अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली
ISSN 2292-9754

मुख पृष्ठ
12.18.2014


भीगे पंख
मोहित का जन्म

मानिकपुर ग्राम की भादों माह के कृष्णपक्ष की द्वितीया की वह रात्रि उस मौसम की घोरतम कालिमामय रात्रि थी- सायंकाल के पूर्व ही आकाश शांत और गम्भीर होने लगा था और फिर शनैः शनैः पश्चिम दिशा से भूरे और काले रुई के भीमकाय फोहों जैसे बादल आकाश में छाने लगे थे- पहले इक्के-दुक्के फुटकर और फिर घटाटोप। सूर्यास्त होते ही घने अंधकार का साम्राज्य समस्त ग्राम में फैल गया था। घनघोर वर्षा की आशंका के कारण चरवाहे अपने ढोरों को जल्दी ही घर वापस ले आये थे। खेतों और बागों में दाना-कीड़ा चुगने वाले मोर, आँगन में फुदकने वाले गौरैया, और गाँव में मटरगश्ती करने वाले कुत्ते आने वाले तूफ़ान का पूर्वाभास पाकर आज जल्दी ही अपने अपने शरणस्थलों में दुबक गये थे। फिर जब धुँधलका होने पर पश्चिम दिशा में भयावह कड़क के साथ तड़ित चमकी थी तो सभी मयूर भयभीत होकर एक साथ आर्तनाद कर उठे थे। इसके साथ ही बूँदा-बाँदी प्रारम्भ हो गई थी- और फिर चीत्कार करती आँधी के साथ मूसलाधार वर्षा। प्रतिदिन रात्रिकाल में प्रति पहर/लगभग 3 घंटे/ की समाप्ति पर ‘पेंउ-पेंउ’ की टेर लगाने वाले मयूर आज बादलों की हर गरज पर अपने भय पर नियंत्रण खो बैठते थे और चीत्कार कर उठते थे। प्रत्येक रात्रि की भाँति आज ज़मींदार लालजी शर्मा की बैठक में चुटकुले कहने वालों, किसी की बहू-बेटी के कृत्यों को नमक-मिर्च मिलाकर कानाफूसी करने वालों अथवा भूत-प्रेत के किस्से सुनाने वालों का जमावड़ा नहीं हुआ था। उनकी हवेली के भीमकाय फाटक के सामने की गली के पार बना पक्की ईंट का लम्बा सा कमरा और उसके सामने का बड़ा सा चबूतरा, जिस पर कमरे से सटे भाग पर छप्पर छाया हुआ था, को बैठक कहते थे। छप्पर के बाँयी ओर एक तख्त, एक-दो चारपाई एवं कुछ कुर्सियाँ पड़ी रहतीं थीं। तख्त के ठीक सामने लालजी शर्मा के परबाबा द्वारा बनवाया हुआ चार कंगूरों वाला बड़ा सा कुआँ था- चारों कंगूरों के बीच लोहे की रेल लगी हुई थी और प्रत्येक रेल पर लोहे की गरारी लगी हुई थी, जिससे एक साथ चार व्यक्ति रस्सी को लटकाकर बाल्टियों में पानी भर सकते थे। कुएँ के चारों ओर बैठकर नहाने के लिये अष्टकोणीय पक्का फ़र्श बना था जो किनारे पर बनी मिड़गारी से घिरा हुआ था। ‘अछूत’ जातियों के लोगों को छोड़कर अन्य सभी लोग इसी कुएँ से पानी भरते थे- ‘अछूतों’ को इस कुएँ से पानी लेने की अनुमति नहीं थी और उन्होंने अपने लिये अपने मुहल्ले में एक छोटी सी कच्ची कुइयाँ खोद रखी थी। रात्रि के आगमन पर गपशप के लिये गाँव के लोग यहीं चबूतरे पर छप्पर के नीचे बैठते थे- लालजी शर्मा तख्त पर, अन्य ब्राह्मण तथा उच्च जाति वाले कुर्सी अथवा चारपाई पर, कुम्हार, काछी, बढ़ई, लोहार, भुर्जी, नाई जैसी बीच की जातियों के लोग कुएँ की मिड़गारी अथवा चबूतरे पर पड़ी मूँज की आसनी पर, और चमार, कोरी, धानुक, बेड़िया आदि ‘अछूत’ मानी जाने वाली जातियों के लोग उनसे दूर एक साथ चबूतरे के किसी खाली स्थान पर तथा भंगी, जो ‘अछूतों’ के लिये भी अछूत थे, सबसे दूर किसी कोने में दुबककर। आज घनघोर वर्षा के कारण लोग-बाग चबूतरे पर इकट्ठे नहीं हुए थे और जल्दी ब्यालू/रात्रि का भोजन/ कर सोने चले गये थे। लालजी शर्मा के सहन में पुराने छप्परों के नीचे बँधे हुए गाय-भैंस भी ऊपर से टपकते हुए पानी से भीगते हुए सहमकर चुप थे- बस एक हाल में ब्यायी हुई गाय अपने बछड़े को भींगते देखकर कभी-कभी रम्भा देती थी। उनकी हवेली के सामने से गुज़रती हुई गली में छतों के परनालों से बहता पानी कहीं-कहीं कलकल की ध्वनि तो कहीं-कहीं पटर-पटर का कर्कश स्वर उत्पन्न कर रहा था। गली में बहते पानी में भीग कर आनंद लेने वाले कुछ मेंढक तो किर्र-किर्र बोल रहे थे और कुछ युवा-नर गला फुलाकर टर्र-टर्र की गुहार लगाकर मेंढकियों को पुकार रहे थे। तेज़ी से चलती वायु से चबूतरे पर खड़े नीम के पत्ते साँय-साँय कर रहे थे- कभी-कभी गाँव की सुरंग रूपी गली में फँस जाने वाली हवा एक भुतहा ध्वनि पैदा कर रही थी। प्रकृति की यह रोमाँचित करने वाली ध्वनियाँ घटाटोप अंधकार के मध्य रुक-रुक कर चमक जाने वाली आकाशीय विद्युत के प्रकाश में और भयावह हो जाती थीं।

"टुड़ई कक्का! जल्दी सै चन्नी काकी कौं बुलाय लाउ," लालजी शर्मा के भाई शिवदयाल शर्मा का स्वर विह्वलतापूर्ण एवं आदेशात्मक था तथापि टुड़ई को सम्बोधन आदरसूचक था - मानिकपुर में जहाँ एक ओर जाति-पाँति आधारित ऊँच-नीच का भाव प्रत्येक व्यक्ति के मानस में सदैव विद्यमान रहता था वहीं सभी बड़ों को कक्का, चच्चा, बबा, बुआ, भौजी जैसे सम्बोधनों से पुकारने का प्रचलन भी था। सिर पर एक पुराना बोरा डालकर टुड़ई कक्का चन्नी/दाई/ के घर को चल दिये थे। उस समय घनघोर वर्षा की रात्रि में गाँव के लगभग सभी घरों में सूता पड़ चुका था, परंतु लाल जी शर्मा की हवेली में कोई नहीं सोया था- सभी के मन व्यग्र एवं चिंतित परंतु आशामय थे। हवेली के केंद्र में एक चौकोर आँगन था जिसके चारों ओर मोटे-मोटे हाथी के पाँव की तरह के खम्भों वाले बरामदे थे और उनके पीछे लम्बे-लम्बे कमरे बने थे जो मड़हे कहलाते थे। दक्षिण के बरामदे और उसके बाद के कमरे से होकर बाहर निकलने का रास्ता था। इस कमरे के बाहर एक लम्बा-चौड़ा सहन था जिसके बायीं ओर गाय-भैंस बाँधे जाते थे, सामने पंडित बर्फी़लाल का मकान था और दायीं ओर सहन से बाहर निकलने को एक लकड़ी का नक्काशीदार भीमकाय फाटक था। फाटक के सामने गाँव की प्रमुख गली थी। चूँकि हवेली गली के स्तर से कई गज ऊँचाई पर बनी थी, अतः सहन से गली तक ढलान था। हवेली के उत्तरी मड़हे के पीछे काफी ज़मीन खाली पड़ी थी जिसमे घास-फूस और झाड़ियाँ उगी हुईं थीं। बीच-बीच में बेर के बड़े-बड़े पेड़ खड़े हुए थे, तथा कहीं-कहीं पपीता और तोरई के पौधे लगाये गये थे। यद्यपि साधारणतः हवेली के सभी लोग प्रातःकाल मुँह-अँधेरे निवृत होने लोटा लेकर खेत में जाते थे, परंतु रात-बिरात घर की औरतें इस झाड़-झंखाड़ के बीच भी काम चला लेती थीं।

पश्चिमी मड़हे, जिसके छत की शहतीरें रोज़ाना जलने वाले दीये के धुएँ से काली हो चुकीं थीं और दीवालें भी ललछौही हो गईं थीं, की पीछे की दीवाल में बने आले में एक कड़ु़ए तेल का दीया जल रहा था। यद्यपि दीये की लौ लम्बी और सशक्त थी, परंतु आँगन से होकर आने वाले हवा के झोंके इसे बुझाने का अनवरत प्रयास कर रहे थे। मड़हे की दक्षिणी दीवाल से सटा हुआ एक पुराना मोटे-मोटे मचवों वाला लकड़ी का पलंग पड़ा हुआ था, जिस पर लेटी हुई पारू प्रसव पीड़ा से कराह रही थी। कमरे में धूप और लोबान का धुआँ भरा हुआ था- और धूपबत्ती के पास अम्मा /पारू की सास / बैठी हुई थीं, जो बीच बीच में उठकर पारू के माथे पर हाथ रखकर उसको ढाढ़स बँधा रही थीं।

टुड़ई कक्का के जीवन के साठ वर्षों में ऐसे गिने-चुने दिन ही होंगे, जिनका अधिकांश इस हवेली के सहन में न बीता हो- अपनी पैदाइश के बाद एक माह बीतते-बीतते उनकी माँ उन्हें गोद में लेकर हवेली के सहन में बँधने वाले गाय-भैंस का गोबर बटोरने आने लगीं थीं। तीन साढ़े तीन साल की उम्र के बाद वह खुद भी अपनी नन्हीं-नन्हीं कोमल हथेलियों से माँ के काम में हाथ बँटाने लगे थे। थेाड़ा बहुत समझदार होते-होते टुड़ई कक्का समझ गये थे कि भगवान ने उन्हें हवेली में रहने वाले मालिकों की सेवा के लिये ही बनाया है और हवेली वालों का नमक खाने के कारण उनके मन में हवेली वालों के प्रति अटूट स्वामिभक्ति का भाव भर गया था। अब अपनी आयु के कारण हवेली में वह कक्का अथवा बबा कहलाते थे और अपनी अस्पृश्यता एवं तुच्छता का पूरा भान होते हुए भी उनमें हवेली वालों के प्रति अपनत्व का भाव था। उन्हें मालूम था कि उनके बाप और बाबा का पेट भी इसी हवेली के सहारे पला था और वह बचपन से हवेली के साथ ऐसे रम गये थे कि हवेली की चाकरी के अतिरिक्त अलग अपना कोई अस्तित्व सोच ही नहीं सकते थे। आज के पहले भी कई बार वह चन्नी काकी को बुलाकर इस हवेली में लाये थे। चन्नी काकी ही इस गाँव की एकमात्र दाई थीं जो हर घर में ऐसे अवसर पर बुलाई जातीं थीं। यद्यपि वह भंगी जाति की थीं और साधारण परिस्थितियों में अस्पृश्य थीं, परंतु गोरेलाल पंडित जी /पुरोहित/ ने व्यवस्था दे रखी थी कि आपातकाल में अस्पृश्य को स्पर्श की अनुमति दी जा सकती है बशर्ते आपातकाल के बीत जाने पर विधिपूर्वक शुद्धिकरण कर लिया जाय। अतः प्रसव क्रिया के दौरान चन्नी काकी को जच्चा और बच्चा दोनों को छूने की अनुमति थी।
मूसलाधार बारिश से बचने के लिये टुड़ई के सिर पर पड़ा पुराना बोरा पर्याप्त नहीं था परंतु टुड़ई कक्का का ध्यान तो हवेली में आने वाली संतान और उसकी माँ की कुशलता में रमा हुआ था और वह मन ही मन राम-राम जपते जा रहे थे। इस चिंता का एक कारण भी था कि दो वर्ष पूर्व जब वह चन्नी काकी को बुलाकर लाये थे और शिवदयाल शर्मा की पत्नी ने सुंदर से पुत्र को जन्मा था तो वह शिशु केवल 24 घंटे जीवित रहा था। चन्नी काकी का कहना था कि उसे ‘जमोगा’/डिप्थीरिया/ हो गया था। उन दिनो गाँव में बच्चे का जन्म जच्चा और बच्चा दोनों के लिये बड़ा जोखिम भरा होता था। टुड़ई की अपनी तीन संतानें जन्म के एक सप्ताह के अन्दर कालकवलित हो गईं थीं। गाँव के पश्चिमी कोने में काछियों के घर थे और उनमें से भग्गी काछी की उन्नीस संतानों में तो केवल एक कन्या ही बची थी।

"चन्नी भौजी! जल्दी चलौ" टुड़ई ने चन्नी के मड़हे के सामने पहुँचते ही आवाज़ लगाई। चन्नी मक्का की रोटी अचार के साथ खाकर मड़हे के भीतर पड़ी बंसखटी पर लेट चुकी थी और उसकी आँख लग गई थी। अतः टुड़ई की पुकार सुनकर वह घबराहट में उठी और फिर संयत होकर बोली,

"काये? का पेट मैं पीर सुरू हुइ गई है?/ क्यों क्या पेट में पीड़ा प्रारम्भ हो गई है?/"

चन्नी रोज़ सुबह पारू बहू की मालिश करने हवेली जाती थी और उसे आभास था कि किसी भी समय पीर प्रारम्भ हो सकती है। वह टुड़ई के उत्तर की प्रतीक्षा किये बिना ही अपनी गुदड़ी जैसी फटी पुरानी चादर ओढ़कर मड़हे से बाहर निकल आई। चन्नी को बरसते पानी से बचाने को टुड़ई ने अपने द्वारा ओढ़े हुए बोरे के आधे भाग को चन्नी के सिर पर डाल दिया। चन्नी विधवा थी और टुड़ई विधुर। टुड़ई चन्नी पर दिल रखते थे और चन्नी को इसका आभास था परंतु उमर के शर्म-लिहाज़ के कारण बात कभी बढ़ नहीं पाई थी। रास्ते के घने अंधकार में टुड़ई ने देवर-भौजी के नाते का छोटा-मोटा लाभ उठाने के लिये हाथ बढ़ाया था परंतु चन्नी ने हाथ झटक दिया था। हवेली पहुँचते ही चन्नी ने पानी गरम करने को कहा और पारू बहू के कमरे में जाकर प्रसव प्रक्रिया में सहायता देने लगी थी।
तभी आकाश में भयंकर वज्रपात हुआ और और उसके साथ ही मड़हे से किहों-किहों की आवाज़ आई, जिसे सुनकर बाहर प्रतीक्षारत टुड़ई समेत सबके चेहरों पर मुस्कराहट दौड़ गई थी। कुछ देर बाद चन्नी मड़हे से निकलकर मुस्कराती हुई बोली,

"लड़का भओ है, मुँहमाँगो नेग लियैं। /लड़का हुआ है। मुँहमाँगा इनाम लूँगी।/"

फिर सबकी प्रसन्नतापूर्ण मुस्कराहट देखकर आत्मश्लाघा के भाव से आगे कहने लगी,

"जा लड़का ने जलम लीबे मैं मेरोऊ पसीना छुटाय दओ। पाइन के भर निकरो है और मूंड़ बाहर निकरबे मैं तौ मेरी साँस अटकी रही। ता पै जैसेई बाहिर आओ, तभईं बज्जर जैसी बिजली कड़की, जाकी चमक भीतर मड़हा लौ मैं फैल गई।/ इस लड़के ने जन्म लेने में मेरा भी पसीना निकाल दिया। पैरों के बल पैदा हुआ है और सिर के बाहर निकालने में तो मेरी साँस अटकी रही। उस पर जैसे ही पैदा हुआ, तभी वज्र जैसी बिजली कड़की, जिसकी चमक अंदर मड़हा तक में फैल गई।/"

वर्ष 1940 में मानिकपुर की जनसंख्या लगभग 800 हो गई थी। कुल 55 घरों में आठ घर ब्राह्मणों के थेः इनमें से तीन घर- लालजी शर्मा एवं शिवदयाल शर्मा का घर, अशर्फी़लाल एवं बर्फी़लाल शर्मा का घर, एवं कमलप्रसाद शर्मा उर्फ़ हल्ला का घर- के लोग इस गाँव को बसाने वाले पंडित सुकुवासीलाल शर्मा की संतानों में से थे और वही गाँव के ज़मींदार थे, शेष ब्राह्मण सुकुवासीलाल द्वारा गाँव बसाने के बाद आकर बसे थे और काश्तकार थे। पंडित सुकुवासीलाल मूलतः तिरवा के पास के एक गाँव के रहने वाले थे, जहाँ हैजा का गम्भीर प्रकोप होने पर उनके अधिकतर घरवाले कालग्रस्त हो गये थे और फिर भी हैजा का प्रकोप शांत नहीं हो रहा था - सभी प्रकार की दवायें और पूजा-पाठ निष्फल होते पाकर सुकुवासीलाल एक दिन बचे-खुचे लोगों को बैलगाड़ियों में बैठाकर और माल-अस्बाब लादकर कुदरकोट चले आये थे। उनके साथ उनके गाँव के कुछ अन्य जातियों के लोग भी चले आये थे। कुदरकोट के ज़मींदार तिवारी जी थे जिनसे सुकुवासीलाल की दूर की रिश्तेदारी थी। तिवारी जी ने अपनी ज़मींदारी में से कुछ ज़मींदारी सुकुवासीलाल को बेच दी थी और उन्होंने उस पर होकर बहने वाले बम्बा / छोटी नहर/ के किनारे ग्राम मानिकपुर बसाया था। यह बम्बा /नहर/ न केवल ग्राम के खेतों के सींचने के काम आता था, वरन् शौच, स्नान, तथा जानवरों और मनुष्यों की प्यास बुझाने के काम भी आता था। यह ग्राम के बच्चों के लिये जलक्रीड़ा का साधन भी था। गर्मियों में बम्बा के किनारे खड़े आम के वृक्षों से टपककर बहे आमों को ढूँढने हेतु बम्बा में कूदने को बच्चे-बूढ़े सभी लालायित रहते थे- बहते आमों को रोकने हेतु वे स्थान-स्थान पर तलहटी में गड्ढे भी कर देते थे। इस बम्बा के कारण मानिकपुर गाँव के खेतों में पैदावार बम्बा से दूर स्थित गाँवों के खेतों की अपेक्षा कहीं अधिक होती थी तथा आम, जामुन, बेल, कैथा, बेर, अमरूद आदि फलों की उपलब्धता प्रचुर मात्रा में रहती थी। अतः जल्दी ही इस गाँव में काछी, कुम्हार, बढ़ई, लुहार, नाई, भुर्जी, कोरी, चमार, धानुक, बेड़िया और भंगी जातियों के लोग आकर बस गये थे। सुकुवासीलाल ने ग्राम में उन सभी की आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए उन्हें बसने की अनुमति दे दी थी। कुछ लोगों को मुख्य ग्राम से कुछ दूर स्थित दो पोखरियों के किनारे बसाया गया था- ये पटयाइत और कदमपुर नाम के दो मजरे बन गये थे। चमारों और कोरियों को गाँव के दक्षिणी किनारे पर कुछ दूरी पर बसाया गया था और चूँकि ग़रीबी के कारण वे मकान नहीं बना सकते थे और मड़इयों / फूस की झोपड़ी/ में रहते थे अतः उनकी आबादी को मड़इयन कहा जाता था। भंगी अन्य अस्पृश्य जातियों के लिये भी अस्पृश्य थे, अतः उन्हें सबसे अलग पोखरी के गंदे किनारे से सटाकर मडै़इयाँ डालने की अनुमति मिली थी।

गाँव के लगभग सभी ‘अछूत’ जातियों के लोग भूमिहीन थे और ज़मींदारों पर पूर्णतः आश्रित थे। वे उनके यहाँ मज़दूरी अथवा उनकी दयादृष्टि होने पर उनकी ज़मीन पर बटाई पर कार्य करते थे। बीच की जातियों के लोगों के पास थोड़ी बहुत अपनी ज़मीन थी परंतु वे भी प्रायः ज़मींदारों की ज़मीन पर बंटाई के आधार पर खेती करते थे और अपने पुश्तैनी पेशे के अनुसार मिट्टी के बर्तन बनाने, चारपाई-कुर्सी आदि बनाने, बाल काटने, सब्जी़ उगाने, भाड़ भूंजने आदि का काम करते थे। गाँव की अधिकतर ज़मीन पर स्वामित्व ज़मींदारों का था और इसके बदले वे सरकार को मालगुज़ारी देते थे, परंतु मालगुज़ारी देने के बाद उनका पूरा अधिकार था कि उस ज़मीन को किसको खेती हेतु दें और उसके बदले उनसे कितनी बेगार लें अथवा उनके साथ कैसा व्यवहार करें। यह प्रबंध अंग्रेज़ों के हित में बड़ा उपयुक्त था क्योंकि उन्हें ग़रीब किसानों से किसी प्रकार की वसूली करने का झंझट मोल नहीं लेना होता था और ज़मींदारों द्वारा किसानों पर की जाने वाली जो़र-ज़बरदस्ती के लिये किसान अंग्रेज़ों को दोषी नहीं समझते थे। इस भूमि प्रबंध से ज़मींदारों का अपनी रियाया पर नियंत्रण इतना कठोर हो जाता था कि अधिकतर किसानों की दशा दास जैसी रहती थी। कामगारों के कार्य अथवा उनके द्वारा निर्मित वस्तु का कोई निश्चित मूल्य नहीं था, वरन् नई फ़सल कट कर आने पर, त्योहारों पर और बड़े आदमियों के घरों में होने वाले विवाहों, जन्मोत्सवों आदि पर उन्हें कुछ धन-धान्य बख़्शीश के रूप में दे दिया जाता था। इसके अतिरिक्त जब इन लोगों के अपने बच्चों के विवाह, गौना आदि होते थे तो उन्हें कोई सूखा पेड़ काट कर लकड़ी का उपयोग करने, ज़मीन पर बिछाने हेतु पुआल उठा ले जाने और ‘अछूतों’ को छोड़ अन्यों को उसके ऊपर बिछाने को दरी-जाजिम आदि दे दिया जाता था। चिरौरी-बिनती करने पर छत्तीस प्रतिशत के चक्रवृद्धि ब्याज की दर से ऋण भी मिल जाता था, परंतु उसके हेतु सादे प्रोनोट पर अंगूठा लगाना होता था, जिससे अदायगी न होने की दशा में उसमें मनमानी रकम भरकर मुकदमा ठोंका जा सके। गाँव के सभी अछूत जातियों के लोग एवं बहुत से बीच की जातियों के लोग आजीवन ज़मींदारों के ऋणी रहते थे और मरते समय अपनी संतानों पर अदायगी का उत्तरदायित्व छोड़ जाते थे। जातियों के क्रम में जो जिससे ऊँचा था, वह अपने से निम्न जाति वालों को हेय दृष्टि से देखता था और ज़मींदार को सभी की जान, माल और इज्ज़त के शोषण का अधिकार था। यद्यपि ग्राम की निम्न जातियाँ ग़रीबी, बीमारी, अशिक्षा, अज्ञान और सर्वत्र शोषण की शिकार थीं, तथापि अंग्रेज़ी शासन सुचारुरूप से चल रहा था और न्यायाप्रियता की ख्याति भी अर्जित किये हुए था।
मानिकपुर के सभी ब्राह्मण भी एक स्तर के नहीं थे और उनके ब्राह्मणत्व के स्तर के अनुसार ही गाँव वाले उन्हें सम्मान देते थे। रामप्रसाद तिवारी के अपढ़ व गरीब होने के कारण उनका विवाह नहीं हुआ था और उन्होंने एक नाई की लड़की को भगाकर घर में रख लिया था। इसलिये उनका ब्राह्मणत्व समाप्तप्राय हो गया था। भागीरथ पाठक की पत्नी गाँव के आकर्षक व्यक्तित्व के काछी जाति के युवक के साथ भाग गईं थीं और दोनों के वापस आने पर गाँव के ब्राह्मणों ने काछी युवक को तो जूतों से मार-मार कर भगा दिया था, परंतु भागीरथ ने अपनी पत्नी को फिर घर पर रख लिया था। इससे उनका ब्राह्मणत्व भी हेय हो गया था। अन्य ब्राह्मणों ने इनके साथ बैठकर अथवा इनके हाथ का बना भोजन खाना बंद कर दिया था। ये दोनों परिवार अपने को ब्राह्मण स्वीकार किये जाने को लालायित रहते थे। इसी पर उनके बच्चों का विवाह होना निर्भर था, अन्यथा उनसे न तो ब्राह्मण विवाह कर सकते थे और न नाई, काछी। किसी गाँव वाले के यहाँ जब भी कथा, हवन, मुंडन, विवाह आदि का सम्मिलित भोज आयोजित होता था तब ये दोनों ब्राह्मण परिवार अन्य ब्राह्मणों से उन्हें भोजन बनाने की अनुमति देने और अपने साथ में बिठाकर खिलाने हेतु चिरौरी करते थे। इस पर ब्राह्मणों में लम्बी चर्चायें होतीं थीं जिनके अंत में इन परिवारों को शुद्धीकरण हेतु स्वयं एक ब्राह्मण-भोज आयोजित करने को कहा जाता था। परंतु बार-बार ब्राह्मण भोज जीमने के पश्चात फिर सम्मिलित भोज का अवसर आने पर कोई न कोई ब्राह्मण तुनक जाता था और हर नये अवसर पर उन परिवारों के ब्राह्मणीकरण की बहस फिर प्रारम्भ कर दी जाती थी- इस प्रकार इन गिरे हुए ब्राह्मणों की शुद्धीकरण प्रक्रिया बार-बार सम्पादित होती रहती थी। इन परिवारों से अन्य ब्राह्मणों ने अनेक ब्रह्मभोज जीमे, परंतु उन्हें कभी बराबरी का दर्जा नहीं दिया गया। इन परिवारों का ब्राह्मणीकरण अन्य ब्राह्मणों के लिये मनोरंजक बहस करने एवं बारम्बार पूड़ी-कचौड़ी उड़ाने का साधन बन गया था।

पं. सुकुवासीलाल के दो पुत्र थे मथुराप्रसाद और मुसद्दीलाल। मथुराप्रसाद के दो पुत्र हुए- लालताप्रसाद और बाबूराम। मुसद्दीलाल के एक बिगड़ैल पुत्र हुए कमलप्रसाद, जो अपने स्वभाव के कारण बचपन से ही हल्ला के नाम से कुख्यात हो गये थे। इन्हीं दिनों घर में बंटवारा हो गया था। सुकुवासीलाल द्वारा बनवाई हवेली लालताप्रसाद को मिली और बाबूराम तथा कमल प्रसाद ने हवेली के पास ही अलग घर बना लिये। लालता प्रसाद के पुत्र हुए लालजी और शिवदयाल और बाबूराम के पुत्र हुए अशर्फीलाल और बर्फीलाल। हल्ला का एक सौतेला भाई कलू भी था जो उनके पिता की बेड़िया जाति की रखैल की संतान था। बेड़िया से सम्बंध रखने पर मुसद्दीलाल अथवा उनके पुत्र हल्ला के ब्राह्मणत्व पर कभी किसी ने प्रश्न नहीं उठाया, परंतु बेड़िया माँ के गर्भ से जन्मे कलू को मुसद्दीलाल और हल्ला के जीवन काल में एक ‘अछूत’ की तरह घर के बाहर सहन में ही रहने की अनुमति दी गई थी। जब इन दोनों की मृत्यु हो गई, तब घर में एकमात्र पुरुष होने के कारण कलू सर्वेसर्वा हो गये और अपने को कलू के बजाय कल्यान प्रसाद शर्मा कहलाने लगे। यद्यपि लालता प्रसाद औार बाबूराम के खानदान ने कलू को कभी बराबरी का दर्जा नहीं दिया और प्रायः उनसे मुकदमेबाज़ी और लड़ाई झगड़े करते रहे, परंतु सुकुवासीलाल की आधी ज़मींदारी के मालिक होने के कारण, अपने को दूसरों से ऊपर साबित करने की ललक होने और अपने तिकड़मी एवं चालबाज़ी स्वभाव के कारण कलू सदैव गाँव के आधे से अधिक निवासियों को अपने चंगुल में रखे रहे। कलू इन लोगों को ऋण देकर सादे प्रोनोट पर अंगूठा लगवा लेते थे और फिर ऋण का ब्याज भरते-भरते ही वह व्यक्ति इनकी दया पर अपना जीवन बिताने को मजबूर हो जाता था। गाँव में लगभग सभी लोग काला अक्षर भैंस बराबर थे- केवल लालजी हिंदी-उर्दू मिडिल पास थे और शिवदयाल सनातन धर्म इंटर कालेज से हाई स्कूल पास थे। एक दो अन्य ब्राह्मण हरूफ़ मिला-मिला कर रामायण बाँच लेते थे या चिट्ठी पढ़ लेते थे।

भादों की द्वितीया को घनघोर रात्रि में हवेली में जनमा नवजात शिशु पंडित सुकुवासीलाल की पाँचवी पीढ़ी की संतान था। उसकी छठी के दिन टुड़ई ने आँगन लीप पोतकर खूब चमकाया था और उस पर दरियाँ बिछा दी थीं। फिर गाँव की तमाम महिलायें हवेली में जमा हुईं थीं। राजाराम लुहार की दुलहन ने खूब थाप दे-देकर ढोलक बजाई थी और भग्गी काछी की दुलहन लंहगे का फेरा ले-लेकर नाची थी। फिर अंजुरी भर-भर कर सबको बताशा बाँटे गये थे। बालक की माँ ढोलक की हर थाप पर बालक का सुंदर सा चेहरा देखकर मगन हो उठती थी परंतु ढोलक की वह ढम-ढम शिशु को उसी तरह घबरा देती थी जैसे उसके जन्म के समय बादल की गरज ने उसके सम्पूर्ण अस्तित्व को कम्पायमान कर दिया था। ढोलक की एक थाप पर वह जब तक माँ के वक्ष में छिपने का प्रयास करता, तब तक और जो़र से थापें पड़ने लगतीं और उसका कोमल दिल-दिमाग दहल जाता था। शिशु को गम्भीर असुरक्षा एवं अपनी अवशता का बोध होता और वह उतना ही माँ का आश्रय खोजता था।

सायंकाल छठी का उत्सव समाप्त होते होते उस बालक को दस्त होने लगे और रात्रि में तेज़ ज्वर हो गया था। प्रत्येक दस्त के साथ बालक का चेहरा भयाकुल हो जाता था। इससे माता समेत सभी घरवालों को गहरी चिंता हो गई थी- कोई कहता कि धर्माई नाई की पत्नी बच्चे को घूर-घूर कर देख रही थी, उसी की नज़र लगी है; तो कोई कहता कि स्यामा लुहार की बहू की नज़र लगी है- ‘खुद कें लड़का है नाईं तौ दुसरे को कैसें बरदास्त होय?’/ अपना लड़का है नहीं तो दूसरे का कैसे बर्दाश्त हो?/। फिर अम्मा /शिशु की दादी/ बोलीं,

"जाव थोरी सी मिच्च और लोढ़ा लै आउ। /जाओ, थोड़ी सी मिर्च और सिलबट्टा ले आओ।/"

बूढ़ी अम्मा के निर्देश के अनुसार कमरे में आग जलाकर मिर्च उसमें छोड़ी गई और लोढ़ा /सिलबट्टा/ को सात बार बालक के ऊपर घुमाया गया। बालक ठीक तो न हुआ, धुँए से शिथिल अवश्य हो गया। बच्चे को लगातार सात दिन तक दस्त व ज्वर रहा। आठवें दिन बालक का ज्वर तो उतर गया, परंतु वह रह-रहकर चौंकने लगा। कभी-कभी जागते हुए भी वह भयभीत हो जाता और माता से चिपट जाता। भय का यह भाव उसके मस्तिष्क में कुछ इस तरह स्थायी हो गया कि कई माह तक उसे सोते जागते स्वप्न आते रहे कि वह मीलों गहरे अग्निकुंड में गिर रहा है और उसे कोई बचा नहीं पा रहा है। वह अपने को बचाने को चिल्लाना चाहता है परंतु उसके मुख से ध्वनि ही नहीं निकल रही है। धीरे-धीरे इस अवशता की भावना ने उसके मन में एक ऐसी स्थायी हीनभावना का रूप ले लिया कि बड़े होने पर साहस के साथ अपने को अभिव्यक्त करने के किसी अवसर पर उसका गला सूखने लगता और उसके हृदय का कम्पन अनियंत्रित हो जाता रहा।

फिर एक शुभ दिवस पर पुरोहित पं. गोरेलाल आये और उन्होंने बालक के जन्म की गृहदशा देखकर कुंडली बनाई। कुण्डली में बालक की राशि सिंह बताई गई थी और उ अथवा म अक्षर से प्रारम्भ होने वाला नाम रखने का सुझाव दिया गया था तथा बालक के भविष्य के विषय में अन्य बातों के अतिरिक्त यह भी लिखा था कि बालक यद्यपि बुद्धिमान और भाग्यशाली होगा तथापि स्वाभाव में व्यवहारकुशलता की कमी के कारण अपनी योग्यता के अनुसार प्रगति का योग नहीं है।

पंडित जी द्वारा सुझाये गये नामों में से बालक का नाम मोहित रख दिया गया था।


अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें