ही सब लोग सतिया का स्वर सुनकर आश्चर्यचकित हो गये थे। वह बीच में बोल पड़ी थी,

"अम्मा, तौ का भओ? हम तौ झंडा उठययैं। /अम्मा, तो क्या हुआ? मैं तो झंडा उठाऊँगी।"

यह सुनकर विमलसिंह के मुख पर हल्की सी स्मितरेखा उभर आई थी। सतिया के स्वर में अटूट दृढ़ता पाकर और साथ ही विमलसिंह के प्रति अपार कृतज्ञता होने के कारण पस्सराम और कमलिया आगे प्रतिरोध न कर सके थे- बस अवाक होकर सतिया को देखते रह गये थे। दूसरे दिन विमलसिंह सतिया को पढ़ाने के लिये हिंदी एवं अंग्रेज़ी की पुस्तकें ले आया और विमलसिंह के कमरे में प्रत्येक रात्रि भोजनोपरांत सतिया का अध्यापन कार्य प्रारम्भ हो गया। विमलसिंह सतिया को पढ़ाने के अतिरिक्त खड़ी बोली बोलना भी सिखाने लगा और शीघ्र ही सतिया की बोली में सुधार होने लगा। शीघ्र ही अपने गाँव की बोली से मिश्रित खड़ी बोली बोलने लगी थी।

विमलसिंह सतिया के रूप से जितना आकर्षित हुआ था, उससे कहीं अधिक उसकी बुद्धि से प्रभावित हुआ। वह एक शाम में सतिया को जितना पढ़ाता, सतिया उससे अधिक रात में गुन लेती थी। पहले चाहे विमलसिंह का लक्ष्य सतिया का मांसल शरीर मात्र रहा हो, परंतु अब उसे लगने लगा था कि सतिया उसकी अंकशायिनी होने के अतिरिक्त उसकी प्रभावशाली राजनैतिक सहयोगिनी भी बन सकती है। इसलिये एक सायं जब पस्सराम ने कहा,

"साहब, आप ने हमायी मुसीबत मैं हमैं बहुत सहारा दओ है, सो हम जिंदगी भर उऋण नाईं हुइ पययैं। कल्ल हमाये संग काम करबे बाले एक मजूर ने हमैं एक कुठरिया दिखाई है, जाको किराओ दस रुपया महीना हैै। पहली तारीख सै हम बाई मैं चले जययैं। /साहब, आप ने हमारी मुसीबत में हमें बहुत सहारा दिया है, जिससे हम कभी उऋण नहीं हो पायेंगे। कल मेरे साथ काम करने वाले एक मजदूर ने मुझे एक कोठरी दिखाई है जिसका किराया दस रुपया महीना है। पहली तारीख से हम उसी में चले जायेंगे।", तो विमलसिंह तपाक से बोल पड़ा था,

"काका कैसी बात करते हो? यह घर क्या पराया है? और फिर काकी की वजह से मुझे सिंकी-सिंकाई रोटी भी मिल जाती है। आप को कहीं मकान किराये पर लेने की ज़रूरत नहीं हैं।"

एक तो विमल सिंह ने यह बात बड़े अधिकारपूर्वक कही थी और दूसरे दस रुपये महीने बच जाने का लालच भी कम नहीं था, अतः पस्सराम ने कृतज्ञतापूर्ण भाव से इस बात पर अपनी मौन स्वीकृति दे दी थी।

महानगर में जीवन जीने और दूसरों को रौंदकर आगे बढ़ जाने के लिये जिस कला एवं चतुराई की आवश्यकता होती है, विमलसिंह उसमें तो अभ्यस्त था ही; राजनीति में रहकर वह दूसरों के मन को पढ़ लेने और अवसर मिलते ही उसका निज-स्वार्थ हेतु उपयोग कर लेने में भी सिद्धहस्त हो गया था। विमलसिंह की दलित चेतना का साध्य समाज सुधार नहीं था वरन् साम, दाम, दंड, भेद का प्रयोग कर जन और धन की शक्ति अर्जित करना और सवर्णों से प्रतिकार लेना था। शक्ति अर्जन के इस प्रयास में वह समस्त मानवीय मूल्यों को ताक पर रख सकता था। यथार्थ में वह उसी प्रकार की ब्राह्मणवादी मानसिकता से ग्रसित था जिसका वह खुलेआम विरोध काता था। उसने देख लिया था कि सतिया के मानस से सरसता निचोड़ ली गई है और वह बदले की आग में जलती रहती है- अतः विमलसिंह इस आग को भड़काये रखकर अपने राजनैतिक हित में उपयोग करने के प्रयास में जुट गया था। वह सतिया को पुस्तकें पढ़ाने के अतिरिक्त राजनैतिक ज्ञान भी दे रहा था। ऐसे ही वार्तालाप के दौरान एक रात्रि विमलसिंह ने उचित अवसर देखकर सतिया की आँखों में झाँकते हुए उसके हाथ पर हाथ रख कर कहा,

"सतिया! कल मेरे साथ सभा में तुम भी चलो।"

सतिया ने अपना हाथ छुड़ाया नहीं क्योंकि उसका चेतन उस समय विमलसिंह के प्रस्ताव पर अमल करने का साहस उत्पन्न करने में व्यस्त था। फिर सतिया के मुख से बेझिझक शब्द निकले, "चलूँगी, लेकिन हमैं अपयें संग रखिये।"

विमलसिंह को उसके उत्तर से हर्षमिश्रित आश्चर्य हुआ था और उसने भावातिरेक में सतिया का हाथ दबा दिया था। सतिया को तब ध्यान आया था कि विमलसिंह देर से उसके हाथ पर हाथ रखे हुए है; और उसने सकुचाकर अपना हाथ खींच लिया था।

उस रात सतिया को देर तक नींद नहीं आई थी। उसे देर तक मोहित की याद आती रही थी। उसकी छवि मस्तिष्क में आने पर सतिया को लगता कि विमलसिंह अपने व्यक्तित्व के प्रभाव से उसे बलात मोहित से दूर खींच रहा है और वह स्वयं भी अपने प्रथम प्रेम मोहित के साथ धोखा कर रही है। फिर इस अंतर्द्वंद्व का शमन उसने इस निश्चय के साथ किया था कि मोहित उसका भूत है जिससे पुनर्मिलन की कोई सम्भावना न के बराबर है, ऐसे में वह अनिश्चित भूत के मोहपाश में फँसे रहने के बजाय अपने वर्तमान को सुदृढ़ करेगी। सतिया के मन में बलात्कार की घटना के उपरांत कोमल भावना केवल मोहित के प्रति ही शेष बची थी और उस रात्रि उसने उस कोमलता को भी अपने मन के कोने में दफ़ना देने का निश्चय कर लिया था। इसके लिये उसके मन ने शीघ्र कुछ ऐसा कर डालने की सोची कि उसके मन में मोहित के लिये शेष मोह भी सदैव के लिये समाप्त हो जाये।

"अम्मा, आज हम इनकी मीटिंग मैं इनके संग जययैं।"

दूसरे दिन सबेरे सतिया ने विमलसिंह को इंगित करते हुए अपनी माँ को अपना निर्णय सुना दिया था। माँ और बापू आश्चर्यचकित होकर बोले थे,

"का?"

विमलसिंह ने स्पष्ट किया कि आज उसकी राजनैतिक सभा है और वह सतिया को उसमें ले जायेगा। दोनों के स्वर की दृढ़ता को भाँपकर माँ और बापू कुछ भी न बोल सके थे। मीटिंग में विमलसिंह ने सतिया को दल की नई सदस्य के रूप में परिचय कराया। यद्यपि सतिया के लिये ऐसी सभा में भाग लेना एक अनोखा अनुभव था, तथापि विमलसिंह के प्रोत्साहित करने पर वह अपनी भाषा में बोली थी,

"आप लोगों जितने पढ़े लिखे तौ हम हैं नाईं, लेकिन हमने ब्राह्मणन-ठाकुरन के अत्याचार खुद देखे और सहे हैं और उनसे बदला लीबे के लैं हम कछू करने को तैयार हैं।"

सतिया के मुख से निकले शब्दों में उसकी दृढ़ता झलकती थी और इन्हें सुनकर सबने ख़ूब तालियाँ बजाईं थीं। कुछ लोलुप भौंरे भी उससे बात करने का बहाना निकालने हेतु बाद में उसकी प्रशंसा करने हेतु उसके पास आये थे। इससे सतिया का न केवल साहस और आत्मविश्वास द्विगुणित हो गया था वरन् विगत रात्रि में उसके द्वारा किये गये निश्चय पर अनुमोदन की मुहर भी लग गई थी।

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उस शाम जब सतिया घर आई, वह कुछ कर गुज़रने के उत्साह से भरी हुई थी, और रात्रि में पढ़ने हेतु विमलसिंह के कमरे में जाने से पहले उसने मुँह धोकर शीशा देखा और अपने बाल भी संवारे। विमलसिंह की पैनी निगाहों ने सतिया के कमरे में घुसते ही यह परिवर्तन भांप लिया था और उसका मन भी बढ़ गया था। आज किताब पढ़ाने के बजाय वह अम्बेडकर के दलित दर्शन के विषय में सतिया को बताने लगा था और इसके दौरान एकटक सतिया के नेत्रों में झाँक रहा था। सतिया भी किसी प्रकार की सकुचाहट प्रदर्शित करने के बजाय उसके नेत्रों से प्रवाहित आवेग को आत्मसात करते हुए उसका प्रतिदान कर रही थी। जब दोनों में निकटता की कामना असह्य होने लगी, तो विमलसिंह ने अपना हाथ बढ़ाकर सतिया के हाथ पर रख दिया था। सतिया के हाथ में हल्का सा कम्पन अवश्य हुआ था, परंतु उसने अपना हाथ हटाया नहीं था। विमलसिंह के मन में इस क्षण की प्रतीक्षा तब से रही थी जब से उसने सतिया को प्रथम बार अपने घर के सामने सिकुड़े-सिमटे बैठे देखा था। सतिया भी विमलसिंह के ज्ञान, बुद्धिमत्ता, सवर्णों के प्रति आक्रोश और अपने प्रति आकर्षण से अत्यंत प्रभावित थी और आज विमलसिंह के स्पर्श से उसके तन के तार ऐसे झनझना उठे थे जैसे कोई सितार के तार छेड़कर उसको द्रुतगति से बजाने लगा हो। विमलसिंह ने हल्के से उठकर दरवाज़े में सिटकनी लगाई और सतिया को अपनी बाहों में भर लिया था। उसके जलते होंठ और गर्म साँसों के स्पर्श से सतिया का अंग अंग पिघलने लगा था। एक कुशल कलाकार की तरह विमलसिंह सतिया के वक्ष, नाभि और जंघाओं को सहलाकर और उनका चुम्बन लेकर उसे उत्तेजित कर रहा था। सतिया जितनी रति-सुख से अभिभूत हो रही थी, उससे अधिक गत रात्रि अपने द्वारा लिये गये कुछ अघटनीय कर गुज़रने के निर्णय की सफलता से अभिभूत हो रही थी। शनैः शनैः वह निःसंकोच विमलसिंह की काम-कीड़ाओं का प्रतिदान करने लगी थी। चरमोत्कर्ष के उपरांत विमलसिंह ने सतिया के कामोत्साह की प्रशंसा की तो सतिया और फूली नहीं समाई थी। कुछ देर पश्चात देर होती देख सतिया ने विमलसिंह को शुभरात्रि का गहरा सा चुम्बन दिया और उठकर अपने कपड़े ठीक-ठाक किये। फिर धीरे से दरवाज़े की कुंडी खोलकर ऐसे आत्मविश्वास के साथ अपने कमरे में आ गई थी जैसे कुछ अघटनीय घटा ही न हो- अघटनीय को अनदेखा कर आगे बढ़ जाने के सोपान पर उसकी यह प्रथम सफलता थी।

आज सतिया ने मोहित को अपने मन के किसी ऐसे कोने में छिपा दिया था कि वह उसके स्वप्नों में भी न आ पाया था और बड़े दिन बाद सतिया आज गहरी नींद सोई थी।

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दूसरे दिन दलित कालोनी में आयोजित एक सफ़ाई अभियान में भाग लेने हेतु विमलसिंह सतिया को अपने साथ ले गया था, जिसमें सतिया ने अनथक कार्य किया था। शनैः शनैः सतिया की सम्पूर्ण दिनचर्या ही राजनैतिक एवं सामाजिक कार्यों की हो गई थी। जिस दिन कोई अन्य कार्यक्रम न होता, उस दिन सतिया विमलसिंह द्वारा लाई हुई पुस्तकें, जिनमें दलित साहित्य प्रमुख होता था, को पढ़ती और समझने का प्रयत्न करती थी। इससे उसे देश के विभिन्न भागों में सामाजिक संरचना एवं सामाजिक यांत्रिकी का गूढ़ ज्ञान प्राप्त हो रहा था, परंतु उसका मन राजनैतिक व्यक्तियों द्वारा स्वहित में किये गये राजनैतिक जोड़तोड़ के प्रकरणों में सबसे अधिक रमता था। विमलसिंह आवश्यकतानुसार उसकी आर्थिक सहायता भी कर देता था। अब दोनों के बीच घनिष्ठता इतनी बढ़ गई थी और रात्रि में सतिया स्वयं विमलसिंह की बाँहों में आ जाती थी।

यद्यपि विमलसिंह पस्सराम से उन लोगों के मानिकपुर गाँव छोड़ने का कारण संक्षेप में जान चुका था, परंतु सतिया के मुख से विस्तार से सुनने के प्रयोजन से विमलसिंह ने एक दिन कामोद्वेग शांत होने पर सतिया की आँखों में झाँकते हुए उससे पूछा था,

"तुम लोग मानिकपुर छोड़कर रुरूनगला क्यों आ गये थे?"

बचपन चाहे कितना भी कष्टप्रद एवं अपमानजनक रहा हो, उसके दौरान प्राप्त किये गये स्पर्श, श्रवण, गंध, दृश्य आदि के प्रथम अनुभव एवं खड़े होने, चलने-फिरने, कूदने-फांदने की सफलताओं के आह्लाद मन में ऐसे बैठे रहते हैं कि जीपनपर्यंत मीठे ही लगते हैं; फिर सतिया के मन के एक कोने में तो मोहित की मीठी यादें भी छिपी हुईं थी। विमलसिंह के प्रश्न से वे यादें एक झटके से सतिया के चेतन मन में उभर आईं एवं अकस्मात उसे लगा कि जैसे मोहित उसे विमलसिंह की बाँहों में देखकर कुढ़ रहा हो और वह उसकी बाँहों से अविलम्ब अलग हो गई थी। फिर कुछ क्षण में अपने को सप्रयत्न सहज करके बोली थी,

"मेरे बापू को उनके चाचा ने पाला था। बापू बचपन से हल्ला ज़मींदार की सेवा करते रहे थे। जब बापू का ब्याह हुआ तो कुछ दिन बाद उनके चाचा ने उनको घर से अलग हो जाने को कहा था, क्योंकि चाचा के घर में उन्हें रखने की जगह नहीं थी। तब मेरे बापू हल्ला ज़मींदार से कहीं कुछ जगह देने की बिनती करने गये थे और हल्ला ने अपनी कोठी से सटी जगह पर मड़हा बनाने की इजाजत दे दी थी। गाँव में इस पर सबको अचरज हुआ था और वह इस मेहरबानी में हल्ला का कोई ख़ास मतलब ढूँढ रहे थे। जल्दी मेरी अम्मा को हल्ला की मेहरबानी की कीमत चुकानी पड़ी थी और वह यह कीमत तब तक चुकाती रही थीं जब तक उस गाँव में रही थीं।

मैं जब 12-13 साल की हो गई थी तो एक दिन ज़मींदार ने नशे में धुत होकर अम्मा को हुकुम दिया था कि रात में तुम मत आना, अपनी बेटी को भेजना। माँ ने गुस्से में नशे से बेहोश ज़मीदार का मुँह नोच लिया था और जब अपने मड़हे में आकर हमें यह बात बताई थी तो हम सबका कलेजा काँप गया था और तभी बापू ने तुरंत सामान बाँधकर रातोंरात गाँव छोड़ने का फैसला ले लिया था। दिन भर की गर्मी के मारे भूखे प्यासे हम शाम को रुरूनगला पहुँचे थे जहाँ हमारी जाति के एक बूढ़े काका ने हमें रात में सहारा दिया था और दूसरे दिन राजा साहब के सामने ले गये थे। राजा साहब ने हमें रहने को मकान दिया था, पर उसकी जो कीमत मैंने चुकाई वह आप जानते ही हैं।"

विमलसिंह ने देखा कि यह कहते कहते सतिया का शरीर क्रोध से काँपने लगा था और उसका मुँह तमतमा रहा था। वह उस समय घायल बाघिन के समान दिख रही थी। फिर उसके मुँह से शब्द ऐसे निकलने लगे थे जैसे बाघिन हुँकार मार रही हो- उसके मुँह से निकल रहा था,

"मैं सत्यानाश करके छो़ड़ूँगी इन ब्राह्मण-ठाकुरों का। इसके लिये चाहे मुझे कुछ भी करना पड़े।"

विमलसिंह सतिया के मुख से निकलने वाले शब्दों को ध्यान से सुनकर आत्मसात कर रहा था एवं उनमें निहित प्रतिशोध की तीक्ष्णता का अनुभव कर रहा था। उसे अपने संगठन में ऐसे ही कार्यकर्ताओं की आवश्यकता थी जो किसी भी मूल्य पर कुछ कर गुज़रने को उद्यत हों।

- क्रमशः


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