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ISSN 2292-9754

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07.30.2016


भीगे पंख
सतिया /एक/दो

 पस्सराम की नई गृहस्थी धीरे-धीरे राह पर आ गई थी। उसकी यहाँ की कोठरी मानिकपुर वाली झोंपड़ी से कुछ बड़ी थी और इसके बाहर एक छोटा सा आँगन भी था। कमलिया और सतिया अंदर लेटते थे और पस्सराम बाहर आँगन में लेटता था, और यदा-कदा यह आँगन पस्सराम और कमलिया को रात्रि में आवश्यक एकांत भी उपलब्ध करा देता था। पस्सराम को खेत में काम करने के बदले फसल पैदा होने पर और तीज-त्योहार पर इतना अनाज मिल जाता था कि घर का खाने-पीने का काम चल सके। कमलिया और सतिया द्वारा कोठी की झाडू़ बुहारू करने के बदले उन्हें पुराने कपड़े-लत्ते और प्रायः बचा-खुचा भोजन भी मिल जाता था। कमलिया और पस्सराम अपनी नई परिस्थिति से प्रसन्न थे; यहाँ पर उन्हें पिछले दिनों की तरह रोज़-रोज़ हल्ला की गालियाँ भी नहीं खानी पड़तीं थीं। राजा साहब के तो उन्हें दर्शन ही नहीं होते थे, वह तो इस परिवार के लिये भगवान के समान हो गये थे जिनकी कृपा लगातार प्राप्त हो रही थी पर दर्शन दुर्लभ थे। बस कभी-कभी उनके कारिंदे की डाँट-फटकार सुननी पड़ती थी, परंतु वह भी राजा साहब की इन लोगों पर विशेष कृपा भाँप कर इन पर अधिक सख़्ती नहीं करता था।

सतिया न तो पुरानी बातों को भूली थी और न वर्तमान से संतुष्ट थी। मानिकपुर छोड़ने की विवशता का कारण स्मृतिपटल पर आने पर उसके हृदय में हल्ला के प्रति एक ज्वालामुखी प्रज्वलित हो जाता था, और प्रतिकार की अदम्य लालसा उदय होती थी; परंतु हल्ला से प्रतिकार लेने की सम्भावना उसकी कल्पना के बाहर की बात थी। उसके हृदय में प्रतिशोध हेतु जितनी जलन हल्ला के प्रति होती थी, उतनी ही अधिक तीक्ष्णता से मोहित की याद आती थी। मोहित से चिर-विछोह का कारण भी हल्ला ही तो थे। मोहित अब दिन अथवा रात्रि का प्रतिबंध तोड़कर उसके सपनों में आता रहता था क्योंकि अब मोहित के प्रति उसके आकर्षण ने एक किशोरी के कल्पनालोक के प्रथम प्रेम का रूप ले लिया था। यह ध्यान आने पर कि पता नहीं इस जन्म में वह मोहित से पुनः मिल भी पायेगी या नहीं, उसे हल्ला पर अनियंत्रित आक्रोश उभरता था। कभी-कभी वह सोचती रहती कि पता नहीं उनके इस तरह से गाँव छोड़ देने के विषय में मोहित क्या सोचता होगा और पता नहीं अब मोहित उसे याद करता भी होगा या नहीं? और फिर स्वयं ही अपने को आश्वस्त कर लेती कि मोहित तो धवल चंद्र के समान स्वच्छ और सुंदर हृदय वाला है, वह अवश्य अपनी सतिया को याद करता होगा।

सतिया का चंद्र घटाटोप बदली में छिप गया था, और उसे पकड़ने की उसकी लालसा दिन प्रतिदिन तीक्ष्णतर होती जा रही थी।



कहते हैं कि मनुष्य चाहे ईश्वर को देख पाये या न देख पाये परंतु ऊपर बैठा ईश्वर सब पर अपनी नज़र रखता है- पस्सराम के ईश्वर राजा साहब भी ऊँचाई पर बनी अपनी कोठी की बैठक में आराम कुर्सी पर दोनों पैर फैलाकर पसरे हुए दूर-दूर तक अपनी नज़र रखते थे। यद्यपि बैठक के नीचे सफ़ाई करने वाली कमलिया और सतिया उन्हें नहीं देख पातीं थीं, परंतु हुक्का गुड़गुड़ाते हुए वह कई बार यह भाँप चुके थे कि सतिया के बदन के उभार दिनों-दिन निखर रहे थे। उसी अनुपात में राजा साहब का मन उन उभारों से खेलने हेतु विचलित हो रहा था।

राजा साहब ब्लाक प्रमुख का चुनाव लड़े थे और जीत गये थे जिसकी ख़ुशी में तमाम मददगार अफ़सरों, प्रधानों, और अन्य प्रकार से प्रभावशाली सहयोगियों के लिये शानदार दावत का आयोजन किया जा रहा था। और क्यों न होती दावत? ब्लाक प्रमुख के पद को जीतने के लिये राजा साहब ने क्या-क्या पापड़ नहीं बेले थे? अधिकतर प्रधानों को चुनाव के पंद्रह दिन पहले से बुलवा कर अथवा उनका अपहरण करा कर राजा साहब ने अपनी कोठी के विशाल हाल में बंद करवा दिया था। हाल के फ़र्श पर मोटे-मोटे गद्दे बिछवा दिये गये थे और लेटने और सोने का आरामदायक प्रबंध करा दिया गया था। पीने के लिये देशी शराब और खाने के लिये पूड़ी-आलू से मुर्ग-मुसल्लम तक सब कुछ उपलब्ध रहता था। बैटरी चालित रेडियो से विविध भारती स्टेशन से प्रसारित होने वाले फ़िल्मी गाने सुनाये जाते थे। ताश खेलने वालों के लिये ताश की गड्डियाँ उपलब्ध रहतीं थीं तो पूजा करने वालों के लिये पूजा की सामग्री। प्रधानों के घर वालों की खोज-ख़बर लेने और उनकी हारी-बीमारी का समुचित प्रबंध करने के लिये राजा साहब के विश्वसनीय कारिंदे लगे रहते थे। उनके घरवालों का हाल-चाल बताने राजा साहब स्वयं सायंकाल को आते थे। चुनाव के एक दिन पहले सायंकाल राजा साहब ने उस हाल में पतुरिया के नाच का प्रबंध भी किया था जिसे देखने तहसील मुख्यालय से परगनाधिकारी और थानेदार भी आये थे। अधिकतर प्रधानों ने अपने जीवन में इतना सुख प्राप्त करने की कल्पना भी नहीं की थी, अतः अनिच्छा से बंद किये जाने वाले प्रधान भी राजा साहब के कृतज्ञ हो गये थे। फिर अब जब वे राजा साहब का नमक खा रहे थे, तो किसी अन्य को वोट देकर पाप के भागीदार भी तो नहीं बन सकते थे? पाप की भागीदारी की आस्था को ओैर दृढ़ कर देने के लिये वोट डालने हेतु जाने के ठीक पहले राजा साहब ने एक पंडित जी को बुला लिया था, जिन्होंने सभी प्रधानों के हाथ पर गंगाजल का लोटा रखकर शपथ दिलवा दी थी,

"हम गंगा जी की किसम खात हैं कि हमने राजा साहब को नून खाओ है सो बोट राजा साहबई कौ दियैं।/मैं गंगा जी की क़सम खाता हूँ कि मैंने राजा साहब का नमक खाया है, अतः वोट राजा साहब को ही दूँगा।"

अब राजा साहब का नमक खा कर, उनके आतंक का भय खा कर और गंगा की कसम खा कर प्रधानों को अपना वोट राजा साहब को तो देना ही था, अतः राजा साहब भारी मतों से विजयी घोषित हुए थे। उसी जीत के जश्न में आज दावत दी गई थी। अफ़सरों और कुछ ख़ास व्यक्तियों हेतु राजा साहब ने अलग एक कमरे में पीने का भी प्रबंध किया था- शहर से अंग्रेज़ी शराब मँगाई थी। जाड़े की अंधेरी ठंडी रात्रि थी पर राजा साहब द्वारा चढ़ाये गये जाम उनके बदन में ताप भर रहे थे। जब सब लोग खा-पीकर चले गये तो फ़र्श की सफ़ाई करने हेतु आने को पस्सराम के यहाँ कहलाया गया। उस दिन बूढ़े काका के नाती की बारात में पस्सराम गया हुआ था और कमलिया को जाड़ा देकर तेज़ बुखार हो गया था। कमलिया तब भी ज्वर से अर्धमूर्छित सी हो रही थी, अतः उसके जा पाने का तो प्रश्न ही नहीं था। उसने सतिया को कोठी पर जाकर जल्दी से काम निबटाने को कहा। माँ की दशा का ध्यान कर आज सतिया का मन कोठी पर जाने को बिल्कुल नहीं हो रहा था, परंतु दूसरा कोई उपाय न देखकर वह अनमनी सी चली गई थी।

सतिया फ़र्श पर बैठी-बैठी झाडू़ लगा रही थी और राजा साहब अपनी बैठक में रखे हंडे /पेट्रोमैक्स/ के प्रकाश में उसे हिलते-डुलते देख रहे थे। कभी वह सतिया के पृष्ठभाग को हिलते-डुलते देखते और उसके मुड़कर सामने आने पर उसके वक्ष के अग्रभाग को। दोनो ही दृश्य उनमें असहनीय कामोद्दीपन कर रहे थे। सतिया शीघ्रता से काम निबटाकर अम्मा के पास जाना चाहती थी और अपने कार्य में पूर्णतः निमग्न थी। तभी राजा साहब ने उठकर हंडा बुझा दिया और सतिया कुछ समझ पाती, उसके पहले ही किसी ने पीछे से आकर उसका मुँह दबा लिया था और उसे एक गट्ठर सा उठा कर बैठक में ले जा कर उतारा था। फिर बाहर जाकर बैठक का दरवाज़ा बाहर से बंद कर दिया था। कमरे में सतिया ने राजा साहब को कुटिलता से मुस्कराते हुए अपनी ओर आते देखा तो भयवश उसकी घिग्घी बँध गई थी। वह आत्मरक्षा का कोई उपाय सोच पाती, उसके पूर्व ही सतिया राजा साहब की बलिष्ठ भुजाओं में क़ैद थी। राजा साहब ने उसे ऐसे जकड़ रखा था कि उसका दम घुटने लगा था। फिर उसके कपड़े फाड़ते हुए राजा साहब ने उसे पलंग पर लिटा दिया था। सतिया ने जैसे ही उठने का प्रयत्न किया, उसने पाया कि उसके शरीर के अंग-प्रत्यंग के साथ बलात्कार किया जा रहा था। वह जितना अधिक प्रतिरोध करती थी, राजा साहब उतनी ही अधिक निर्दयता से उसके शरीर के अंगों को नोच-खसोट रहे थे। फिर सतिया का प्रतिरोध उसके चीत्कार में बदल गया था और जब सतिया का मानस इस अमानुषी अत्याचार को झेलने में असमर्थ हो गया, तो वह मूर्छित हो गई थी।

फिर भी देर तक राजा साहब उसके शरीर से खेलते रहे थे एवं उसके उपरांत उसे मूर्छित अवस्था में ही राजा साहब के आदमी हाथों में लादकर उसकी कोठरी के दरवाज़े पर ठंडी ज़मीन पर छोड़ गये थे। उसकी कराह सुनकर कमलिया बड़ी कठिनाई से पलंग से उठकर बाहर आई थी और उसके फटे वस्त्र और लहूलुहान बदन को देखकर समझ गई थी कि सतिया नाम देकर भी कोई ग़रीब के सतीत्व की रक्षा नहीं कर सकता है। कमलिया का हृदय दुख और क्षोभ से दग्ध हो रहा था। वह किसी तरह सहारा देकर सतिया को अपनी चारपाई तक ले आई थी और उसके घावों को पानी से साफ़ करने लगी थी। रो-चिल्ला कर अपना दुख जताने की उसमें न तो सामर्थ्य थी और न साहस था। वह जानती थी कि सतिया के साथ हुए दुराचार की बात दूसरों के जान जाने से सतिया की ही बदनामी होगी और भविष्य में उसे कोई व्यक्ति विवाह में स्वीकार भी नहीं करेगा; राजा का तो कुछ भी बिगड़ना नहीं था। अपनी बेबसी में वह बस अपने मुँह से राजा के लिये शाप बुदबुदा रही थीः

"तुम्हायें कीरा परैं.... तुम्हाओ बंस नास हुइ जाइ...... हत्यारे कहूँ के हमाई बिटिया पै नेकऊँ दया नाईं आई...... तुम्हाई बिटिया बहुअन के संगऊँ ऐसोई होइ...... / तुम्हारे कीड़े पड़ें........तुम्हारा वंश नष्ट हो जाय..... हत्यारे कहीं के मेरी बेटी पर ज़रा भी दया नहीं आई.......तुम्हारी बिटिया बहू के साथ भी ऐसा ही हो।"

सतिया स्वयं अपनी परिस्थिति से अनभिज्ञ लेटी हुई थी- बीच-बीच में उसके मुँह से एक कराह मात्र निकल जाती थी। एक बार कराह निकलने के समय उसने अपने नेत्र खोलने का प्रयत्न किया और उसे अपनी पीड़ा का कुछ आभास सा हुआ। फिर उसके नेत्र पुनः बंद हो गये और वह स्वप्नलोक में विचरण करने लगी।

"वह लू भरी दोपहरी में भैंस चराने बाग में गई है...........भैंस बाग के किनारे की खाई पर घास चर रही है।................सतिया को आम के पेड़ पर एक बहुत बड़ा बंदर दिखाई पड़ता है.................सतिया उससे डर कर भागना चाहती है परंतु वह उसे घेर लेता है और सतिया उससे भागने का जितना प्रयत्न करती है बंदर उस पर उतना ही अधिक आक्रामक होने लगता है .......................... बंदर उस पर झपटने लगता है और सतिया चिल्ला उठती है, "मोहित बचाओ, बचाओ.....................मो..हि..त.............", पर मोहित कहीं दिखाई नहीं देता है और वह भय से काँपने लगती है.................."

सतिया को काँपते हुए देखकर कमलिया घबरा उठी और पुकारने लगी,

"सतिया.......मेरी बिटिया.......मेरी लाल...," और सतिया ने आँखे खेाल दीं। वह अचकचाकर माँ की ओर देखने लगी। फिर उसे याद आया कि मोहित तो उससे सदा के लिये बिछुड़ गया है और एक उच्छवास उसके मुँह से निकल गई। अब शनैः शनैः उसे यथार्थ का भान हो रहा था और उसके नेत्रों से दो बड़े-बड़े अश्रु छलक पड़े थे। पूर्ण चेतना में आने पर वह माँ के चेहरे के दयनीय भाव को पढ़ने लगी थी और अपना हाथ उठाकर उसने अपनी आँखों के आँसू पोंछ लिये थे। फिर उन आँसुओं के स्थान पर उनमें भरने लगा था उच्चवर्ग के प्रति एक विष और उनसे बदला लेने की अदम्य उत्कंठा - उस समय एक नई सतिया का जन्म हो रहा था।

- क्रमशः


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