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ISSN 2292-9754

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06.13.2016


भीगे पंख
मोहित /एक/

"हट ससुर! जू का कर दओ?" कहकर दादी ने पिच्च से कुल्ला किया था और मोहित को अपने पेट से उतारकर अपना मुँह धोने आँगन के परनाले की ओर दौड़ी थीं। मोहित उनकी प्रतिक्रिया देखकर खिलखिलाकर हँस पड़ा था। मोहित अपनी दादी का बड़ा लाडला था। उस दिन जब दादी मोहित को अपने घुटनों पर लिटाकर मालिश कर रहीं थीं तो मोहित ने इतने जोश से अपनी लघुशंका का निवारण किया था कि दादी का मुँह आधा भर गया था। कालांतर में दादी उस घटना को ऐसी मिठास के साथ सुनातीं थी जैसे मोहित ने उन्हें साक्षात अमृतपान कराया हो।

मोहित चन्नी दाई का भी प्रिय था क्योंकि पूरे गाँव में वह पहला बच्चा था जो उल्टा पैदा हुआ था और जिसको पेट से निकालने में दाई के हाथ-पैर फूल गये थे; उसके बाद जच्चा-बच्चा के काम में चन्नी दाई की ख्याति बहुत बढ़ गई थी और ज़मींदार साहब के यहाँ से उसे एक गाय बख़्शीश में मिली थी। चन्नी बड़े चाव से मोहित की मालिश करती थी और उसके जन्म की प्रक्रिया का वर्णन घर-घर सुनाया करती थी।

यद्यपि मोहित अपने मन में प्रश्रय पाने वाली हीनग्रंथि के कारण कभी-कभी समुचित कारण न होने पर भी किसी-किसी बात का बुरा मान जाता था और ज़िद्द पकड़ बैठता था, तथापि दूसरों के सामने अपने को अच्छा साबित करने की अवचेतन मन में बसी आकांक्षा के कारण वह सही बताये जाने वाले मार्ग पर ही चलने का प्रयत्न करता था, अतः उसे बड़ों का प्यार प्राप्त था। उसकी माँ को उससे विशेष प्यार था क्योंकि उससे पहले का एक पुत्र जन्म लेने के चौबीस घंटे के अंदर चल बसा था। आयु में मोहित से बहुत बड़ी जिज्जी /मोहित के ताऊ की बेटी/ के लिये वह प्यारा सा खिलौना था। उनके विवाह के समय वह एक वर्ष का था और उसने उनके दहेज में दी जाने वाली परात में बैठकर अपने को अच्छी तरह निवृत्त कर दिया था, जिस बात को याद कर जिज्जी उस परात में बनी या रखी हुई कोई वस्तु कभी नहीं खातीं थीं। हाँ, अपनी ससुराल वालों को उस परात में रखी वस्तुएँ खाते देखकर मन ही मन मुस्करा लेतीं थीं और मोहित को याद करने लगतीं थीं।

मोहित जब बड़ा होने लगा और उसे प्राथमिक विद्यालय में भर्ती कराया गया तो अल्प अवधि में उसके द्वारा अक्षर ज्ञान प्राप्त कर लेने और गिनती पहाड़े़ याद कर लेने से उसके अध्यापक उससे बड़े प्रभावित थे। मोहित की बुद्धि अति तीव्र थी और वह यह बात समझने भी लगा था। जब कक्षा एक में दख़िले के समय उसके अध्यापक ने उसके पिता के सामने उससे उन्नीस पंजे का जवाब पूछा था तो तत्क्षण उसने पंचानबे बता दिया था और अध्यापक अनायास बोल पड़े थे, "लड़का तो बड़ा ज़हीन लगता है।" यद्यपि उस समय वह ज़हीन शब्द का अर्थ नहीं जानता था, तथापि वह समझ गया था कि अध्यापक ने उसकी बुद्धि की प्रशंसा की है। अध्यापकों के समक्ष वह अपने को ऐसा दिखाने के प्रयत्न में लगा रहता था जिससे उनका अनुमोदन एवं प्रशंसा प्राप्त कर सके। इस प्रयास के कारण वह पढ़ने-लिखने में मन लगाता था और परीक्षा में प्रथम आता था। गाँव के ज़मींदार का पुत्र होने, अपनी कुशाग्रबुद्धि, अपने आदरपूर्ण स्वभाव, तथा अपने मोहक स्वरूप के कारण मोहित घर और बाहर सब जगह प्रिय था।

सतिया को मोहित तब से प्यारा था जब वह छोटी सी थी और फुदक-फुदक कर चलती थी क्योंकि हर बार जब वह उसकी निकटता का बालसुलभ प्रयत्न करती थी, उसको यह अहसास करा दिया जाता था कि मोहित उसके लिये अलभ्य है- और अलभ्य को अपना बनाना सतिया का स्वभाववत गुण था। सतिया जब बच्ची थी और अपनी माँ के साथ मोहित के बाहरी घेर में आकर बैठ जाती थी, तब मोहित उसे देखने को ऊपर बने मड़हे के द्वार पर आकर खड़ा हो जाता था। सतिया का अपनी बड़ी-बड़ी आँखों से उसे घूरना मोहित को अच्छा लगता था और मोहित उसे देखकर मुस्कुरा देता था। फिर बाल स्वभानुसार सतिया कभी किलकारी मारती हुई खड़े होकर मोहित की ओर आने का प्रयत्न करते हुए लुढ़क कर गिर पड़ती, तो मोहित खिलखिलाकर हँस पड़ता था। उसे देखकर सतिया भी हँस पड़ती थी। मोहित की माँ ने उससे कह रखा था कि सतिया अछूत है और उसे छूना नहीं है। मोहित ने आज्ञाकारी बालक की भाँति माँ की बात को मान लिया था। परंतु मोहित जब स्कूल जाने लगा, जहाँ अन्य जातियों के बच्चे भी पढ़ते थे और उसके मित्र भी बन गये थे और उसने पुस्तकों में पढ़ा कि अस्पृश्यता पाप है, तब वह समझने लगा था कि सतिया अथवा अन्य कोई भी व्यक्ति अछूत नहीं है एवं उनके साथ अस्पृश्यता का व्यवहार अनुचित है; परंतु फिर भी वह अपने माता-पिता अथवा अन्य व्यक्तियों के समक्ष अस्पृश्यता का खुला विरोध नहीं कर पाता था। उसे एकांत में सतिया का स्पर्श करने में कोई बुराई नहीं लगती थी, परंतु अन्य किसी के समक्ष ऐसा करना वह बड़ों की अवज्ञा मानता था। आयु बढ़ने के साथ सतिया के अपने प्रति आकर्षण की अनुभूति भी मोहित करने लगा था, परंतु चाह होते हुए भी वह उसका प्रतिदान करने में अपने को असमर्थ पाता था।

मोहित जब प्रथम बार अपनी मौसी के यहाँ रज़िया से मिला था तब से रज़िया भी उसके सामीप्य की दीवानी रहने लगी थी क्योंकि वह उसका एकमात्र सखा था। मोहित रज़िया के लिये ठीक उसी प्रकार था जैसे राधा के लिये कृष्ण। कृष्ण जब वृंदावनवासी थे, तब राधा कृष्ण को अति प्रिय थीं और वृंदावन में वह राधा को बंसरी बजाकर मुग्ध करते रहे थे परंतु द्वारिका पहुँचने पर कृष्ण वहीं के होकर रह गये थे; परंतु राधा जीवनपर्यंत कृष्ण की दीवानी बनी रही थीं।

सर्वत्र प्राप्त होने वाला यह लाड़-प्यार मोहित के मन को प्रतिकूलता से निबटने के लिये अक्षम बना रहा थाः यदि उसके जन्म के समय की परिस्थितियों ने उसमें ऐसे गुण पैदा किये होते अथवा वे उसके जीन्स में रहे होते जो उसके मानस को "आई ऐम ओ.के." की स्थिति में रखते, तो सम्भवतः यह लाड़-प्यार उसे प्रतिकूल परिस्थितियों से निबटने में दृढ़ता प्रदान करता, परंतु उसकी "आई एम. नॉट ओ.के., यू आर. ओ.के." की मनःस्थिति में यह उसके मन को छुई-मुई की भाँति बना रहा था- छुई-मुई जो तब तक प्रफुल्ल रहती है जब तक उसकी ओर कोई उँगली न उठाये और उँगली देखते ही मुर्झाने लगती है।

मोहित आठवीं कक्षा की परीक्षा में जनपद में प्रथम आया था। इस छोटे से गाँव के मिडिल स्कूल के इतिहास में यह पहला अवसर था जब वहाँ का कोई छात्र जनपद में प्रथम आया हो। इससे मोहित के गाँव और स्कूल दोनों में उसकी भूरि-भूरि प्रशंसा हुई थी। मोहित इस प्रशंसा से लम्बी अवधि तक स्वमग्न रहा था। इस प्रशंसा ने भी उसके मन में यह भावना दृढ़ कर दी थी कि वह मात्र प्रशंसा का पात्र हैः आलोचना सुनने और उस पर बिना अनावश्यक उद्वेलित हुए समुचित प्रतिक्रिया करने का अभ्यास उसे प्राप्त नहीं हो पा रहा था। इस प्रकार उसका मन ऐडल्ट व्यवहार /पेरेंट, ऐडल्ट ऐंड चाइल्ड की मनःस्थिति के वर्गीकरण में/ के प्रशिक्षण से वंचित रह रहा था। भविष्य के जीवन में यह उसकी प्रगति में कितना बाधक एवं मानसिक क्लेश का कारण बनेगा, इसका भान मोहित को नहीं था।

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आठवीं कक्षा उत्तीर्ण करने के पश्चात मोहित को आगे पढ़ने के लिये किसी उच्चतर माध्यमिक विद्यालय में प्रवेश लेना था और उसके ग्राम से सबसे निकट का भरतपुर इंटर कालेज लगभग 20 मील दूरी पर था। गाँव से भरतपुर तक कोई सड़क नहीं थी, और वहाँ जाने के लिये 8 मील पैदल या सायकिल पर चलना पड़ता था और फिर ट्रेन पकडकर 12 मील जाना पड़ता था। प्रथम बार भरतपुर को जाते समय मोहित की माँ ने उसे सिसकियाँ लेते हुये विदा किया था। मोहित भी लुकछिपकर रोया था- कुछ तो माँ-बाप व घरवालों की प्यार भरी सुरक्षा के खोने के दुख से परंतु उससे कहीं अधिक सतिया एवं रज़िया के साहचर्य के खोने के दुख से। ग्राम छोड़ने के कई दिन पूर्व से प्रयत्न करते रहने पर भी वह सतिया से न मिल सका था- किशोरावस्था के आगमन के पश्चात अब वह अकारण उसके घर जाकर उसे पुकारने का साहस नहीं कर पाता था एवं सतिया भी खुलेआम उसके समीप आने में लज्जा का अनुभव करने लगी थी। कई वर्ष पश्चात यह पहली गर्मी की छुट्टियाँ थीं, जब मोहित मौसी के पास जाने एवं गर्मियों की छुट्टियों में रज़िया का साहचर्यसुख प्राप्त करने से भी वंचित रहा था। मोहित को यह भी आभास हो रहा था कि सम्भवतः अब किसी भी वर्ष गर्मियों की छुट्टी में वह मौसी के यहाँ नहीं जा पायेगा, और पता नहीं रज़िया से कभी मिलना हो भी या नहीं।

बीसवीं शताब्दी के छठवें दशक में भरतपुर लगभग दस हज़ार जनसंख्या का एक छोटा सा और सोता सा क़स्बा था- कच्चे पक्के बेतरतीब मकान बने थे एवं कच्ची सड़कें थीं जिन पर या तो कीचड़ बहता रहता था या बालू उड़ती रहती थी; एक मुहल्ले में तो इतनी बालू रहती थी कि उसका नाम ही बालूगंज पड़ गया था। क़स्बे की मुख्य सड़क भी टूटे खरंजे की थी और केवल दस बारह फुट चौड़ी थी, और उस पर दिन भर क़स्बे की अनेक धान मिलों की ओर आते-जाते भैंसा-ठेले चलते रहते थे। इन ठेलों में लकड़ी के पहिये लगे रहते थे और ठेले इतने अधिक भरे रहते थे कि जवान से जवान भैंसा बड़ी निरीहता से जीभ निकालकर हाँफ़ता हुआ ठेले को खींच पाता था। इतने अधिक बोझ से सड़क भी भैंसे की भाँति जीभ निकाल देती थी और उसमें जगह-जगह गड्ढे बन जाते थे, जिससे सड़क साल भर ऊबड़खाबड़ ही रहती थी। क़स्बे के मुख्य चौराहे पर एक यादव जी की दूध की, एक हलवाई की मिठाई़ की, एक पंडित जी की किताबों की, एक पंजाबी की पत्थर-चूने की और एक वैश्य की कपद्ओं की दूकान थी। इसके अतिरिक्त छिटपुट दूकाने अन्यत्र थीं जो क़स्बे के लोगों र्की छिटपुट आवश्यकताओं की पूर्ति करती रहतीं थीं। दूध की दूकान का स्वामी सायंकाल को ढिबरी के धुँआते प्रकाश में ग्राहकों को दूध बेचता था जिसकी मलाई तो वह पहले ही निकाल चुका होता था और उस कमी को छिपाने हेतु उसमें खूब फेना उठाता था। इसके लिये वह दूध को पीतल के एक लोटे में भरकर गज-गज भर तक हाथ उठाकर दूसरे लोटे में गिराता था। फिर गिलास में नीचे दूध और ऊपर फेना भरकर ग्राहकों को देता था। पुस्तकों की दूकान पर कक्षा एक से बारह तक की पाठ्यपुस्तकों के अतिरिक्त सारंगा-सदावृक्ष, लैला-मजनूं आदि के प्रचलित क़िस्सों की किताबें, मद्भागवतगीता, हनुमानचालीसा, रामचरितमानस जैसी धार्मिक पुस्तकें, तथा काग़ज़, क़लम, स्लेट, जी-निब, कैमिल इंक आदि भी उपलब्ध रहते थे। हलवाई की दूकान में सादा पेड़ा के अतिरिक्त केसर का पेड़ा, कलाकंद /लौकी के शकर में पगे लच्छे/, बालूशाही और गुलाबजामुन प्रमुखतः उपलब्ध रहते थे, परंतु बिक्री सबसे अधिक सबेरे-सबेरे मिलने वाली गरमागरम जलेबी की होती थी। जलेबी को इस दूकान के अतिरिक्त तमाम अन्य ठेले वाले भी ठेले पर ही बनाकर बेचा करते थे। कभी-कभी दो ठेलों के निकट खड़े हो जाने पर प्राइस-वार /अवमूल्यन स्पर्धा/ प्रारम्भ हो जाती थी और जलेबी एक रुपये सेर के भाव से गिरकर दस आने सेर भी बिक जाती थी। कपड़े की दूकान पर गर्मियों में कमीज़ और पाजामें का कपड़ा, ज़नाना और मर्दाना धोतियाँ और बनियाइन और अंडरवियर के लिये चारखाना कपड़ा, आदि उपलब्ध रहता था और जाड़े की ऋतु में लाल इमली और धारीवाल की सूटिंग के कपड़े, फ़लालैन, कम्बल आदि उपलब्ध हो जाते थे। अधिकतर छात्र पाजामा कमीज़ पहनते थे और क़स्बे के अधिकतर प्रौढ़ धोती-फतुई या धोती-कुर्ता पहिनते थे। बच्चे प्रायः चारखाने का घुटन्ना पहने दिखाई देते थे- बस जाड़े की ऋतु में कमीज़ या स्वेटर भी पहन लेते थे। स्त्रियाँ प्रायः पुरानी मैली धोतियों में दिखाई देतीं थीं।

इंटर कालेज को कृपा नारायण पाठक नामक एक कर्मठ स्वतंत्रता-संग्राम सेनानी ने घर-घर जाकर और एक-एक, दो-दो रुपये का चंदा लेकर स्थापित किया था और वही इसके प्रधानाचार्य थे। स्वतंत्रता के उपरांत देश में शिक्षा-प्रसार अभियान चलने पर यह कालेज अच्छा चल निकला था और इस कालेज से निकला एक मेधावी छात्र पी.सी.एस. में भी चयनित हो चुका था। इस क़स्बे में बीसवीं सदी के छठे दशक में बिजली नहीं आई थी और कोई सिनेमा हाल भी नहीं था। सम्पूर्ण जनपद में एकमात्र सिनेमाघर यहाँ से बारह मील दूर स्थित जनपदीय मुख्यालय में था। इसलिये देवदास, सी.आई.डी., नागिन जैसी प्रसिद्ध फ़िल्मों के वहाँ के सिनेमाघर में लगने पर इस क़स्बे के इंटर कालेज के मनचले एवं समृद्ध छात्र वहाँ ट्रेन से जाते थे। भरतपुर रेलवे स्टेशन पर केवल पैसेंजर और पार्सल गाड़ियाँ रुकतीं थीं- पैसेंजर जो हर छोटे से छोटे स्टेशन पर रुकती हुई चलती थी और मालगाड़ी तक को पास देती थी और पार्सल जो आधी माल ढोने वाली गाड़ी थी और आधी सवारी गाड़ी। पार्सल ट्रेन प्रायः घंटों लेट चलती थी और कभी-कभी 24 घंटे तक लेट हो जाती थी। रेलवे लाइन के किनारे बसे दस पाँच मील दूर तक के गाँवों के छात्र इनसे प्रतिदिन कालेज आते-जाते थे। रेल यात्रा करने पर अधिकतर छात्रगण टिकट नहीं लेते थे वरन् टी.टी. को टिकट की जगह अपना आइडेंटिटी कार्ड दिखा देते थे, क्योंकि छात्र नेताओं का कहना था कि बिना टिकट यात्रा करना छात्रों का जन्मसिद्ध अधिकार है। उनका यह भी दावा था कि रेलवे अधिकारियों को छात्रों से टिकट नहीं माँगना चाहिये और अपनी बात की गम्भीरता का रेलवे प्रशासन को विश्वास दिलाने हेतु यह नेतागण टिकट माँगने पर कभी-कभी रेलवे कर्मचारियों की पिटाई कर देते थे अथवा रेलगाड़ियों पर पथराव करा देते थे। अतः प्रायः टी.टी.ई. छात्र जैसे दिखने वाले किसी भी व्यक्ति से टिकट के लिये पूछने का दुस्साहस ही नहीं करते थे अथवा पूछने पर उसके द्वारा स्टूडेंट कह देना या अधिक से अधिक कालेज का आइडेंटिटी कार्ड दिखा देना ही उसका टिकट मान लेते थे।

इस कालेज में मोहित के गाँव का एक लड़का पहले से ही पढ़ता था और बालूगंज मुहल्ले में एक कमरा किराये पर लेकर रहता था। यह लड़का मोहित से बड़ा था और बचपन से मोहित के साथ छोटे भाई की भाँति व्यवहार करता रहा था। बड़े भाई का अधिकार होता है छोटे से सम्मान की अपेक्षा करना एवं कर्तव्य होता है छोटे को सुरक्षा प्रदान करना; परंतु छोटे एवं बड़े भाई के बीच मर्यादा के अनेक ऐसे प्रतिबंध खड़े हो जाते हैं जो उन्हें खुलकर अपनी अभिलाषाओं एवं समस्याओं को परस्पर प्रकट नहीं करने देते हैं। मोहित ऐसे ही बड़े भाई के साथ इस अनजाने एवं अनोखे से स्थान पर रहने आया था। वह मुहल्ला यथा नाम तथा गुण था- पूरी सड़क पर बालू और यत्र-तत्र बने मकानों के चारों ओर भी बालू ही बालू। एक सम्पन्न यादव जी ने भविष्य की सोचकर बलुही सड़क के किनारे दूकानों के लिये कुछ कमरे बनवा दिये थे, जिनमें अभी तक कोई दूकान नहीं लग पाई थी और उनमें से ही एक कमरा मोहित के साथी ने आठ रुपये महीने पर किराये पर ले रखा था। यह एक नया बसने वाला मुहल्ला था और मोहित को यहाँ आकर पूर्णतः अजनबीपन का आभास हुआ था। उसके गाँव के किनारे स्थित बम्बा /छोटी नहर/ के स्थान पर यहाँ उसके कमरे के पीछे एक गंदला सा पानी का गड्ढा था जिसमे गंदले से सुअर लोट लगाया करते थे, यहाँ उसके कमरे की छत पर उसके गाँव के घर की छत की तरह सुंदर से मोर नाचने नहीं आते थे वरन् धान मिल की राख जमा होती रहती थी, यहाँ दरवाज़े पर नीम के वृक्ष के बजाय रेतीली सड़क थी, और यहाँ माँ के ममतामय सान्निध्य के बजाय एक ऐसे साथी का साथ था जो उन्हीं अभावों से ग्रस्त था जो मोहित के मन को सालते थे। मोहित के पिता जब उसको इंटर कालेज में प्रवेश दिलाकर और शुक्ला भोजनालय में उसके खाने का प्रबंध कराकर जाने लगे थे तो उन्होंने मोहित को समझाते हुए कहा था,

"मोहित, अब तुम्हें अपने ऊपर ही रहना है और अपनी ज़िम्मेदारी ख़ुद समझनी है। अपनी पढ़ाई का भी ख़ुद ही ध्यान रखना है।"

मोहित के पिता जितनी गम्भीरता से ये शब्द बोल रहे थे उतनी ही तीव्रता से मोहित के आँसू निकलने को आतुर हो रहे थे। उसे लग रहा था कि उसे वटवृक्ष की छाया से वंचित कर चिलचिलाती धूप में फेंका जा रहा है। पिता के चले जाने के पश्चात बीतते समय के साथ-साथ उसकी यह अनुभूति भी तीव्रतर होती गयी थी और कई अवसरों पर उसने लुकछिपकर आँसू भी बहाये थे। प्रेम एवं संरक्षण की शीतलता के अभाव के अतिरिक्त मोहित द्वारा यदा-कदा चुपचाप आँसू बहाने के अन्य कारण भी थे। मोहित इस विद्यालय में बाहर से आया था जब कि अधिकांश अन्य छात्र इसी कालिज की अथवा इसी क़स्बे के स्कूलों की कक्षा आठ से प्रोन्नत होकर आये थे। मोहित ने प्रारंभ से ही उन छात्रों को परीक्षाओं में पिछाड़ना प्रारंभ कर दिया था, जिससे वह उनके द्वेष का पात्र बन गया था। अल्पायु में स्पर्धा की भावना की अपेक्षा ईर्ष्या का प्रादुर्भाव पहले होता है क्योंकि ईर्ष्या प्रकृति प्रदत्त है जबकि स्पर्धा संस्कारगत। अतः अन्य छात्र मोहित को चिढ़ाकर एवं मानसिक क्लेश पहुँचाकर अपने हृदय की जलन को शांत करने का प्रयास करते थे। इसके अतिरिक्त मोहित की आकर्षक देहयष्टि कक्षा के अधिक आयु के सहपाठियों में उसके प्रति शारीरिक आकर्षण का भी प्रादुर्भाव करती थी, जिसे कतिपय अभद्र प्रकृति के छात्र अध्यापक की अनुपस्थिति में अपने हाव-भाव अथवा अश्लील वचनों के माध्यम से प्रकट कर खिलखिलाकर हँसते थे। मोहित को उनका यह विद्रूप हास्य ऐसा लगता था जैसे कोई बलपूर्वक उसे अप्राकृतिक मैथुन का निष्क्रिय पात्र बनाकर अट्टहास कर रहा हो।

मोहित इन सहपाठियों की इस वितृष्णा के मकड़जाल में फँसे होने और अपने को उसमें से निकाल पाने की असमर्थता की निरीहता से ग्लानिग्रस्त रहता था। आज भी अंतिम पीरियड समाप्त होने पर जैसे ही अध्यापक कक्षा से बाहर निकले थे, उसके पीछे बैठा हुआ एक छात्र जो कई वर्षों से फेल हो रहा था, उच्चस्वर में गाने लगा था, "आगे बैठी बुलबुल, पीछे बैठा बुलबुला"। यह सुनकर कई छात्र हँस पड़े थे। इसका प्रतिकार करने हेतु मोहित की जिह्वा पर न तो शब्द थे, न मन में साहस था और न भुजाओं में सामर्थ्य। उसके मन में बस नपुंसक क्रोध उफ़नने लगा था। उसकी इस प्रतिक्रिया को भाँपकर अन्य शैतान छात्रों का साहस और बढ़ गया था और छुट्टी होने पर मोहित जब कालेज गेट से निकलकर अपनी ग्लानि को छिपाने का प्रयत्न करते हुए बलुही सड़क पर चुपचाप चला जा रहा था, तब पीछे से सायकिल पर आते एक छात्र ने फ़िकरा कसा था, "ओउम् बम शंकर, लड़की को तंग कर"। अपने क्रोध को नियंत्रित कर पाने में असमर्थ होकर मोहित उस पर झपटा था, परंतु तब तक वह लड़का सायकिल तेज़ी से बढ़ाकर सीटी बजाता हुआ आगे बढ़ गया था। चूँकि मोहित का क्षोभ असहनीय हो गया था अतः पहले तो उसकी आँखों से अश्रु ढुलकने लगे थे परंतु कुछ देर के उपरांत उसके अवचेतन मन के रक्षातंत्र ने शनैः शनैः उसे सुखद अतीत के कल्पनालोक में ढकेल दिया था। वह अपने बचपन के निरापद भूतकाल में व्याकुलता से खोने लगा था। दिन प्रतिदिन के ऐसे कटु अनुभवों के फलस्वरूप वह एक प्रकार की ऐसी मोहावस्था में डूबा रहने लगा था जो उसे जीवन के यथार्थ का सामना करने में अधिक से अधिक अशक्त बना रही थी।

इन दिनों मोहित एक नवीन प्रकार की मोहावस्था से भी ग्रसित हो रहा था। इसका कारण था नवजाग्रत तीक्ष्ण कामोद्दीपन, जो उसके शरीर के अन्दर की प्राकृतिक जैविक प्रक्रियाओं का परिणाम था, परंतु जिसके अनायास उद्भूत होने और उसके मन एवं शरीर दोनों को मोहग्रस्त कर देने की स्वाभाविकता के विषय में उसे कोई ज्ञान नहीं था। उसने तो धर्मग्रंथों को पढ़कर एवं लुकछिपकर सुनी हुई बातों से बस इतना जाना था कि ब्रह्मचर्य का पालन ही जीवन है और वीर्यस्खलन शरीर के लिये मृत्यु के समान है एवं महापाप भी है। इस कारण अब उसके शरीर की माँग और संस्कारगत विचार उसे दो बलशाली हस्तियों की भाँति विपरीत दिशाओं में खींचते रहते थे। उसकी प्यार की प्यास अब द्वैयामी हो गई थी- अब केवल माता-पिता का स्नेह और सुरक्षा ही उसके लिये पर्याप्त नहीं थे, वरन् लाख रोकने पर भी विपरीतलिंगीय साहचर्य की कामना अपनी सम्पूर्ण प्रबलता के साथ उसके मन में उठने लगी थी। उसके निद्रा-स्वप्नों एवं दिवा-स्वप्नों दोनों में लड़कियों के इंद्रधनुषी रूप आने लगे थे। अब उसका मन जब भी एकांत का आभास पाता- चाहे यह एकांत भौतिक हो अथवा मात्र मानसिक- वह ऐसे परीलोक में विचरने लगता जहाँ सुंदरियाँ ही सुंदरियाँ होतीं थीं। उसे अब बचपन में सतिया और रज़िया के साथ बिताये क्षण काममय तीक्ष्णता के साथ याद आते थे। लड़के-लड़कियों के साहचर्य के नवीन ज्ञानचक्षु खुल जाने के फलस्वरूप उसे लगता कि अब वह उनके साथ उस उन्मुक्तता से नहीं बिचर सकता है जिससे बचपन में बिचरता रहा था। उसे लगता कि अब वह किसी अनजाने शाप से ग्रस्त होकर सभी लड़कियों के लिये अस्पृश्य हो गया है और वे उसके सामने पड़ जाने पर आँखें नीची करके भाग जायेंगी। फिर उसका मन तर्क करता कि क्या सतिया, जो उसके साहचर्य हेतु व्याकुल आँखों से उसे देखा करती थी, भी ऐसा ही करेगीं? और क्या रज़िया जिसका एकमात्र सखा वह था, भी उससे दुराव रखेगी?

भूत की ऐसी ही मधुरस्मृतियों में खोया हुआ मोहित ऊबड़खाबड़ सड़क पर जा रहा था कि उसके दाहिने पैर में ज़ोर की ठोकर लगी और वह मुँह के बल गिर पड़ा। उसके घुटने में काफ़ी चोट लगी थी और वह पीड़ा से कराह उठा था। अब उसके मन की पीड़ा घनीभूत बदरी सी अश्रु बनकर बह निकली। उसने देखा कि उसे गिरा देखकर कुछ लड़के फक्क से हँस दिये थे और पूर्ववत आगे बढ़ गये थे। उसे लगा कि अब वह संवेदना और सहानुभूति से पूर्णतः वंचित रहने को अभिशप्त हो गया है। उसके मस्तिष्क में भूत की वह घटना बिजली सी कौंध गई, जब वह दौड़ते हुए आँगन के फ़र्श पर गिर गया था और "अम्मा! अम्मा...." चिल्लाने लगा था तो उसकी पीड़ा की सहभागिनी सी उसकी माँ दौड़ती आई थीं और उसे गोद में उठाकर तब तक पुचकारतीं रहीं थीं, जब तक उसकी सिसकियाँ रुक नहीं गईं थीं। उसके घुटनों से रिसता रक्त देखकर उसकी माँ की आँखें भर आयीं थीं। यह सोचकर मोहित के मुँह से एक दीर्घ निःश्वास निकल गया कि आज जब उसका मन और तन दोनों आहत हैं तब उसे पुचकारने वाला कोई नहीं हैं वरन् उस पर व्यंग्य कसने वाले अनेक हैं। वह अपने को अनाथ सा अनुभव करने लगा था।

ऐसे अवसाद की मनःस्थिति में मोहित ने अपने कमरे पर पहुँचकर ताला खोला और दरवाज़ा पूरा खुला छोड़कर बस्ता एक ओर रखकर चारपाई पर लेट गया। वह बाहर एकटक देखने लगा जैसे शून्य में कुछ पढ़ रहा हो। उसे शून्य पर ध्यान लगाये कुछ ही समय बीता था कि उसके दरवाज़े के सामने दायीं ओर लगे हैंड पम्प पर बरतन माँजने के लिये भरे पूरे बदन की चतुर्दश वर्षीया रुक्मिणी आ गई। रुक्मिणी अपने परिवार के साथ मोहित की कोठरी से दो कोठरी छोड़कर रहती थी और हैंडपम्प से पानी लेते समय अथवा अन्य किसी काम से मोहित के कमरे के सामने से निकलते हुए मोहित के कमरे की ओर चोरनिगाहों से देख लेती थी। प्रायः वहाँ दोनों लड़कों की उपस्थिति देखकर अपनी निगाह नीची कर आगे बढ़ जाती थी। आज मोहित को कमरे में अकेला लेटे हुए देखकर उसने अपने चारों ओर देखा और पूर्ण निर्जनता जानकर हैंडपम्प के नीचे बर्तन रखे और उसी की ओर मुँह करके उकड़ूँ बैठ गई। मोहित का शून्य अब शून्य नहीं था वरन् उसमें एक कामिनी आ गई थी, जो हाथ में बर्तन उठाते समय तो अपनी पलकें नीचे करती थी परंतु उसे राख से माँजते समय घूरकर मोहित को देखती रहती थी। उसने अपनी धोती को पानी से भीगने से बचने हेतु पिंडलियों पर ऊँचा उठा रखा था, जिससे उसकी किशोर टाँगें लगभग घुटनों तक खुलीं थीं। बर्तन माँजते हुए उसकी धोती का पल्ला उसके वक्षस्थल से नीचे खिसक गया था। बर्तन रगड़ते समय उसके वक्ष हिलते डुलते थे और ब्लाउज़ से बाहर निकल पड़ने को आतुर से होने लगते थे। रुक्मिणी का यह रूप देखकर मोहित के ब्रह्मचर्य-पालन के संस्कार तिरोहित हो रहे थे एवं उसे अतीव कामुक आकर्षण हो रहा था। उसकी उत्तेजना थमने को तैयार नहीं थी। मोहित को अकेले लेटे देखते हुए रुक्मिणी का चेहरा भी कामोद्दीपन से रक्तवर्ण हो रहा था। बर्तन माँजकर जब रुक्मिणी उठने लगी तो मोहित को उसकी पुष्ट जंघाओं की झलक भी मिल गई और उसी के साथ मोहित जीवन में प्रथम बार स्खलित होने लगा था। स्खलन के प्रारम्भ होते ही ब्रह्मचर्य-पालन के संस्कार पुनः मोहित पर हावी होने लगे एवं स्खलन-क्रिया के प्रत्येक कम्पन के साथ मोहित को लगा कि मोहित पाप के गर्त में गिर रहा है और अपने माता-पिता एवं बड़ों के विश्वास को तोड़ रहा है। फिर वह यह आशंकाग्रस्त भी हो गया कि यदि रुक्मिणी ने उसे स्खलित होते हुए भाँप लिया होगा, तो पता नहीं उसे कितनी हेय दृष्टि से देखने लगेगी। उसे यह भय भी लगा कि रुक्मिणी की ये क्रियायें मोहित को आकर्षित करने के उद्देश्य से प्रेरित न होकर स्वाभाविक रहीं होंगी एवं हो सकता है कि रुक्मिणी उसे अपनी ओर घूरते एवं तत्पश्चात स्खलित होते देखकर क्रोधित हो जाये एवं अपने घरवालों से उसकी शिकायत कर दे। उस रात्रि मोहित का मन आशंकाओं के सागर में डूबता उतराता रहा। परंतु भविष्य में वह न तो चोरी-छिपे रुक्मिणी को देखने से अपने को रोक पाया एवं न स्खलन से। प्रत्येक स्खलन- चाहे वह रात्रिकालीन स्वप्नदोष हो अथवा जागृत अवस्था का हस्तमैथुन- मोहित के मन में अपराध-बोध पैदा कर देता था और उसके व्यक्तित्व को और अवगुंठित कर देता था।

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"पिता जी! जा फोटू देखौ।"- मोहित छुट्टियों में घर आया था और अपने कालेज की पत्रिका में छपी अपनी फोटो को अपने पिता-माता को दिखा रहा था और वे उसे देखकर गर्व का अनुभव कर रहे थे। फोटो के नीचे लिखा था "मोहित जिसने हाई स्कूल की परीक्षा में प्रदेश में तृतीय स्थान प्राप्त कर कालेज का गौरव बढ़ाया"। यह फोटो कुछ ऐसी आयी थी कि इसमें मोहित अपनी आयु से अधिक का प्रतीत हो रहा था और उसे देखकर मोहित के पिता के पास एक धनी कन्या के पिता अपनी पुत्री के विवाह का प्रस्ताव भी ला चुके थे और अच्छा दहेज़ देने की बात कह गये थे। यद्यपि मोहित के पिता ने उन्हें यह कहकर वापस कर दिया था कि मोहित की आयु अभी विवाह लायक़ नहीं है, तथापि अपने लायक पुत्र के विवाह हेतु आये ऐसे अच्छे प्रस्ताव से वह प्रफुल्लित थे।

हाई स्कूल की परीक्षा के परिणाम में इस कालेज के कुल तीन छात्र प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण हुए थे। उन दिनों प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण होना बड़ी बात हुआ करती थी और सैकड़ों छात्रों में एक-आध ही साठ प्रतिशत अंक लाकर प्रथम श्रणी में उत्तीर्ण होते थे। मोहित न केवल समस्त कालेज में प्रथम आया था, वरन् समस्त प्रदेश में उसने तृतीय स्थान भी प्राप्त किया था। यह न केवल उसके कालेज के लिये अभूतपूर्व घटना थी वरन् सम्पूर्ण जनपद के लिये भी थी। मोहित से प्रतिस्पर्धा की भावना रखने वाले छात्र उससे इतने पीछे रह गये थे, कि कम से कम पढ़ाई के क्षेत्र में उनकी उससे प्रतिस्पर्धा की भावना ही समाप्त हो गई थी। अनेक छात्रों के मन में शनैः शनैः यह प्रतिस्पर्धा की भावना ईर्ष्या के स्थान पर मोहित के प्रति श्रद्धा अथवा प्रीति में परिवर्तित होने लगी थी। इसके अतिरिक्त उसको चिढ़ाने वाले कई छात्र अनुत्तीर्ण होकर पिछली कक्षा में रह गये थे। इससे मोहित के मानसिक क्लेश के दिन समाप्तप्राय हो चले थे।

मोहित के परीक्षा परिणाम से प्रभावित होकर कतिपय अघ्यापक उसमें विशेष रुचि लेने लगे थे- विशेषतः ब्राह्मण जाति के अध्यापक। इनमें एक त्रिपाठी जी थे, जिन्होंने मोहित को बुलाकर कहा था,

"तुम्हें प्रतिदिन अखबार अवश्य पढ़ना चाहिये- मेरे यहाँ से ले जाया करो और दूसरे दिन वापस कर दिया करो।"

इसी बीच कालेज के वार्षिकोत्सव पर एक नाटक का मंचन आयोजित करने का कार्यक्रम बना। इस नाटक में मेरी नामक अँग्रेज़ लड़की की भूमिका प्रमुख थी। इंटर कालेज में कोई लड़की नहीं पढ़ती थी और मोहित की तुलना में अन्य लड़कों की अँग्रेज़ी कमज़ोर थी, एवं उनका उच्चारण भी अशुद्ध था। अतः अँग्रेज़ी के अध्यापक ने मोहित से मेरी की भूमिका निभाने को कहा और एक आज्ञाकारी छात्र की भाँति उसने स्वीकार कर लिया। नाटक में मोहित की भूमिका सबने पसंद तो बहुत की और उसे चार आने में क्रय किया हुआ एक मेडल भी पुरस्कार स्वरूप मिला, परंतु पुनः कुछ लड़कों को उसे चिढ़ाने का अवसर मिल गया। मोहित अब उनके चिढ़ाने से वैसा ग्लानिग्रस्त नहीं हुआ था जैसा पहले हो जाता था, परंतु तभी त्रिपाठी जी ने उसे अपने घर पर बुलाकर गम्भीर होकर पूछा,

"तुम्हें लड़की की भूमिका किसने दी थी और तुमने स्वीकार क्यों की?"

मोहित सकपका गया और उसने धीरे से अध्यापक का नाम बता दिया। त्रिपाठी जी ने सक्रोध कहा,

"तुम्हें लड़की का पार्ट नहीं करना चाहिये था- कम से कम मुझसे पूछ ही लिया होता। इससे तो स्त्रीत्व के गुणों का प्रदुर्भाव होता है।"

मोहित को काटो तो खून नहीं। वह कोई उत्तर न दे सका, परंतु बहुत दिनों तक क्षोभग्रस्त रहा।

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मोहित अपने गाँव की बैठक के सामने अवाक् खड़ा था। वार्षिक परीक्षा के उपरांत मई के महीने में वह घर आया हुआ था और घर वालों से मिल चुकने के बाद यह कहकर बैठक पर आ गया था,

"हम अबै आत हैं।" /मैं अभी आता हूँ।/

"लला, जल्दी अइयौ"- मोहित की माँ उसकी इस आदत से परिचित थीं कि मोहित को गॉव में आते ही अपने बचपन के साथियों से मिलने का बड़ा चाव रहता था और कभी-कभी वह बिना खाये-पिये उनसे देर तक बतियाया करता था। अतः उन्होंने उसे शीघ्र वापस आने को कहा था। परंतु इस बार मोहित का मन अन्य साथियों से बतियाने की अपेक्षा सतिया से मिलने को अधिक उत्कंठित था। दो माह पहले ही वह होली की छुट्टी पर घर आया था और उसने एकांत पाकर अपनी पिचकारी से सतिया को होली के रंग से सराबोर कर दिया था और उसे ऐसा प्रतीत हुआ था कि रंग की धार के साथ उसका मन सतिया की मुस्कराहट में रँगता चला गया था। रंग खेले जाने के दूसरे दिन ही विद्यालय खुलना था और परीक्षा निकट होने के कारण वह कक्षायें छोड़ भी नहीं सकता था। अतः दूसरे दिन की ब्राह्मवेला में सतिया को बिना देखे ही वह अपने विद्यालय जाने हेतु रेलगाड़ी पकड़ने चल दिया था। इस बार मोहित का ध्यान पढ़ाई में पूर्णतः नहीं टिक पा रहा था। सतिया की रंग से भीगती धोती के उसके वक्ष से चिपट जाने और सतिया की आनंदातिरेक में डूबी मुस्कराहट उसके मन में ऐसी बस गई थी कि सोते-जागते वह दृश्य उसके मानसपटल पर आ जाता था। मन के इस प्रकार मोहग्रस्त रहने के कारण उसका ग्यारहवीं कक्षा का परिणाम भी अपेक्षा से कम अच्छा रहा था।

मोहित सतिया की झोंपड़ी की ओर आश्चर्य से देख रहा था। वहाँ किसी मनुष्य के बसे होने का कोई चिन्ह दिखाई नहीं दे रहा था, वरन् उसके अंदर से भैंस की पड़ियों के रेंकने की आवाज़ आ रही थी। मोहित का मन किसी अनहोनी की सूचना पाने की आशंका से घबराने लगा था कि तभी उसका एक साथी उसे देखकर वहाँ आ पहुँचा और बोला,

"उअयें का देख रहे हौ? सतिया कौं? /उधर क्या देख रहे हो? सतिया को?"

फिर कुछ रुककर मोहित के मुँह की ओर घूरकर आगे कहने लगा,

"अरे हाँ। तुम तौ होरी के बाद भोर मैं चले गये हते, सो तुमैं का पतो हुइयै। होरी की रात मैं पस्सराम गाँव बालिन कौं बिना कछू बतायें अपयें परिवार कौं लैंकें कहूँ चलो गओ हतो। आज लौ कोई नाईं जान पाओ कि कहाँ गओ है? /अरे हाँ। तुम तो होली के बाद सुबह ही चले गये थे, इसलिये तुम्हें क्या पता होगा। होली की रात्रि में पस्सराम गाँव वालों को बिना कुछ बताये अपने परिवार को लेकर कहीं चला गया था। आज तक कोई नहीं जान पाया है कि कहाँ गया है।"

मोहित के साथी का प्रत्येक शब्द मोहित के हृदय को बेध रहा था, परंतु अपनी वेदना को छिपाते हुए उसने पूछा,

"जा पता चली कि गाँव काये छोड़ गओ है? /यह पता चला कि गाँव क्यों छोड़ गया है?"

उसका साथी दार्शनिक तटस्थता के भाव से बोला,

"तुम तो जानतई हौ कि हल्ला की जमीन पै रहबे बालो उनकी मर्जी के बिना साँसऊ नांईं लै सकत है। सो हल्ला की कछू करतूत हुइअये। / तुम तो जानते ही हो कि हल्ला की ज़मीन पर रहने वाला उनकी मजीऱ् के बिना साँस भी नहीं ले सकता है। इसलिये हल्ला की ही कुछ करतूत होगी।"

मोहित से आगे कुछ न बोला गया और वह चुपचाप घर के अन्दर चला आया।

मोहित उस वर्ष गर्मियों की छुट्टियों के कुछ दिन ही गाँव में बिता सका और वे भी बडी कठिनाई से; और वह यह कहकर भरतपुर चला आया कि अगले वर्ष इंटर फ़ाइनल की परीक्षा होने के कारण उसे बहुत पढ़ाई करनी है।

पर मन क्या स्थान परिवर्तित कर देने मात्र से शांत हो जाता है? उसके मन को सतिया की याद में एवं उसकी चिंता में भटकना था, सो भटकता रहा।

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अगले वर्ष इंटरमीडिएट की परीक्षा उत्तीर्ण करने के पश्चात मोहित आगे पढ़ाई हेतु दिल्ली विश्वविद्यालय चला आया था।


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