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ISSN 2292-9754

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01.06.2016


भीगे पंख
मोहित और सतिया /तीन/

‘झंडा ऊँचा रहे हमारा,
विजयी विश्व तिरंगा प्यारा;
झंडा ऊँचा रहे हमारा।
इसकी शान न जाने पाये.
इसकी आन न जाने पाये
......................................’

15 अगस्त को प्रातःकाल कुदरकोट के प्रायमरी एवं मिडिल स्कूल के बच्चों का जुलूस कसबे से गुज़र रहा था। आगे चलने वाला अध्यापक जितनी ज़ोर एक पंक्ति कहता था, पीछे के बच्चे उतनी ही ज़ोर से उसे दोहराते थे। यद्यपि रात में बारिश होती रही थी, परंतु प्रातः होते ही थम गई थी। आकाश में बादल अभी भी छाये हुए थे और प्रातःकालीन हवा में नमी और उमस थी। कसबा कुदरकोट के ऊँचाई पर बसे होने के कारण गलियों से पानी बह गया था, परंतु फिर भी कहीं-कहीं कीचड़ था।

अधिकतर बच्चों के सिर पर गाँधी टोपी थी और हाथों में काग़ज़ पर बने तिरंगे झंडे थे जो लम्बे से नरकुल के सेंठा के ऊपर चिपके हुए खड़े थे। जुलूस के आगे अध्यापकगण चल रहे थे जो एक पंक्ति गाते थे और बच्चे उसे दोहराते थे। हर बार ‘झंडा ऊँचा रहे हमारा’ के गायन के साथ बच्चों के हाथों के झंडे ऊपर उठ जाते थे। अधिकतर बच्चों को जुलूस का उद्देश्य अथवा कारण भली-भाँति ज्ञात नहीं था, परंतु उस दिन पढ़ाई से मुक्ति होने और कुछ नया करने के कारण बच्चे अति प्रसन्न थे। कसबा कुदरकोट एक खेड़े /किले ओर उसके अंदर स्थित महल के ध्वंसावशेषों से बने ऊँचे विस्तृत टीले पर बसा था। कहते हैं कि बहुत पहले यहाँ का शासक मुसलमान था जो इतना निर्दयी था कि उसकी अवज्ञा करने वालों और अपराधियों को लिटाकर उनके ऊपर हाथियों की दांय ऐसे चलवाता था जैसे गेहूँ की बालियों से गेहूँ और भूसा को अलग करने के लिये उन पर बैलों की दांय चलाई जाती थी। खेड़े पर एक स्थान विशेष पर आज भी धरती खोदने पर हड्डियाँ मिलतीं हैं जिन्हें यहाँ के लोग उन्हीं हाथी के पैरों तले पिसने वाले व्यक्तियों की हड्डियाँ मानते हैं। आज इसी खेड़े के ऊपर मिडिल स्कूल स्थित है और कसबे की सारी आबादी उसके पूर्व में ढलान पर बसी हुई है। स्कूल के पीछे पश्चिम में ज़मीन ऊबड़-खाबड़ पड़ी है और ज़मीन के अंदर ईंटों के इतने टुकड़े भरे हुए हैं कि उस पर बस करील, बेर, बबूल और कैक्टस के वृक्ष उगते हैं। कोई आबादी नहीं है। उसके पश्चात नागिन सी लहराती पुरहा नदी बहती है, जिसके किनारे के वन में एक शंकर जी का मंदिर स्थापित है, जो अपनी स्थिति की भयावहता के कारण भयानकनाथ का मंदिर के नाम से दूर-दूर तक प्रसिद्ध है। पुरहा नदी पश्चिम से चलकर खेड़े के उत्तर से होते हुए पूर्व दिशा को बहती है। बाढ़ पर होने पर नदी का पानी दूर-दूर तक फैल जाता है और उत्तर में बसे कई गाँवों का कुदरकोट से सम्पर्क टूट जाता है। अब जुलूस स्कूल भवन से चलकर नीचे पंडित राजा राम दीक्षित के मकान के दरवाज़े से गुज़र रहा था और दीक्षित जी उसे अपनी बैठक में आराम कुर्सी पर पसरे हुए वितृष्णा, व्यथा और व्यंग्य के भाव से देख रहे थे। वह अपने बगल में बैठे पं. श्यामा प्रसाद से काँग्रेसियों पर कटाक्ष करते हुए बोले,

"जे सारे गाँधी टोपी वाले राज चलाय पययैं? /ये साले गाँधी टोपी वाले राज चला पायेंगे?/"

श्यामा प्रसाद का उत्तर था, "तुम दिखियौ, थोरे दिन बाद जे सारे खुदई अंग्रेजन कौं बापिस बुलाय लययैं। /तुम देखना थोड़े दिन बाद ये साले स्वयं ही अंग्रेज़ों को वापस बुलायेंगे।/"

परंतु यह उत्तर उनकी आकांक्षा का द्योतक था विश्वास का नहीं। वर्ष 1910 में कुश्ती का शौकीन एक अंग्रेज़ पुलिस कप्तान दंगल देखते समय पं. श्यामा प्रसाद की कुश्ती को देखकर प्रसन्न हो गया था और उसने उन्हें पुलिस में सिपाही के पद पर नामित कर दिया था। वह कक्षा पाँच फेल थे परंतु अपनी वफ़ादारी और हिकमतअमली से पहले दीवान और फिर दरोगा हो गये थे और थानेदार के पद से सेवानिवृत हुए थे। पं. राजाराम के स्वार्थ उनके स्वार्थों से मेल खाते थे और उनके विचारों से वह हृदय की गहराइयों से सहमत थे। उन्होंने अपनी बात में आगे जोड़ा,

"राज करबो तौ अंग्रेजन के खून में हतौ; ताई सै अंग्रेजन के राज मै कबहूँ सूरज नाईं डूबत हतो। जे काँग्रेसी समझत हैं कि नारे लगायबे भर सै राज चल जात है? /राज करना तो अंग्रेज़ों के खून में था; इसीलिये उनके राज्य में कभी सूर्य अस्त नहीं होता था। ये काँग्रेसी समझते हैं कि नारे लगाने भर से राज चल जाता है।/"

पं. राजाराम और पं. श्यामाप्रसाद के पीछे बैठक के कमरे की दीवाल के सहारे गोरे धानुक उकड़ूं बैठा हुआ था। वह अपने दाहिने हाथ में बँधी एक रस्सी अपनी ओर खींचता और फिर छोड़ता था। छत में लगे तीन हुक से एक दो गज़ लम्बा और एक फुट चौड़ा लकड़ी का तख्ता लटक रहा था जिसके नीचे पीले मटमैले रंग का डेढ़ फुट चौड़ा कई पर्त का कपड़ा लटक रहा था। गोरे धानुक के हाथ में बँधी रस्सी लकड़ी के तख़्ते में लगे हुक से फँसी थी और रस्सी खींचने और उसमें ढील देने के साथ यह पंखा हिलता था और हवा की उमस को कम कर रहा था। गोरे धानुक उन दोनों की बातें रामायण की इस चौपाई वाले भाव से सुन रहा था- ‘कोउ नृप होइ हमैं का हानी, बाँदी छांड़ न हुइहौं रानी’। यद्यपि देश स्वतंत्र हो चुका था परंतु निर्बल वर्ग के मानस में उनके लिये सदैव यथास्थिति कायम रहने की सदियों के अनुभव से बनी आस्था की जड़ें इतनी गहरीं थीं कि यदाकदा हिल तो जातीं थी, परंतु उखड़ने का नाम नहीं लेतीं थीं। फिर गोरे धानुक के जीवन में स्वतंत्रता के उपरांत कोई परिवर्तन भी तो नहीं आया था- अंग्रेज़ों के ज़माने में उसकी दिनचर्या राजाराम दीक्षित के छत से लटकते पंखे को ऊँघते हुए हिलाते रहने और बैठक एवं जानवरों के सहन की झाडू़-बुहारू करने तक सीमित थी, जो यथावत आज भी चल रही थी। यद्यपि दोनों पंडितों में किसी का ध्यान उसकी तरफ़ नहीं था परंतु वह हर एक की बात समाप्त होने पर सहमति में खीसें निपोर देता था जैसे ऐसा न करने से उनकी तौहीन हो जायेगी।

जुलूस आगे बढ़ा तो उन पतली गलियों से गुज़रने लगा जहाँ दोनों ओर घनी आबादी के बीच गंदगी का साम्राज्य था और बजबजाती नालियों, और कुड़कती मुर्गियों के बीच मैली कुचैली सलवार कुर्ता पहिने औरतें और बच्चे गृहकार्य, खेलकूद और आपसी गाली-गलौज की दिनचर्या में व्यस्त थे। इस गली के जुम्मन मियाँ जैसे कतिपय बाशिंदों को काफी़ दिनों से इस उधेड़बुन के कारण अच्छी नींद नहीं आ रही थी कि अल्लाह की पाकज़मीं पाकिस्तान को तर्कसकूनत कर दिया जाये या हिंदुओं के हुकुम में रहकर शेष जीवन बिताया जाये। यद्यपि ये सभी लोग काला अक्षर भैंस बराबर थे परंतु यह बात सभी को मालूम थी कि मुस्लिम लीग ने यही आधार लेकर पाकिस्तान बनवाने में सफलता प्राप्त की थी कि मुसलमान हिंदुस्तान में हिंदू बहुसंख्यकों के शासन में नहीं रह सकता है। जुलूस जब जुम्मन मियाँ के घर के सामने से निकला, तो उनकी समझ में नहीं आया कि किस तरह की प्रतिक्रिया करें, और वह चुपचाप अपना हुक्का गुड़गुड़ाते हुए घर के अंदर घुस गये थे।

फिर जुलूस कोरियों, धानुकों, वाल्मीकियों और चमारों की बस्ती से होकर निकला जहाँ चारों ओर निर्धनता, निरीहता, और नैराश्य का साम्राज्य छाया हुआ था। रमचरना की अंधी माँ, जो गली के किनारे बैठी अपनी नातिन को गोद में खिला रही थी, बोली,

"जू का है? जे लड़का का चिल्लाय रहे हैं? /ये क्या है? ये लड़के क्या चिल्ला रहे हैं?/"

रमचरना अपना ज्ञान बघारते हुए बोला,

"लेउ! तुमै इत्तेऊ नाईं मालूम? आजादी आय गई है, ताई को जलूस निकरो हे। /लो तुम्हें इतना भी नहीं मालूम? आज़ादी आ गई है। उसी का जुलूस निकला है।/"

चालीस वर्ष पूर्व रमचरना की अम्मा की आँखों में भयंकर दर्द उठा था और उसके निवारण हेतु किसी बिन माँगे राय देने वाले गंवार के बताने पर उन्होंने अपनी आँखों में अकौआ का रस निचोड़ लिया था, तभी से वह अंधी हो गई्रं थीं। आजादी शब्द उन्होंने आज पहली बार सुना था, अतः अपने प्रकाशहीन दीदे फाड़कर बोलीं,

"आजादी का होत है? /आज़ादी क्या होती है?/"

इसका उत्तर तो रमचरना भी ठीक से नहीं जानता था, अतः अब अपने अज्ञान को स्वीकार करने की खीझ के कारण बोला,

"हम का जानै का होत है? जा सुनी है कि अब अंग्रेज अपयें देस चले गये हैं और काँग्रेसियन को राज हुइ गओ है। /मैं क्या जानूं क्या होती है? यह सुना है कि अब अंग्रेज़ अपने देश चले गये हैं और काँग्रेसियों का राज हो गया है।/"

आज पस्सराम जब कुदरकोट आने लगा था तो सतिया भी उसके साथ ज़िद करके चल दी थी। बच्चों का जुलूस जब बाज़ार से निकल रहा था, तो उसे देखकर पस्सराम सतिया की उँगली पकड़कर एक किनारे खड़ा हो गया था। सतिया विस्फारित नेत्रों से जुलूस को देख रही थी कि तभी उसे जुलूस में झंडा उठाये मोहित दिखाई पड़ गया था। सतिया आज पहली बार अपने गाँव से बाहर आयी थी और उसके मन में बड़ा उछाह भरा था। मोहित को यहाँ देखकर वह समस्त वर्जनाओं को भूलकर अपने पिता की उँगली छुड़ाकर मोहित की ओर दौड़ ली थी।

उसकी यह हरकत जुलूस के साथ चल रहे मुंशी जी ने देख ली थी और उन्होंने जोऱ से उसे डाँटना शुरू कर दिया था,

"हट हट, हुँअईं ठाड़ी रहिये। काऊ कौं छुइये ना। /हट हट, वहीं खड़ी रहना, किसी को छूना नहीं।/"

मुंशी जी की कड़क आवाज़ सुनकर वह सहमकर खड़ी हो गई थी और छलछलाती आँखों से मोहित की और देखती रही थी। मोहित के सम्वेदनशील मन को सतिया का इस तरह दुत्कारा जाना बुरा लगा था और वह देर तक उसकी ओर सहानुभूतिपूर्वक देखता रहा था, परंतु जुलूस से बाहर आकर सतिया से मिलने का साहस न कर सका था।



- क्रमशः


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