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ISSN 2292-9754

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03.15.2016


भीगे पंख
मोहित और सतिया/छह/

उस दिन के पश्चात मोहित सतिया के सामने पड़ने में झिझक अनुभव करने लगा था। दो माह पश्चात ही आठवाँ उत्तीर्ण करने के उपरांत मोहित को गाँव से दस कोस दूर स्थित इंटर कालेज में प्रवेश दिला दिया गया था। गाँव छोड़ने से पहले मोहित के मन में सतिया से मिलने की अतीव उत्कंठा उठी थी और वह कई बार किसी न किसी बहाने हवेली से निकल कर अपनी बैठक की ओर इस आस में गया था कि सतिया दिखाई पड़ जाये, पर सतिया से दो बात करने अथवा कम से कम उसे निगाह भर देख लेने की उसकी चाह अपूर्ण ही रह गई थी। मोहित ने अपने हृदय में एक कसक लेकर गाँव छोड़ा था जो उसे बहुत दिनों तक सालती रही थी। मोहित के चले जाने की बात जानकर सतिया को जितना उससे विछोह का दुख हुआ था, उतना ही इस बात का कि मोहित का समर्पण प्राप्त करने का सम्भवतः अब अवसर ही न मिले। इस कचोट के कारण मोहित अब उसके सपनों में आने लगा था और कभी-कभी दिवास्वप्नों में भी सतिया मोहित को अपने से प्रेम की याचना करने की कल्पना करती थी।

अब मोहित का गाँव में आना जाना किसी किसी रविवार को अथवा अन्य छुट्टियों में ही हो पाता था। छुटपन की भाँति अब सतिया अपनी माँ के साथ उसके घर नहीं आती थी। छुट्टी में गाँव में आने पर सतिया को देखने की आस में मोहित अपने घर से बाहर निकलते हुए तिरछी निगाहों से सतिया की झोंपड़ी की ओर घूर लेता था परंतु उसके निकट जाने के विचार मात्र से उसका मन एक अज्ञात भय से जकड़ जाता था। सतिया भी यदि उसे देख लेती, तो झोंपड़ी की ओट में हो जाती थी और ओट में रहकर उसके हाव-भाव निरखने-परखने लगती थी। मोहित को प्रायः सतिया से मिलने की अतृप्त चाह मन में लिये ही वापस लौट जाना पड़ता था। सतिया का मन तब उत्फुल्ल हो उठता था जब वह मोहित को हसरत-भरी निगाहों से झोंपड़ी की ओर देखता पाती थी। मोहित की प्रत्येक तड़प से उसके मन में लगा घाव कुछ कुछ भर जाता था।

वार्षिक परीक्षा प्रारम्भ होने के पूर्व होली की तीन दिन की छुट्टी में मोहित अपने गाँव आया हुआ था। वसंत ऋतु अपने यौवन पर था और होली के हुड़दंग में परिलक्षित हो रहा था। जब हल्ला के दरवाज़े पर फगुहारे रंग खेल रहे थे, मोहित ने देखा कि सतिया अपनी झोंपड़ी के बाहर एकांत में खड़ी हसरत भरी निगाहों से फगुहारों को देख रही थी। मोहित सतिया के उभरते यौवन को देखकर स्तब्ध रह गया- उस समय सतिया के कपड़े रंग से भीगे हुए थे और उसकी फटी पुरानी कमीज़ उसके उभरे वक्ष से चिपकी हुई थी। वह जब से गाँव में आया हुआ था, हर ओर वसंती रंगीनी और हँसी-मज़ाक का वातावरण छाया हुआ था और इस रंगीनी में मोहित का मन भी रंगीन हो रहा था। उसने चुपचाप अपनी पिचकारी में रंग भरा और सब की निगाह बचाकर हल्ला के घर से बाहर निकल आया। फिर अकेली खड़ी सतिया के वक्ष पर तानकर अपनी पिचकारी चला दी। यद्यपि मोहित के मन में बड़ी घबराहट थी कि कहीं कोई उसे देख न ले अथवा सतिया बुरा न मान जाये, परंतु आज होली होने के कारण उसका साहस बढ़ा हुआ था और वह अपनी कामना के वशीभूत हो रहा था। फिर मोहित यह देखकर आश्वस्त हो गया था कि वक्ष पर पिचकारी की धार पड़ने पर सतिया के चेहरे पर सकुचाहट आने के बजाय उसके होठों पर मंद-मंद मुस्कान एवं गालों पर लालामी निखर आई थी और उसके नेत्रों में मोहित के लिये अबाध प्रेम झलक रहा था। तब मोहित भी मग्न होकर उसे एकटक देखने लगा था। दोनों के बीच जब चक्षु-प्रेम का आदान-प्रदान हो रहा था, तभी मोहित को लगा कि कुछ फगुहारे हल्ला के घेर से बाहर आ रहे हैं और वह अविलम्ब मुड़कर घेर की ओर जाने लगा था। सतिया ने उसे मुड़ते देखकर विह्वलता से पुकारा -

"मोहित!"

मोहित ने सतिया द्वारा अपने को पुकारे जाते सुना, परंतु उस धुँधलके में अपने को सतिया के निकट खड़ा हुआ देख लिये जाने के भयवश वह बिना कोई उत्तर दिये घेर में घुस गया और अन्य होली खेलने वालों में ऐसे मिल गया था जैसे वह घेर से बाहर निकला ही न हो।

मोहित को विश्वास था कि सतिया पर रंग डालते हुए उसे किसी ने नहीं देखा है, परंतु एक व्यक्ति ने उसको सतिया के वक्ष पर रंग डालते ओर सतिया की प्रेममय प्रतिक्रिया को अपनी गिद्धदृष्टि से देख लिया था- और वह थे हल्ला नम्बरदार।



- क्रमशः


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