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ISSN 2292-9754

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03.31.2015


भीगे पंख
रज़िया का जन्म

"या अल्लाह........या अल्लाह..................रहम कर...........हाय मरी ...............हाय मरी........................" तहसील फ़तेहपुर के विशाल परिसर में स्थित एक क्वार्टर के सीलनभरे छोटे से कमरे, जिसके फ़र्श और दीवालों का प्लास्टर बेतरतीबी से उखड़ा हुआ था, में बंसखटी पर पड़ी एक कृशकाय औरत कराह रही थी। वह स्त्री सलीमा थी- तहसील फ़तेहपुर के कुर्क-अमीन मीरअली की पहली बीबी। दस साल पहले उसकी शादी मीरअली से हुई थी और आज चौथी संतान के सम्भावित जन्म की पीड़ा से वह छटपटा रही थी। हड्डियों का ढांचा मात्र बची सलीमा से मीरअली का मन कई साल पहले भर गया था और उसने अपनी फुफेरी शोड़षी बहिन से दूसरा निकाह पढ़कर नई बीबी को अलग एक नया मकान ख़रीद कर उसमें रख दिया था। यद्यपि मीरअली की तनख़्वाह और ऊपरी कमाई को मिलाकर अच्छी ख़ासी आमदनी हो जाती थी परंतु शराब और शबाब के शौक के कारण वह घर खर्च के लिये सलीमा को मुश्किल से ज़रूरत भर का पैसा ही देता था, और नई बीबी के आ जाने पर उसमें भी बहुत कटौती कर दी थी। बच्चों को जल्दी-जल्दी पैदा करने और इतने कम पैसे में पालने-पोसने में सलीमा कृशकाय और यक्ष्मापीड़ित सी हो गई थी। जनाब मीरअली को इससे कोई लेना-देना नहीं था; वह नई-नई औरतों और रोज़ नई खुलने वाली बोतल में मस्त रहते थे- हाँ, कभी-कभी मुँह का ज़ायका बदलने के लिये अपनी मर्दानगी सलीमा पर निकाल जाते थे, जिससे संतानों के विषय में उन पर अल्लाह की नियामत बरसती रहती थी। बच्चों के लालन-पालन पर ध्यान देना मीरअली के कर्तव्यों में शुमार नहीं था और सलीमा को चौका चूल्हा के अतिरिक्त फ़ुरसत ही कहाँ थी- इस वजह से तीनों बेटे पूर्णतः उच्छृंखल, लापरवाह और गै़रज़िम्मेदार हो रहे थे। इनमें से किसी को अपनी अम्मी की पीड़ा से कोई मतलब नहीं था और उनसे पूर्णतः निर्लिप्त होकर वे हुड़दंग करने में व्यस्त थे।

मीरअली को आवंटित वह सरकारी क्वार्टर उन्नीसवीं सदी का बना हुआ था, जिसका सीलन भरा एकमात्र कमरा, एक छोटा सा बरामदा और आँगन के कोने में स्थित बदबूदार पाखाना मरम्मत और स्वच्छता के लिये बेहाल दिखाई दे रहे थे- मकान में चारों ओर विपन्नता, एवं अशौच का नंगा नाच हो रहा था। बच्चों की उछल-कूद से खूब शोर शराबा हो रहा था परंतु कोई अम्मी की कराहों की ओर ध्यान नहीं दे रहा था- बस किसी-किसी कराह पर आँगन में डोलती हुई एक मुर्गी अवश्य ऐसे कुड़क उठती थी जैसे उस स्त्री की कराह का भान उसे हो रहा हो। बरामदे के दाहिने भाग में बने चौके में एल्यूम्यूनियम का भगौना, पीतल की बटलोई, लोहे की कलछुल और तवा ऐसे बेतरतीब पड़े थे जैसे वे भी बच्चों की उच्छृंखलता में सम्मिलित हों। किनारों पर मुड़ी हुई एक तश्तरी पर एक अधखाई रोटी पड़ी थी जिस पर मक्खियाँ भिनक रहीं थीं। चौके की दीवाल पर एक छिपकला एक छिपकिली का पीछा कर रहा था और छिपकिली चीं-चीं करके ऐसे भाग रही थी, जैसे उस स्त्री की दुर्दशा को देखकर उस स्थिति में आने से घबरा कर छिपकले से बच रही हो।

"हरामज़ादे! अभी खींचता हूँ तेरा झोंटा।"- कहकर बड़ा लड़का मझले भाई की ओर दौड़ा था क्योंकि उसने बड़े भाई के हाथ से वह अमरूद छीन लिया था जो वह तलैया के किनारे लगे अमरूद के पेड़ पर चढ़कर तोड़ लाया था। मझला भाई बचने को माँ की ओर भागा था। बड़े लड़के के मुँह से ऐसी गाली सुनकर माँ के मुँह से बड़ी कठिनाई से निकल पाया था, "चुप रह मुँहझौसे।"

पर बड़े लड़़के ने माँ की बात सुनी अनसुनी कर दी थी और भाई के बाल पकड़कर तब तक खींचता रहा था, जब तक उसके हाथ से अमरूद नहीं छीन लिया था। सबसे छोटा भाई आँगन के एक कोने में दो ईंटों पर उकड़ूँ बैठा हुआ था। वह फ़ारिग हो चुका था और इसलिये चिल्ला रहा था कि कोई पानी डाल कर धो दे तो वह अपनी चड्ढी चढ़ा सके। साथ ही साथ वह मुर्गे को मुर्गी पर सवार होते देख रहा था और ‘कोहो........कोहो....कोहो...कोहो...’ बोलकर उसे उत्साहित कर रहा था। मीरअली नर-मादा के लैंगिक सम्बंधों में स्वयं और मुर्गे में कोई भेदभाव नहीं करते थे- अपनी ही तरह उन्होंने तमाम मुर्गियों के लिये एक हट्टा-कट्टा चमकती कलंगी वाला मुर्गा पाल रखा था। मुर्गियों की प्रणय-क्रीड़ा मीरसाहब के छोटे बच्चे के लिये कौतुक का विषय होती थी और बड़े बच्चों के लिये कामोत्तेजक। पर यह बात सब बच्चों को मालूम थी कि इसी के परिणामस्वरूप मुर्गियाँ अंडे देतीं हैं जिनमें यदा-कदा अब्बा से एक आध अंडा बच जाने पर उन्हें भी कुछ हिस्सा मिल जाता था।

मीरअली के अब्बा फ़कीरे मुहम्मदपुर के रहने वाले थे। उनके गाँव के ज़मींदार अली मियाँ का बेटा छुन्नन मियाँ तहसील फ़तेहपुर में तहसीलदार तैनात हो गया था। फ़कीरे न सिर्फ़ नाम से फ़कीर थे बल्कि उनकी माली हालत भी फ़कीराना थी। एक दिन जब तहसीलदार अली मियाँ अपने पूरे फौज-फांटे और रुतबे के साथ मुहम्मदपुर आये थे तो फ़कीरे अपनी नवजवान बीबी के साथ उनके सामने दो जून रोटी का इंतज़ाम करने की भीख माँगने चले आये थे। छुन्नन मियाँ फ़कीरे की गिड़गिड़ाहट से अधिक उसकी बीबी के उफनाते हुस्न से द्रवित हो गये थे और वह वापसी में दोनों को अपने साथ फ़तेहपुर लेते गये थे। उन्होंने फ़कीरे को न सिर्फ़ अपना चपरासी बना लिया था, वरन् उनको रहने के लिये एक आउटहाउस भी दे दिया था। फिर छुन्नन मियाँ ने फ़कीरे और उसकी बीबी दोनों को अपनी जिस्मानी और रूमानी सेवा-टहल में लगा लिया था। एक साल बाद मीरअली का जन्म हुआ था, जिससे छुन्नन मियाँ को दिली लगाव था। चार साल बाद छुन्नन मियाँ तहसील फ़तेहपुर से ही तहसीलदार के पद से सेवानिवृत हो गये थे। अपनी सेवानिवृत्ति के बाद भी वह मीरअली की परवरिश में मदद करते रहे थे जिससे वह उर्दू मिडिल फेल होने तक की ‘उच्च’ शिक्षा प्राप्त कर गये थे। मीरअली जब सात आठ साल के थे, तब से फ़कीरे उन्हें आवश्यकता पड़ने पर अपनी जगह तत्कालीन तहसीलदारों की खिदमत में भेजने लगे थे। उन्हीं दिनों में एक रात जब ताहिर खां साहब वहाँ के तहसीलदार थे, और रात में मीरअली उनके पैर दबाने उनके ख़्वाबगाह में घुसे थे तो ताहिर खां साहब ने कमरे का दरवाज़ा इत्मीनान से बंद कर मीरअली को गोद में उठाकर हमबिस्तर कर लिया था। मीरअली दर्द से चीखे पुकारे तो ज़रूर थे पर फिर उसी तरह चुप्पी साध गये थे जैसे उनके अब्बा उनकी माँ को छुन्नन मियाँ द्वारा हमबिस्तर करने पर चुप्पी साध जाया करते थे। मीरअली ने अपनी माँ को छुन्नन मियाँ के साथ अंतरंग स्थितियों में अनेक बार देखा था और अपने पिता द्वारा उस स्थिति की जानकारी को सहजता से स्वीकार करते पाया था। इस वजह से मीरअली के मन में अमान्य काम-सम्बंधों के विषय में विशेष विरोध नहीं था। धीरे-धीरे मीरअली न सिर्फ़ ताहिर खां का बिस्तर गर्म करने के आदी हो गये थे वरन् उनकी निगाह बचाकर उनकी हाला की बोतल चखने के शौकीन भी हो गये थे। किशोरावस्था आते-आते खुद मीरअली को ‘छोटी लाइन’ के साथ साथ ‘बड़ी लाइन’ का शौक भी लग गया था। उनकी उच्छृंखलतापूर्ण उड़ान को नियंत्रित करने का साहस और क्षमता माँ और बाप दोनों में नहीं थी। अठारह साल पूरे करने पर तत्कालीन तहसीलदार ने उनकी ‘सेवा’ से प्रसन्न होकर और छुन्नन मियाँ की सिफ़ारिश पर मीरअली को कुर्क अमीन बना दिया था और बढ़ी आमदनी के अनुपात में उनके शौकों में भी इजाफ़ा हो गया था।

मीरअली के अब्बा को अपने बिगड़े हुए पुत्र के भविष्य के विषय में चिंता सताती रहती थी, अतः उन्होंने मीरअली की नौकरी लगते ही अपने साले की लड़की सलीमा से उनकी शादी का पैगा़म भेज दिया था। उनका ख़याल था कि नेक बीबी के मिल जाने से बेटा का चाल-चलन सुधर जायेगा। हालांकि मीरअली के मामूजान अपने भांजे के कारनामों से वाकिफ़ थे लेकिन कुर्क अमीन का कमाऊ ओहदा देखकर उन्होंने बखु़शी पैगा़म मंज़ू़र कर लिया था- सलीमा उनकी पाँच बेटियों में तीसरी थी और अपनी माली हालत देखकर इससे अच्छे रिश्ते की वह कल्पना भी नहीं कर सकते थे। सलीमा सीधी-साधी पाँच बार नमाज़ पढ़ने वाली लड़की थी- वह खु़दा और ख़ाविंद दोनों से डरती थी। विवाह के बाद जब पहली बार मीरअली रात में शराब के नशे में धुत होकर उसके बिस्तर पर आये थे तो उनके मुँह से आने वाले भभके के कारण सलीमा को उबकाई आने लगी थी और क्षुब्ध होकर वह अपना मुँह फेरकर लेट गई थी। मीरअली के कंधा पकड़कर उसे अपनी तरफ़ मुख़ातिब करने के प्रयत्न पर उसने बड़ा साहस कर बस इतना कहा था, "कम से कम दीन का तो ख़याल रखा करें; यह तो कुफ़्र है।"

यह सुनकर मीरअली का पारा आसमान पर चढ़ गया था परंतु उस दिन वह किसी तरह अपने को ज़ब्त कर गये थे। पर जब सलीमा रोज़-रोज़ ऐसे एतराज़ात करने लगी, तो एक दिन मीरअली अपने आपे से बाहर हो गये थे,

"साली बड़ी ख़ानदानी बनती है.................... मारते मारते हड्डी पसली एक कर दूंगा।"

यह सुनकर सलीमा को तनफ़नाकर चारपाई से उठते देख मीरअली का गु़स्सा बेकाबू हो गया था और उसने सलीमा का झोंटा पकड़कर उस पर लात घूंसा बरसाना शुरू कर दिया था और तभी छोड़ा था जब सलीमा बेहोश हो गई थी। सलीमा को जब होश आया था तब उसे उस घर में अपनी औकात का भान हो गया था। उसकी नाक की हड्डी टूटकर झुक गई थी और उसी प्रकार उस घर में उसकी नाक भी झुक गई थी। सबेरे उसने दबी जु़बान से अपने सास-ससुर से इसकी शिकायत की थी, तो ससुर बस इतना बोले थे,

"क्या करें, लौंडा हमारे कंटोल से बाहर है।"

सलीमा जानती थी कि उसके अपने अब्बा से कहने सुनने का कोई लाभ नहीं होगा और मीरअली से और अधिक प्रतिरोध करने का परिणाम उसकी और अधिक मारपीट सहना ही होगा, और उसके मन में यह भय भी समाया हुआ था कि कहीं तैश में आकर मीरअली तीन बार तलाक न कह दे, अतः वह आँसू के घूंट पीकर रह गई थी और उसने अपना मुँह सी लिया था। विवाहित जीवन के समस्त रंगीन सपने तिरोहित हो गये थे और उनका स्थान प्रताड़ना, अपमान एवं अनिश्चितता की अनिवार्यता ने ले लिया था। उसे अब बस खु़दा का सहारा रह गया था- वह रोज़े-नमाज़ में और अधिक तल्लीन रहने लगी थी।

अब मीरअली पूर्णतः अपनी मर्जी़ का मालिक हो गया था- रोज़-रोज़ पीने, जुआ खेलने और बदचलन औरतों के साथ रातें बिताने की दिनचर्या पूर्ववत चल पड़ी थी। उसकी ज़्यादातर आमदनी भी अपने शौक पूरा करने में खर्च हो जाती थी और सलीमा को घर का ख़र्च चलाने को इतना कम पैसा मिलता था कि खाने के लाले पड़े रहते थे। उस पर मीरअली ने सलीमा को बच्चों की किल्लत कभी नहीं होने दी थी और हर दो साल में सलीमा की ज़िम्मेदारी एक नये प्राणी को खिलाकर जिंदा रखने की बढ़ा देता था। इसी बीच मीरअली के माँ बाप अल्लाह को प्यारे हो गये और मीरअली ने उनका शोक शीघ्र ही अपनी नवयुवती फुफेरी बहिन से दूसरा निकाह कर मनाया था। रोज़-रोज़ की चखचख से बचने के लिये नई बीबी को अलग एक नये मकान में रख दिया था।

कुपोषण के कारण सलीमा इतनी कमज़ोर थी कि उसके पेट में पल रही रज़िया को कभी भरपूर खु़राक नहीं मिल पाती थी, और अपनी अम्मा के पेट में आये उसे अभी आठ महीने भी पूरे नहीं हुए थे कि आज उसे बाहर आने की जल्दी हो रही थी। सलीमा प्रसव पीड़ा से तड़फड़ा रही थी और बड़े बेटे को डाँटने के श्रम मात्र से क्लांत होकर अर्धमूर्छित सी होकर शांत हो गई थी। उसके शांत हो जाने पर उस घर में अनवरत होने वाले कोलाहल का एक कोना शांत हो गया था, जिससे बड़े बेटे का ध्यान माँ की ओर चला गया था और उसे निर्जीव सा देखकर वह पड़ोस की नज़मा खाला को बुलाने चला गया था। नज़मा खाला के आते-आते रज़िया ने माँ के पेट में फिर हड़कम्प मचा दिया था और सलीमा फिर कराहने लगी थी और इसी बीच रज़िया पेट के बाहर बंसखटी पर खिसक आई थी। दोपहर की भीषण गर्मी, चिलचिलाती धूप की चकाचौंध, और भाई-बहिनों की चिल्लपों के कारण पेट के वातानुकूलित वातावरण के बाहर आते ही रज़िया के मानस को गम्भीर धक्का लगा था, और उसने अपने को सर्वथा असहाय और निरीह पाया था। माँ की मूर्छित सी अवस्था के कारण उसे ममत्व की सुरक्षा भी अविलम्ब प्राप्त न हो सकी थी- भाग्यवश नज़मा ख़ाला उस समय तक आ पहुँची थी और उन्होंने अपने अनुभवी हाथों से किसी तरह जच्चा-बच्चा की जान बचा ली थी। नज़मा ख़ाला ने ही सर्वप्रथम उस शिशु को रज़िया के नाम से पुकारा था और फिर वही उसका नाम पड़ गया था।

ज्यों ज्यों दिन बीत रहे थे, रज़िया को अपनी असहायता और दूसरों की अपने प्रति उपेक्षा के ऋणात्मक अनुभवों से ही गुज़रना पड़ रहा था। खाट की चादर भीग जाने पर उसके देर तक रोते रहने पर भी उसकी माँ काम छोड़कर उसके पास नहीं आ पातीं थीं। भूखी होने पर उसकी माँ अपना वक्ष तो उसके मुँह में दे देतीं थीं परंतु उनमें से दूध कम ही निकलता था। उसके अधिक रोने चिल्लाने पर उसके भाई अक्सर उसे दुलराने के बजाय उस पर चिल्ला पड़ते थे। अब्बा अगर कभी घर आते भी थे तो प्रायः नशे में धुत रहते थे, और किसी न किसी बात पर उसकी माँ अथवा भाइयों पर लात घूँसों से पिल पड़ते थे। ये दृश्य देखकर वह घबराहट में काँप-काँप जाती थी। उसके मन में यह धारणा स्थापित हो रही थी कि संसार अत्याचारी है और वह स्वयं असहाय; अतः धीरे धीरे वह अपने को एक कोकून के अन्दर बंद किये ले रही थी। क्योंकि कोकून के बाहर उसे उसको लील जाने को आतुर वितृष्णा, आतंक और अन्याय का अनंत सागर हरहराता हुआ दिखता था जिसमें डूबने से बचने हेतु वह अपनी कल्पना में बुने हुए कोकून में बंद रहना चाहती थी।


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