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ISSN 2292-9754

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02.08.2016


भीगे पंख
मोहित और सतिया/पाँच/

मानिकपुर के इतिहास में प्रथम बार एक नवीन प्रकार की हलचल थी- चुनाव की हलचल।

दीवाली, होली, रक्षाबंधन, दशहरा जैसे त्योहारों अथवा किसी के यहाँ जन्म, विवाह, तिलक या कथा के अवसर पर ग्रामवासियों के जीवन में होनेवाली हलचल से ग्रामवासी परिचित थे। इन अवसरों के अतिरिक्त किसी सपेरे, जोगी, नट, बंदरवाले, भालू वाले अथवा बाइस्कोप वाले के गाँव में आने के अवसर पर बच्चों के जीवन में उठने वाली तरंगों से भी उनका परिचय था। इनके अतिरिक्त गाँव का जीवन शीत ऋतु की मैदानी नदी की भाँति एक सा बहता रहता था- ग्राम के प्रत्येक व्यक्ति की दिनचर्या भी उसकी जाति, लिंग एवं सामाजिक स्थिति के अनुसार निश्चित थी। विशेषतः ग़रीब जातियों के घरों की स्त्रियों का ढर्रा तो अपनी लकीर से बिल्कुल अलग नहीं होता था। घर की स्त्रियों की दिनचर्या ब्राह्मवेला में जागकर घुरुर-घुरुर करती चक्की पर आटा पीसने से प्रारम्भ होती थी। फिर अँधेरे में ही लोटा में पानी लेकर किसी खेत में जाकर निवृत्त होना पड़ता था- इस क्रिया हेतु उच्च जाति की स्त्रियों को भी खेत में ही जाना पड़ता था क्योंकि संडास या फ़्लश के विषय में किसी को ज्ञान नहीं था। पुरुषों को दिन में भी खुले आम बम्बा /छोटी नहर/ अथवा पोखरी के किनारे किसी खेत में बैठ जाने की आज़ादी थी और वे निवृत्त होने के बाद वहाँ से उठकर बम्बा या पोखर पर जाकर उसके पानी से शौच करते थे। स्त्रियाँ शौच के उपरांत घर लौटकर मिट्टी से हाथ धोतीं थीं और मिट्टी से ही लोटा धोतीं थीं। फिर चूल्हे की राख से दांत माँजतीं थीं। तब तक पुरुष भी नाश्ता लेने और काम पर जाने के लिये तैयार हो जाते थे। स्त्रियाँ पुरुषों को सत्तू या पिछली रात्रि में बनाई मक्का या जौ की बासी रोटी खिला देतीं थीं और उसमें बची-खुची स्वयं खा लेतीं थीं। फिर पुरुषों द्वारा अपने अथवा अपने मालिकों के हल-बैल लेकर खेत पर जाने पर स्त्रियों द्वारा बच्चों की देखभाल के अतिरिक्त बड़े लोगों के घरों का सफ़ाई करना, जानवरों का गोबर-कूड़ा करना और दूध दुहना आदि काम निबटाये जाते थे। तत्पश्चात दोपहर का भेाजन बनाकर स्त्रियाँ पुरुषों के लिये भोजन और लोटे में पानी लेकर खेत पर पहुँचातीं थीं। वापस लौटकर घर में सबके खाने के बाद ही खाना खातीं थीं। फिर एक आध घंटा के आराम के बाद ओखली में कुटाई, मिथैारी /बड़ी/ बनाना, फटे कपड़ों की मरम्मत करना जैसे काम प्रारम्भ हो जाते थे। दिन ढलते-ढलते रात का खाना बनाना प्रारम्भ हो जाता था। रात में सबके खा-पी चुकने के बाद स्वयं खाना खाकर और चौका बर्तन धोकर विवाहित स्त्रियों को पति-संतुष्टि का काम भी शेष रह जाता था। कमलिया की दिनचर्या भी कुछ-कुछ ऐसी ही थी और विवाहोपरांत इसी प्रकार की दिनचर्या को बिना किसी ना-नुकुर किये अपनाने का प्रशिक्षण कमलिया अपनी बिटिया को भी देने का प्रयत्न कर रही थी, परंतु कभी-कभी सतिया द्वारा उस प्रशिक्षण को मन से ग्रहण करने के विषय में उसे गम्भीर शंका होने लगती थी। यद्यपि सतिया कमलिया की खुली अवहेलना नहीं करती थी, परंतु कभी-कभी उसके हाव-भाव और तेवर देखकर कमलिया सशंकित हो जाती थी कि ससुराल में जाकर सतिया आदर्श ग्रहणी साबित होगी भी या नहीं।

देश के प्रथम चुनाव की घोषणा हो चुकी थी और पिछले कुछ दिनों से गाँव में नेता लोगों का आगमन प्रारम्भ हो गया था। आज चुनाव में वोट माँगने ठाकुर गजेंद्र सिंह आये हुए थे। ठाकुर गजेंद्रसिंह सोशलिस्ट पार्टी के प्रत्याशी थे। उनके विरोध में प्रमुख प्रत्याशी काँग्रेस के शुक्ला जी थे; उनके बेटे का विवाह हल्ला की पुत्री से हुआ था, अतः हल्ला काँग्रेस के प्रत्याशी शुक्ला जी, जो उनके समधी भी थे, को जिताना चाहते थे। यद्यपि देश के अधिकतर ‘हरिजन’ काँग्रेस के पक्ष में थे, परंतु हल्ला के अत्याचारों के कारण मानिकपुर गाँव के ‘हरिजन’ मन ही मन चाहते थे कि शुक्ला जी हार जांयें। गजेंद्रसिंह अपनी नई खरीदी हुई चमकदार बी.एस.ए. सायकिल पर बैठकर आये थे। उनके साथ एक प्रौढ़ सज्जन तथा तीन नवयुवक अपनी पुरानी सायकिलों पर आये थे। उन दिनों के अधिकतर नेता वे थे जिन्होंने स्वतंत्रता संग्राम में भाग लिया था और देश के लिये कुछ न कुछ त्याग किया था। नेताओं के पास प्रायः जीपें और कारें नहीं होतीं थीं। अधिकतर नेता हिंद सायकिल पर चला करते थे। जिन नेताओं की आर्थिक दशा औरों से कुछ अच्छी होती थी वे बी.एस.ए. या हर्क्यूलिस सायकिल पर चलते थे। अगर किसी नेता का कोई पैसे वाला चेला होता था, तो वे उसकी बुलेट मोटरसायकिल पर पीछे बैठकर वोट माँगने आते थे। किसी नेता के साथ कोई गनर या शेडो लगे होने की कोई कल्पना भी नहीं कर सकता था। गजेंद्रसिंह के साथ आने वाले नवयुवक वे थे जो खेत-खलिहान पार करते समय अथवा गाँव आ जाने पर उनकी सायकिल पकड़ कर पीछे चलने लगते थे। इन युवकों का भविष्य में स्वयं भी नेता बनने का सपना था। प्रौढ़ सज्जन की सायकिल के कैरियर में एक छोटी सी तिरपाल और रस्सी बँधी हुई थी और नवयुवकों में एक की सायकिल के कैरियर में एक लाउडस्पीकर ओर दूसरे की सायकिल में एक बैटरी बँधी हुई थी। ये लोग लालजी शर्मा की बैठक पर आये थे। बैठक पर पहुँचते ही एक युवक ने तिरपाल कैरियर से निकाल कर उसके कोनों को रस्सियों से बाँधना प्रारम्भ कर दिया था। फिर एक कोने को चबूतरे पर खड़े नीम की डाल से, दूसरे और तीसरे को दीवाल में लगी खूंटियों से और चौथे को कुएँ के खम्भे की मुँडेर से बाँध दिया था। दूसरे युवक ने लाउडस्पीकर में बैटरी फिट कर के ‘हलो-हलो’ बोलना प्रारम्भ कर दिया था। नवयुवकों में उदयप्रतापसिंह नाम का युवक अन्यों से अधिक होशियार था और लाउडस्पीकर के काम को वही सँभाल रहा था। लालजी शर्मा द्वारा ख़बर करवा देने पर गाँव वाले इकट्ठे होने लगे थे। इसमें ‘हरिजनों’ को भी बुलाया गया था क्योंकि उनके वोट काफ़ी थे। गजेंद्रसिंह, उदयप्रतापसिंह, लालजी शर्मा, हल्ला, हरीराम चौबे, रतीराम पाठक आदि सवर्ण बैठक के सामने पड़े तख़्त और चारपाईयों पर बैठ गये थे। धर्माई नाई, रामू भुर्जी, रामकुमार कुम्हार, भग्गी और कलू काछी, राजाराम बढ़ई आदि कुएँ के चारों ओर बनी फ़र्श की मुँडेर पर बैठ गये थे। ‘हरिजन’ बैठक के चबूतरे के एक किनारे पर बैठ गये थे। यद्यपि शासन ने अस्पृश्यता समाप्त करने की घोषणा कर दी थी, तथापि समाज का उच्च वर्ग चुनाव में वोट माँगते समय भी इस प्रथा को तोड़ना नहीं चाहता था और सदियों से अछूत माने जाने वाले लोगों में स्वयं इसे तोड़ने का साहस नहीं था। सतिया की झोंपड़ी हल्ला के मकान के बगल में थी और लालजी शर्मा की बैठक के सामने। बीच में बस कुंआ था। लालजी शर्मा या हल्ला के मकान की बैठक पर ही प्रायः चुनावी मीटिंगें आयोजित होतीं थीं। सोशलिस्ट पार्टी के नेता प्रायः लालजी शर्मा के यहाँ आते थे और काँग्रेस वाले हल्ला के यहाँ आते थे। यद्यपि लालजी शर्मा को सोशलिस्ट अथवा काँग्रेस में किसी से कोई लगाव नहीं था परंतु चूँकि सोशलिस्ट पार्टी के प्रत्याशी गजेंद्रसिेह सर्व प्रथम पंडित लालजी शर्मा से वोट माँगने हेतु मिले थे और हल्ला के समधी के विरोध में थे, अतः वह मन ही मन सोशलिस्ट पार्टी के पक्ष में हो गये थे। परंतु किसी भी पार्टी के उम्मीदवार के आने पर और उनका बुलावा आने पर लालजी शर्मा और हल्ला एक दूसरे के दरवाज़े पर चले जाते थे। उन दिनों राजनीति में आज जैसी शत्रुता की भावना नहीं थी। आज भी हल्ला लालजी शर्मा की बैठक पर आये थे और ठाकुर गजेंद्रसिंह द्वारा पालागन कहने पर उन्हें मुस्कराकर आशीर्वाद दिया था।

चुनाव की महत्ता पर प्रकाश डाला। फिर उदयप्रतापसिंह ने गजेंद्रसिंह के व्यक्तित्व एवं जनसेवा की भावना का गुणगान किया। तत्पश्चात ठाकुर गजेंद्रसिंह ने अपनी पार्टी की़ नीतियों को सर्वजनहिताय बताते हुए उन्हीं से देश का हितसाधन होने की बात कही और उनके चुने जाने पर उस गाँव की कायापलट कर देने के वादे किये; एवं स्वयं को वोट देने हेतु सबसे अनुरोध किया। उन्होंने गाँव वालों से यह भी कहा कि यदि उनकी पार्टी जीत गई तो समाज में व्याप्त अशिक्षा, बेगारी, भुखमरी, छुआछूत, शोषण आदि को समाप्त कर असली रामराज स्थापित कर देगी। उनकी बात किसने कितनी समझी, यह कहना कठिन है परंतु अधिकतर श्रोता हामी में अपना सिर ऐसे हिलाते रहे जैसे वे वक्ता से पूर्णतः सहमत हों- गाँव वाले न तो हल्ला के बुरे बन सकते थे और न लज्जराम के।

इन मीटिंगों के आयोजित होने पर सतिया प्रायः अपनी झोपड़ी से बाहर आकर खड़ी हो जाती थी और ध्यान से नेताओं की चिकनी-चुपड़ी बातों और ग्राम के विभिन्न जातियों के लोगों की प्रतिक्रिया सुनती-देखती रहती थी। सतिया उनमें से कुछ बातें समझ पाती थी और कुछ नहीं समझ पाती थी, परंतु उसकी समझ में यह अवश्य आने लगा था कि उसके गाँव में प्रचलित अनेक प्रथायें अन्यायपूर्ण हैं, जिनको बदलने की बात नेता लोग करते हैं।

चुनाव का वास्तविक व्यूह तो तब रचा जाता था जब अन्य लोग चले जाते थे और विशिष्ट व्यक्ति ही रह जाते थे। तब सारी मंत्रणा का उद्देश्य यह रहता था कि क्या-क्या हथकंडे अपनाकर किस-किस जाति के वोट अपने पक्ष में किये जा सकते हैं। ये मंत्रणायें भी हल्ला या लालजी शर्मा की बैठक पर ही होतीं थीं, और सतिया किसी बहाने वहीं आसपास खड़ी होकर चुपचाप इन मंत्रणाओं को ध्यान से सुनती रहती थी। उसे इन मंत्रणाओं को सुनने में आंतरिक रुचि रहती थी और एक प्रकार के उल्लास का अनुभव होता था। उस दिन भी मीटिंग समाप्त होने पर जब शाम का अँधियारा घिरने लगा और बैठक पर गजेन्द्रसिंह व उनके साथी तथा लालजी शर्मा ही रह गये थे, तब गजेंद्रसिंह ने लालजी शर्मा से कहा,

"पंडित जी, जा बताउ कि आप के गाँव के ‘अछूत’ कियैं जययैं। सुनी है कि हल्ला उनके बोट काँग्रेस कौं दिबैबे की पूरी कोशिश कर रहे हैं। /पंडित जी, यह बताइये कि आप के गाँव के ‘अछूत’ किधर जायेंगे। सुना है कि हल्ला उनके वोट कंाग्रेस को दिलाने का पूरा प्रयास कर रहे हैं।/"

लालजी शर्मा बोले,

"बात तौ साँची है लेकिन पस्सराम को ‘अछूतन’ पै काफी जोर है और आजकल बू हमाई बात मानत है। /बात तो सही है लेकिन पस्सराम का ‘अछूतों’ पर काफ़ी ज़ोर है और आजकल वह मेरी बात मानता है।/"

तब तक लालजी शर्मा को कुछ दूरी पर खड़ी सतिया दिखाई दे गई थी और उसकी ओर देखकर वह कहने लगे थे,

"जाउ, अपयें बापू कौं भेज देउ। /जाओ, अपने बापू को भेज दो।/"

सतिया अपने बापू को लिवा लाई और फिर कुछ दूरी पर जाकर ऐसे खड़ी हो गई, जैसे उसे इस बातचीत से कोई मतलब ही न हो। तब लालजी शर्मा ने पस्सराम से धीरे से कहा,

"कहौ, अब गाँव के ‘हरिजन’ कियैं जाय रहे हैं? /कहो, अब गाँव के हरिजन किधर जा रहे हैं।/"

पस्सराम ने सहमी हुई आवाज़ में उत्तर दिया,

"मालिक! हम तौ पूरी कोसिस कर रहें हैं कि सब लाल टोपी कौं बोट दें, लेकिन हल्ला ने ‘अछूतन’ कौं धमकाय रखो है कि जो लाल टोपी कौ बोट दियै, बाय बे अपओं खेत जुतबे के लैं बटाई पै नाईं दियैं। ‘अछूतन’ कौं जू डर और है कि जिननें हल्ला सै पैसा उधार लेत बखत सादे कागज पै अंगूठा लगाय रखो है, उन पै बे कागज मैं दस गुनी रकम लिख कें नालिस न कर देंय। /मालिक, हम तो अपनी तरफ़ से पूरी कोशिश कर रहे हें कि सब लाल टोपी /सोशलिस्ट/ को वोट दें, परंतु हल्ला ने हरिजनों को धमका रखा है कि जो लाल टोपी को वोट देगा, उसे वह अपना खेत जोतने को नहीं देंगे। हरिजनों को यह डर और है कि जिन्होंने हल्ला से पैसा उधार लेते समय सादे काग़ज़ पर अंगूठा लगा रखा है, उन पर वह काग़ज़ पर दस गुना रकम लिखकर नालिश न कर दें।/"

"हम दिखयैं कि हल्ला कैसें ऐसो कर लियैं? अब कोई काऊ को गुलाम थोड़ेऊँ है? अब देस आजाद है।/ हम देखेंगे कि हल्ला ऐसा कैसे कर लेंगे? अब कोई किसी का गुलाम थोड़े ही है? अब देश आज़ाद है।/"

पस्सराम उनकी इस बात को सुनकर अविश्वास से मुस्करा दिया था क्योंकि वह आज़ादी के धरातलीय सत्य को समझ रहा था। सच तो यह था कि गजेंद्रसिंह स्वयं भी अपनी इस बात पर आश्वस्त नहीं थे कि वह हल्ला को उनके द्वारा दी गई धमकी के कार्यान्वयन से रोक सकते हैं। लालजी शर्मा और पस्सराम गजेंद्रसिेह की बात पर कुछ देर चुप रहे, फिर लालजी शर्मा ने गजेंद्रसिेह को आश्वस्त करते हुए कहा था कि वह उनके लिये पूरा प्रयत्न करेंगे ओर उन्हें आशा है कि अधिकतर ‘अछूत’ पस्सराम की सलाह पर अमल करेंगे।

हल्ला रौब दिखाते हुए काँग्रेस पार्टी के प्रत्याशी शुक्ला जी से कह रहे थे,

"हम दिखययैं, पस्सराम सारो कैसें सोशलिस्टन कौं बोट दिबात है? /हम देखेंगे कि पस्सराम साला कैसे सोशलिस्टों को वोट दिलाता है?/"

शुक्ला जी को पता चला था कि अधिकतर ‘अछूत’ काँग्रेस के खिलाफ़ हैं और वह हल्ला से अनुरोध करने आये थे कि पस्सराम पर नियंत्रण रखें और उस पर दबाव डालकर अस्पृश्य मानी जाने वाली जातियों से भी उन्हें वोट दिलायें। हल्ला ने पहले से ही पस्सराम से कह रखा था कि ‘हरिजनों’ से कह देना कि अपनी ख़ैर चाहते हैं तो वे काँग्रेस पार्टी के उम्मीदवार को ही वोट दें; परंतु उनको भी उड़ती हुई ख़बर मिली थी कि पस्सराम ऊपरी तौर से काँग्रेस पार्टी को वोट देने को कहता था परंतु बाद में अपने विश्वस्त लोगों को यह कहकर भड़काता था,

"हल्ला आज लौ हम लोगन कौं जूता की नोक पै रखें रहे, और आज बोट चाँहत हैं अपयें समधी के लैं। अगर इनके समधी जीत गये, तब तौ जे और आगी मूतन लगययें। /हल्ला आजतक तो हम लोगों को जूता की नोंक पर रखते रहे हैं और अब वोट माँगते हैं अपने समधी के लिये। अगर इनके समधी जीत गये, तब तो यह और आग मूतेंगे।/"

हल्ला की बात सुनकर भी शुक्ला जी पूर्णतः आश्वस्त नहीं हो सके थे और बोले थे,

"सो तौ हम जान्त है कि पस्सराम आप के कंटौल सै बाहिर नाईं जाय सकत है, फिरऊँ बा पै निगाह रखबे की जरूरत है। /सो तो हम जानते हैं कि पस्सराम आप के कंट्रोल से बाहर नहीं जा सकता है, फिर भी उस पर निगाह रखने की ज़रूरत है।/"

हल्ला को अपने समधी के स्वर में अपने ‘कंटोल’ पर विश्वास का अभाव लगा, जो उनकी शान के खिलाफ़ था। अतः वह बाहरी दरवाज़े के पास खड़ी सतिया को पुकार कर बोले,

"सतिया! अपयैं बापू कौं भेज देउ। /सतिया, अपने बापू को भेज दो।/"

सतिया चुचाप अपनी झोपड़ी में चली गई और पस्सराम को लेकर वापस आ गई। पस्सराम को देखते ही हल्ला गुस्सा दिखाते हुए बोल पड़े,

"पस्सराम सुनी है कि तुम आजकल लाल-टोपी बालन मैं जादां उठत-बैठत हौ? /पस्सराम सुना है कि तुम आजकल लाल-टोपी वालों /सोशलिस्टों/ में अधिक उठते बैठते हो?/"

पस्सराम सकपका गया और उसके मुँह से बस इतना निकला था,

"नांईं मालिक, हम आप सै अगल्ल कहॉ जाय सकत हैं? /नहीं मालिक! हम आप से अलग कहाँ जा सकते हैं?/"

अपनी बात का प्रभाव बढ़ाने के उद्देश्य से हल्ला फिर आँखें तरेर कर बोले थे,

"एक बात याद रखियौ कि मड़इयन को एकौ बोट इयैं सै उयैं गओ तौ तुम्हाई खैर नाईं है। /एक बात याद रखना कि मड़इयन /हरिजन टोला/ का एक भी वोट इधर से उधर गया तो तुम्हारी ख़ैर नहीं है।/"

पस्सराम भयवश काँपते हुए साफ़ झूठ बोल गया था,

"मालिक, हम अपईं ओर सै कोई कोर कसर नांईं छुड़ययैं। /मालिक, हम अपनी ओर से कोई कोर कसर नहीं छोड़ेंगे।/"

सतिया यह वार्तालाप सुन रही थी और हल्ला की बात सुनकर उसका खून उबलने लगा था। यद्यपि चुनावी राजनीति अथवा चुनाव से प्राप्त होने वाली सत्ता की ताकत का उसे कुछ भी ज्ञान नहीं था, परंतु घर में होने वाली बातचीत से वह जान चुकी थी कि ‘अछूत’ लोग हल-बैल की जोड़ी /काँग्रेस पार्टी का चुनाव चिन्ह/ के बजाय बरगद /सोशलिस्ट पार्टी का चुनाव चिन्ह/ को वोट देना चाहते हैं। हल्ला की चेतावनी का उल्लंघन कितना घातक हो सकता है, इसका उसे अनुमान था; और यही मजबूरी उसके क्षोभ को असहनीय बना रही थी। वह अपने पिता के पीछे चुपचाप अपनी झोपड़ी में वापस आकर अपने क्षोभ एवं भय पर नियंत्रण करने के प्रयत्न में लेट गईं थी।

ज्यों ज्यों चुनाव का दिन निकट आता जा रहा था, गाँव की गलियों का चिर-सूनापन नेताओं एवं उनके सहयोगियों के आगमन, और सायकिलों पर लगे लाउड-स्पीकरों की घ्वनि के कोलाहल में परिवर्तित होता जा रहा था। बम्बा की पुलिया पर, पेड़ों पर और घरों के सामने विभिन्न पार्टियों के झंडों की झालर लगा दी गई थी, जिससे धूलधूसरित रहने वाली गाँव की गलियों में कुछ रंगीनी आ गई थी। प्रायः नेताओं के आगमन पर उनके अनुयायी काँग्रेस-जिंदाबाद, महात्मा गाँधी की जय, समाजवाद अमर रहे जैसे नारे लगाने लगते थे। कभी-कभी सतिया का मन करता कि सोशलिस्ट पार्टी के नेता के आगमन पर वह भी अन्यों के साथ नारे लगाये।

हल्ला को पक्की ख़बर हो गई थी कि सभी ‘अछूत’ सोशलिस्ट पार्टी को वोट देने का मन बना चुके हैं। अतः चुनाव वाले दिन के पहले की सायं को हल्ला ने पस्सराम को बुलाकर अंतिम चेतावनी दी थी,

"अगर कोई अछूत बोट डारन गओ, तौ हाथ पाँय टुरबाइ दियैं। /अगर कोई ‘अछूत’ वोट डालने गया, तो हाथ पैर तुड़वा दूँगा।/"

पस्सराम ने घर आकर जब यह बात कमलिया को बताई, तो उसकी प्रतिक्रिया थी,

"ठीकई है- कोई नृप होइ हमैं का हानी, बाँदी छोड़ न हुइहौं रानी? /ठीक ही है- कोई राजा हो हमारा क्या जाता है? हमें कौन रानी बनना है।/"

परंतु हल्ला की ‘अछूतों’ को वोट डालने की मनाही सुनकर सतिया का मन क्रोध एवं विद्रोह से भर गया था और उसके अतिरेक में उसे उस रात नींद नहीं आई थी।

दूसरे दिन कोई ‘अछूत’ वोट डालने नहीं जा सका था क्योंकि हल्ला ने मड़इयन से लेकर बम्बा पर बने मतस्थल पर जाने वाले रास्ते पर अपने लठैत बिठा दिये थे।

सतिया के रक्त का उबाल तब शांत हुआ था जब पाँच दिन बाद चुनाव का परिणाम ज्ञात हुआ था एवं सोशलिस्ट पार्टी के प्रत्याशी गजेंद्रसिंह विजयी घोषित हुए थे। सोशलिस्ट पार्टी के प्रत्याशी की विजय से सतिया को ऐसा लगा जैसे हल्ला की ज्यादतियों की पराजय हो गई हो; उसे यह भी आभास हुआ कि चुनाव की ताकत हल्ला की ताकत से ऊपर है।



- क्रमशः


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