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ISSN 2292-9754

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03.20.2017


भीगे पंख
सतिया /एक/दो (१)

 गाँधी, अम्बेडकर आदि समाज-सुधारकों के प्रयत्न एवं संविधान द्वारा प्रदत्त समानता के अधिकार के फलस्वरूप स्वतंत्रता के उपरांत समाज के दबे कुचले वर्ग में जाग्रति आने लगी थी और उसके साथ ही यदा-कदा उनके प्रति किये जाने वाले अत्याचारों के विरुद्ध किसी-किसी की आवाज़ भी सुनाई देने लगी थी। राजनीतिक दल इस वर्ग के हितैषी बनकर अथवा कम से कम ऐसा दिखावा कर चुनाव में इस वर्ग के मत अपने अपने पक्ष में डलवाने के यत्न में जुट गये थे। ऐसे में इस वर्ग का विमलसिंह नाम का एक युवा नेता इस वर्ग को राजनैतिक रूप से संगठित करने में जुट गया था। यद्यपि वह दिल्ली में रहता था परंतु दूरस्थ ग्रामीण इलाक़ो में भी दलितों को संगठित करने के प्रयत्न में जाया करता था। वह रुरूनगला में दलित वर्ग में राजनैतिक चेतना जगाने हेतु आया हुआ था और उसने वहाँ मीटिंग बुला रखी थी। राजा साहब ने अपने कारिंदों से गाँव में ख़बर करवा दी थी कि राजा साहब मीटिंग से प्रसन्न नहीं हैं। अतः मीटिंग असफल हो गई थी क्योंकि राजा साहब की मर्जी़ के विरुद्ध होने वाली मीटिंग में भाग लेना गाँव वालों के लिये निरापद नहीं था। इससे दिल्ली से आये इस युवा नेता को बड़ी निराशा हुई थी, परंतु वह यह भी समझ गया था कि हो न हो यहाँ के दलित किसी के भय के कारण ही मीटिंग में नहीं आये हैं। वह हार मानने वाला नहीं था और उसने वापस लौटने से पहले कई दलितों से अकेले में उनकी सामाजिक दशा के विषय में बात की थी। कुरेदने पर बूढ़े काका ने दबी ज़बान से कह दिया था,

"हिंया तौ हर अछूत कौं एकई मनई को डर रहत है। बे हैं राजा साहब। / यहाँ तो हर अछूत को एक ही व्यक्ति का डर रहता है। वह हैं राजा साहब"

"राजा साहब ऐसा क्या करते हैं जिससे लोग उनसे डरते हैं?"

बूढ़े काका ने सोचा कि जब ओखली में सिर दे ही दिया है, तो मूसलों से क्या डर? और आगे बताने लगे,

"अब का का बतांय? अबै हालई को किस्सा सुन लेउ। उडती़ भई ख़बर है कि पस्सराम की बिटिया के संग राजा साहब ने जबरजत्ती करी है।/ अब क्या क्या बतावें? अभी हाल का ही क़िस्सा सुन लो। उड़ती हुई ख़बर है कि पस्सराम की बेटी के साथ राजा साहब ने ज़बरदस्ती की है।"

फिर बूढ़े काका ने विमलसिंह से अनुनय की थी कि यह ख़बर देने में उनका नाम किसी को कानों-कान पता नहीं चलना चाहिये। विमलसिंह ने उन्हें आश्वस्त कर दिया था।

विमलसिंह उसी रात अँधेरा होने पर चुपचाप सतिया के घर पहुँच गया था। उस समय घर पर केवल सतिया और उसकी माँ उपस्थित थीं। विमलसिंह के गाँव में मीटिंग हेतु आगमन के विषय में ये दोनों पहले ही सुन चुकीं थीं। विमलसिंह ने बड़े आत्मीय एवं आश्वस्त करने वाले ढंग से बात प्रारम्भ की थी, परंतु जब वह सतिया के साथ घटित घटना की जानकारी करने और बदले हेतु क़ानूनी कार्यवाही कराने की बात पर आया तो कमलिया एकदम चुप हो गई थी। कमलिया ने सतिया को भी चुप रहने का संकेत किया था, परंतु सतिया तो भरी बैठी थी। वह एकदम फूट पड़ी,

"हम सब बतैययैं। चाहें जो हुइ जाय हम बदला ज़रूर लियैं। हम हर तरह की कोरट कचहरी को तैयार हैं।/मैं सब बताऊँगी। मैं बदला अवश्य लूँगी। मैं हर तरह की कोर्ट कचहरी को तैयार हूँ।"

कमलिया मन ही मन बड़ी भयभीत हो रही थी परंतु सतिया का निश्चयात्मक दृढ़भाव देखकर वह उसे रोक न सकी थी। सतिया ने घटना संक्षेप में बता दी और विमलसिंह ने उसे एक परिवाद के रूप में लिखकर उस पर सतिया का हस्ताक्षर करा लिया।

विमलसिंह ने चलते-चलते पुनः सतिया को उसके साथ हुए अत्याचार का बदला दिलाने हेुत आश्वस्त किया था। सतिया तो पहले से ही प्रतिकार की अग्नि में जल रही थी, परंतु उसे इसका कोई मार्ग नहीं सूझता था, अतः विमलसिंह द्वारा दी गई आश्वस्ति से सतिया के नेत्रों में उसके प्रति कृतज्ञता के अश्रु छलक आये थे। विमलसिंह ने उसे अपना दिल्ली का पता भी लिख कर दे दिया था, जिससे आगे कोई घटना होने पर उसे पत्र के माध्यम से सूचित कर सके। दिल्ली में विमलसिंह ने सतिया द्वारा लिखे परिवाद की एक-एक प्रति समाचार पत्रों में छपवा दी थी, और एक प्रति उत्तर प्रदेश के गृहमंत्री को अभियुक्त के विरुद्ध कार्यवाही हेतु प्रेषित कर दी थी। चूँकि चुनाव निकट थे, अतः दलित के विरुद्ध अत्याचार की घटना के प्रकाशन से शासन में खलबली उत्पन्न हुई थी और रुरूनगला के थानाध्यक्ष का पुलिस लाइन में स्थानांतरण करने एवं राजपत्रित पुलिस अधिकारी द्वारा जाँच किये जाने के आदेश निर्गत हो गये थे।

"राजा साहब मुझे लाइनहाज़िर कर दिया गया है। मेरी क्या ख़ता है? मैंने तो हमेशा आप का साथ दिया है?"- थानाध्यक्ष ने आदेश मिलते ही राजा साहब के यहाँ उपस्थित होकर कहा था। रुरूनगला में दिल्ली में प्रकाशित समाचार का ज्ञान किसी को नहीं था अतः राजा साहब ने थानेदार को आश्वस्त करते हुए कह दिया था,

"अरे ऐसा कैसे हो गया? मैं आज ही शहर जाकर एस. पी. साहब से मिलता हूँ। आप निश्चिंत रहें।"

परंतु शहर जाकर जब राजा साहब को ज्ञात हुआ कि स्थानांतरण गृहमंत्री के आदेश से हुआ है और राजा साहब के विरुद्ध सतिया की शिकायत पर हुआ है, तब उनके माथे पर क्रोधमिश्रित चिंता की रेखायें उभर आईं थीं। पर राजा साहब इन खेलों के मंजे खिलाड़ी थे; गाँव लौटकर उन्होंने थानाध्यक्ष से बीमारी के आधार पर लम्बी छुट्टी का प्रार्थना-पत्र प्रेषित कर देने को कह दिया था। फिर सायंकाल पस्सराम को बुला भेजा था। बैठक में राजा साहब आराम कुर्सी पर विराजमान थे और सामने पस्सराम को घेरकर तीन लठैत खड़े थे; उनकी मुद्रा से पस्सराम समझ गया था कि आज भगवान ही उसे बचा सकता है। तभी राजा साहब का धीर गम्भीर स्वर निकला थाः

"सुना है अब तुम हमारा मुक़ाबला करोगे?"

राजा साहब साधारणतः गाँव की भाषा में ही बोलते थे परंतु क्रोध में आने पर वह खड़ी बोली में बोलने लगते थे। पस्सराम की भय के मारे घिग्घी बँध गई थी। इससे राजा साहब का क्रोध और भड़क उठा था,

"साले बोलता है कि अभी उठवा के मंगा लें तेरी लौंडिया को?"

आसन्न विपत्ति से बचने हेतु पस्सराम गिड़गिड़ाने लगा था,

"मालिक, माफ़ी देउ। हम आप सै अलग्ग हुइ कें कहाँ जययैं।/मालिक माफ़ी दो। हम आप से अलग होकर कहाँ जायेंगे।"

तब राजा साहब अपने स्वर को और कठोर बनाकर बोले थे,

"हाँ, उसी में तुम्हारी ख़ैर है।"

फिर एक सादा कागज़ दिखाते हुए आगे बोले थे,

"अभी इस पर अपना अँगूठा निशान लगाओ और सतिया और कमलिया का भी लगवा लाओ; और रात में ही किसी को अपना पता बताये बिना गाँव छोड़ दो। आज के बाद किसी को इस गाँव में तुम्हारी किसी की शकल दिखाई दी या तुम्हारे नये पते के बारे में पता चला, तो तुम लोगों की लाश तक का पता नहीं चलेगा। तुम्हारे सबके रास्ता के किराये और खर्च-पानी के लिये तुम्हें रुपये दे दिये जायेंगे।"

कारिंदे के साथ अपनी कोठरी पर वापस आकर पस्सराम ने कमलिया और सतिया से सादा कागज़ पर अँगूठा निशान लगाने और तुरंत सामान बाँधकर गाँव से भाग चलने को कहा, तो सतिया बिफर गई और अपने पिता पर ही बकने झकने लगी। इस पर पस्सराम ने उस सादे कागज़ पर कमलिया का निशान-अंगूठा लगवाने के पश्चात बलपूर्वक सतिया का भी अँगूठा निशान लगाकर कारिंदे को दे दिया और कारिंदे ने उसे सौ रुपये दे दिये। फिर कमलिया और पस्सराम सामान बाँधने लगे और सतिया रोती रही। कमलिया बीच-बीच में सतिया को वहाँ रुकने के भयावह परिणामों को बता कर समझाती भी जा रही थी। सामान बँध जाने पर सतिया के फिर भी टस्स से मस्स न होने पर पस्सराम क्रोधित होकर बोल पड़ा था,

"तौ हम तो जात हैं। तुम अकेले रह कें भुगतौ। / तो हम तो जाते हैं। तुम अकेले रहकर भुगतो।"

तब सतिया समझ गई थी कि उसके पास माँ-बाप के साथ चल देने के अतिरिक्त कोई विकल्प नहीं था और हृदय पर पत्थर रखकर वह भी उनके पीछे-पीछे चल दी थी। गाँव से निकलकर जब यह प्रश्न उठा कि कहाँ जाया जाये, तब सतिया ने याद दिलाया कि चलते समय विमलसिंह ने उसे अपना पता देकर कहा था कि कोई और घटना होने पर उसे बताना। कमलिया को भी उस युवक के व्यक्तित्व में एक सम्बल सा प्रतीत हुआ था और उसने भी उसी के पास दिल्ली चलने की बात का अनुमोदन कर दिया था।



दो दिन बाद पुलिस उपाधीक्षक सतिया के परिवाद की जाँच करने रुरूनगला आये थे। रुरूनगला में रुकने के लिये राजा साहब की कोठी में बने मेहमान कमरों के अतिरिक्त कोई डाकबंगला या होटल नहीं था। पक्षपात के आरोप से बचने हेतु उपाधीक्षक थाने के ही एक कमरे में रुके थे; परंतु फिर भी उनके अनजाने ही राजा साहब ने थाने वालों के माध्यम से यह सुनिश्चित कर लिया था कि उपाधीक्षक के खाने हेतु काजू, अंडा, मुर्गा, मेवा और दूध आदि की आपूर्ति राजा साहब की कोठी से ही हो। राजा साहब का विश्वास था कि नमक अपना प्रभाव अवश्य दिखाता है - चाहे अनजाने में ही खाया जाये।

उपाधीक्षक ने जब पहले दिन थाने पर घटना के विषय में पूछताछ की तो पता चला कि थाने पर घटना की कोई रिपोर्ट दर्ज नहीं है और सतिया का डाक्टरी मुआइना भी नहीं हुआ है। परंतु उन्हें एक दो पुलिसवालों, जो थानाध्यक्ष से किसी कारणवश अप्रसन्न रहते थे, ने दबी ज़ु़बान से घटना की सत्यता बता दी थी और हाजी-नमाज़ी होने के कारण उपाधीक्षक ने राजा साहब के विरुद्ध कार्यवाही का मन भी बना लिया था। परंतु दूसरे दिन जब उपाधीक्षक ने सतिया और उसके परिवार वालों का बयान लेने हेतु उन्हें बुलाया तो उनमें से कोई नहीं मिल पाया और न उनके विषय में कोई यह बता पाया कि वे कहाँ चले गये हैं। बस इतना पता चला कि वे गाँव छोड़कर रातो-रात कहीं चले गये हैं और अपने जाने का स्थान किसी को नहीं बता गये हैं। गाँव के जिन लोगों से पुलिस उपाधीक्षक ने पूछताछ की, उन्होंने या तो बलात्कार की घटना के विषय में पूर्ण अनभिज्ञता प्रकट की अथवा ऐसा भाव दिखाया जैसे किसी फ्रांसीसी से कोई अंग्रेज़ी में सवाल कर रहा हो। उपाधीक्षक ने जब राजा साहब से पूछताछ की तो उन्होंने ऐसा चेहरा बनाया जैसे कोई स्वयं ईश्वर पर निर्दयी होने का आरोप लगा रहा हो। पस्सराम के अचानक गाँव छोड़ जाने के विषय में राजा साहब ने बताया कि वह दूसरे गाँव से कुछ दिन को आ गया था और अपनी इच्छानुसार चला गया है। राजा साहब ने पस्सराम के परिवार के अँगूठा निशान वाला वह काग़ज़ भी प्रस्तुत किया जिसमें उन्होंने किसी से कोई शिकायत न होने और स्वेच्छा से अपने गाँव वापस जाने की बात लिखवा दी थी। बाद में पस्सराम के गाँव में भी जाकर उपाधीक्षक ने जाँच की परंतु वहाँ पता चला कि वह न तो वहाँ वापस गया है और न उसके विषय में किसी को कुछ पता है।

विवश होकर उपाधीक्षक ने अपनी जाँच आख्या प्रेषित कर दी कि सतिया और उसका परिवार गाँव छोड़कर किसी अनजाने स्थान पर चले गये हैं और उसके परिवाद की पुष्टि हेतु किसी प्रकार की कोई साक्ष्य उपलब्ध नहीं है। सतिया के साथ बलात्कार की कोई रिपोर्ट थाने पर दर्ज़ नहीं हैं और सतिया का डाक्टरी मुआइना भी नहीं हुआ है एवं प्रयत्न करने पर भी ऐसी कोई मौखिक साक्ष्य नहीं मिली जिससे बलात्कार की घटना की पुष्टि हो। अतः आरोप अप्रमाणित रहा। इस बीच चुनाव हो गया और राजनैतिक दलों की बलात्कार प्रकरण में रुचि भी समाप्त हो गई। उपाधीक्षक की रिपोर्ट को बिना ना-नुकुर के स्वीकार कर "सीन फ़ाइल" कर दिया गया क्योंकि एक तो वह नियम के अनुसार वैध थी और दूसरे वह राजा साहब को दण्ड से बचाकर सत्ता की निरंकुशता के सिद्धांत की वैधता को स्थापित करती थी।



"बापू! आओ, ऊपर बैठो।"

सीट पर जगह होने पर भी कमलिया और पस्सराम रेलगाड़ी के डिब्बे में सीट पर बैठने का साहस नहीं कर पाये थे और नीचे ही बैठ गये थे। सतिया यह देखकर बिफर गई थी और स्वयं एक सीट पर बैठकर अपने स्वर में अवज्ञा का भाव भरकर माँ और बापू को बुला रही थी। पस्सराम अपनी आत्मा के दैन्य को छिपाने हेतु खींसें निपोरते हुए बोला था,

"हिंयाँ ठंडी हवा आय रही है। हम हिंयईं ठीक हैं। तुम बैठौ।"

सतिया वास्तविक कारण समझ रही थी कि बापू को डर है कि सीट पर बैठने पर कोई उनसे उनकी जाति न पूछ ले और उन्हें अपमानित न कर दे। सतिया को बापू के इस दैन्यभाव पर क्रोध आ रहा था, परंतु परिस्थिति भाँपकर वह चुपचाप बैठकर चलती ट्रेन से पीछे छूटते हुए गाँव, खेत और वृक्ष देख रही थी। जीवन में पहली बार उसने एक रेलवे स्टेशन एवं ट्रेन को देखा था और उसने पहली बार ऐसे लोगों को एक साथ एक प्लेटफ़ार्म पर और फिर एक डिब्बे में बैठे हुए देखा था जिन्हें परस्पर एक दूसरे की जाति अथवा सामाजिक स्थिति का ज्ञान नहीं था। यह देखकर उसे लग रहा था कि ग्रामीण मान्यताओं के बंधनों से मुक्त जीवन का अस्तित्व भी है। उसके मन में स्वतंत्रता एवं स्वच्छंदता का प्रादुर्भाव एवं प्रस्फुटन हो रहा था- सुदूर आकाश में उड़ते पक्षियों के झुंड को देखकर उसे लग रहा था कि इस संसार में कहीं न कहीं ऐसे आकाश भी अवश्य हैं जहाँ वह पंख फैलाकर उड़ सकती है। प्रत्येक पीछे छूटती वस्तु के साथ सतिया अपने भूत की अवांछनीय स्मृतियों, अत्याचार सहने की प्रवृत्तियों और सवर्णों की श्रेष्ठता को स्वीकार करने के संस्कार को पीछे छोड़ती जा रही थी। इस समय वह सभी प्रकार के बंधनों एवं भयों से मुक्त होकर सामाजिक मान्यताओं और प्रथाओं में निहित बड़ों के स्वार्थ को स्पष्ट रूप से देख पा रही थी और उन्हें तथा उनके पोषक वर्ग को उखाड़ फेंकने की बात अपने मन में ठान रही थी।

दिल्ली जैसे अनजाने अनदेखे महानगर में आने वाले अनिश्चित भविष्य की कल्पना मात्र से सतिया के माँ और बापू चिंताग्रस्त थे और वह चिंता उनके मौन में मुखर हो रही थी, परंतु सतिया के मन ने यह यथार्थ स्वीकार कर लिया था कि उनके साथ जो घटित हो चुका है उससे अधिक बुरा घटित नहीं हो सकता है- इसलिये चिंता किस बात की? आज यह विचार भी उसके मन में घर कर रहा था सामाजिक नियम एवं क़ानून केवल बड़े लोगों के हितसाधन हेतु बने हैं और इन बुरे लोगों से बदला उनसे अधिक शक्तिशाली बनकर ही लिया जा सकता है, उसके लिये चाहे समस्त सामाजिक मान्यताओं एवं नियम-कानूनों को तोड़ना पड़े।

बस एक बात सतिया पीछे नहीं छोड़ पा रही थी और वह थी मोहित की याद। प्रत्येक पीछे छूटते दृश्य के साथ उसे लगता था कि वह मोहित से और अधिक दूर होती जा रही है और अब तो आकस्मिक मिलन की सम्भावना भी समाप्त होती जा रही थी। फिर यह विचार आते ही सतिया के नेत्रों में अश्रु भर आये थे कि उसके एकदम अदृश्य हो जाने पर मोहित कितना बेचैन होगा और अकेले में उसे यादकर कितना रोता होगा? फिर वह सोचने लगती कि मोहित भला उसे क्यों याद करने लगा- वह तो कालेज में पढ़ता है जहाँ अनेक लड़कियाँ होंगीं? पर तभी उसे उसके वक्ष पर पिचकारी से रंग डालते हुए मोहित के प्यार भरे नेत्र याद आ जाते और फिर उसकी पलकें भीगने लगतीं। फिर यह सोचकर वह सिहर उठी कि हो सकता है कि रुरूनगला में हुई उसकी दुर्दशा की कहानी मोहित जान गया हो और वह भी उसे अस्पृश्य मानने लगा हो।

- क्रमशः


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