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ISSN 2292-9754

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12.14.2015


भीगे पंख
मोहित और सतिया /एक/

सूर्योदय में अभी कुछ पल की देरी थी- रात्रि, जो देर से दिवस से मिलन को प्रतीक्षारत रही थी, दिन के आगमन के साथ अपने को उसके अंक में विलीन कर रही थीं। मकानों की दीवालों के छेदों में रहने वाली गौरैया ने देर से चीं-चीं करके प्रातः के आगमन की सूचना देनी प्रारम्म्भ कर रखी थी। छतों पर पिछले दिनों सूखने हेतु डाले गये अनाज के बिखरे दानों को चुगने हेतु एक दो मोर आ चुके थे। मानिकपुर के अधितर घरों में जगहर हो चुकी थी। भग्गी काछी, महते चमार, धर्माई नाई आदि अनेक लोग अपना हल-बैल लेकर खेतों को चल दिये थे। कमलिया अधजगी सतिया को गोद में उठाकर लालजी शर्मा की हवेली को चोर की भांति चल पड़ी थी। काम करने के लिये वहाँ जाने का आज उसका पहला दिन था और हल्ला द्वारा देख लिये जाने पर रोक दिये जाने के भय से उसको धुकधुकी हो रही थी।

सतिया जैसे ही हवेली के फाटक के अंदर कदम रखने वाली थी कि स्यामा, जो हल्ला का ख़ास आदमी था, ने उसे टोक दिया,

"भौजी! आज बड़े सबेरे सबेरे हवेली मैं जाय रही हौ?"\

कमलिया का कलेजा काँप गया, और वह केवल ‘हाँ’ कहकर अंदर बढ़ गई थी।



"सतिया! नाईं हुँअईं बैठी रहौ। कछू छुइयौ ना। /सतिया नहीं, वहीं बैठी रहो। कुछ भी छूना मत।/"

जब भी सतिया अपने स्थान से घुटनों के बल चलकर हवेली के सहन से अंदर जाने वाले दरवाज़े की ओर बढ़ने का प्रयत्न करती थी, कमलिया उसे डांट कर रोक देती थी। वह फिर टुकुर टुकुर दरवाज़े की ओर देखने लगती, जहाँ पर अक्सर उसे मोहित दिख जाता था। कमलिया ने हल्ला के घर के अतिरिक्त हवेली में लालजी शर्मा के घर पर जानवरों का गोबर बटोरने, सफ़ाई करने और कंडा पाथने का काम ले लिया था। इसके पीछे एक कारण अतिरिक्त आय का होना तो था ही, साथ ही मन का यह भाव भी था कि कम से कम कुछ अवधि के लिये ही सही उसे हल्ला की निकटता से यथासम्भव बचने का अवसर मिलेगा। हल्ला द्वारा प्रायः सतिया की आँखों के सामने उससे बलात सम्भोग करने से कमलिया अत्यंत लज्जा का अनुभव करती थी और सतिया के कोमल मन पर पड़ने वाले दुष्प्रभाव से चिंतित रहने लगी थी।

पहले ही दिन हल्ला को कमलिया का लालजी शर्मा के यहाँ काम करने का पता चल गया था। उन्हें अच्छा तो नहीं लगा था पर इसका दूरगामी उपयोग सोचकर उन्होंने कमलिया को हवेली में काम करने से मना नहीं किया था।

सतिया अभी चलना सीख रही थी और प्रायः घुटनों के बल चलती थी। कमलिया जब हवेली के सहन में गोबर कूड़ा करने जाती थी तो सतिया को गोद में ले जाती थी और गोबर का पैला बगल में दबाने से पहले उसे सहन के एक कोने में बिठा देती थी तथा उसके घुटनों के बल इधर उधर चलने के प्रयत्न पर उसे बीच बीच में डांट कर रोकती रहती थी।

सतिया का रंग अपने माँ और बाप दोनों की तुलना में साफ़ था और अपने गोल चेहरे व फूले गालों के कारण वह बड़ी प्यारी लगती थी। मोहित प्रायः हवेली के सहन में जाने वाले दरवाज़े पर आकर खड़ा हो जाता था और वहाँ से सतिया को देखने लगता था। उसका मन सतिया को गोद में लेने और उसके साथ खेलने को होता था परंतु वह जब भी दरवाज़े से निकल कर सहन की और बढ़ता था, तभी मोहित की माँ उसे दरवाज़े के बाहर कदम रखने से वर्जित कर देतीं थीं,

"उंअयें न जाउ, कहूँ तुमसै सतिया छुइ न जाय, नांईं तौ अबै हनान परिययै। /उधर मत जाओ। कहीं सतिया तुमसे छू न जाये, नहीं तो अभी नहाना पड़ेगा।/"

वह कमलिया को भी सतर्क करतीं रहतीं थीं,

"सतिया कौं फाटक सै दूर रखौ, कोई अइबे जइबे बाले सै छुइ गई तौ? /सतिया को फाटक से अलग रखो। किसी आने जाने वाले से छू गई तो?/"

इसीलिये कमलिया सतिया को अपनी जगह से हिलने पर ही डाँट देती थी और वह अपनी जगह बैठकर कभी भैंस-गाय को और कभी दरवाज़े की ओर टुकुर टकुर देखा करती थी, परंतु मोहित के दरवाज़े पर आकर खड़े हो जाने पर वह डांटे जाने पर कुछ देर रुककर फिर उसकी ओर चल देती थी। फिर माँ की डांट सुनकर कुछ देर को वह अपनी जगह बैठ जाती थी, परंतु माँ के अपने काम में व्यस्त होते ही पुनः अपने स्थान से खिसकने लगती थी। कमलिया परेशान होकर कभी-कभी सतिया को पीठ में घूंसा मार देती थी, तब सतिया गुस्से में गाल फुलाकर अपने स्थान पर बैठ जाती थी और आँखों में आये आँसुओं को रोकते हुए दरवाज़े पर खड़े मोहित को एकटक देखती रहती थी।

 

सतिया के आकर्षक गोल मटोल बदन और उसके हाव भाव देखकर मोहित के बालमन में सतिया की निकटता की लालसा होती थी और उसके पिट जाने पर उसको बड़ा बुरा लगता था, परंतु ‘अच्छा बच्चा बने रहने’ की मानसिक विवशता के कारण उसने माँ की वर्जना को स्वीकार कर लिया था और अपनी लालसा को मन में ही दबाये रखता था।



समय बीतता जा रहा था और उसके साथ सतिया बढ़ रही थी- अब वह ठुमक ठुमक कर अपने पैरों पर चलने लगी थी। उस दिन कमलिया हवेली के सहन में नई ब्यायी हुई गाय और उसके बछड़े को खिलाने पिलाने के काम में व्यस्त थी और उसका ध्यान सतिया पर से हट गया था। सतिया नये बछड़े को देखकर मुदित थी और वह उठकर गाय का दूध पीते बछड़े की ओर चल दी। गाय ने अपने बच्चे की रक्षा हेतु सतिया पर अपने सींग तान लिये परंतु अबोध बालिका गाय की ओर चलती रही। मोहित अपने दरवाज़े से यह दृश्य देख रहा था और सतिया को ख़तरे में देखकर बिना कुछ सोचे दौड़ पड़ा था और उसे अपनी गोद में उठाकर गाय से दूर ले चला था। तभी मोहित की माँ का क्रोधित स्वर सुनाई दिया था,

"कमलिया! का अंधी हुइ गई है ससुरी? सूझत नाईं है? सतिया कौं मोहित सै दूर काँयें नाईं रक्खत है? अब जा ठंड मैं बाय हनबान परययै। /कमलिया! क्या अंधी हो गई है ससुरी? क्या दिखाई नहीं देता है? सतिया को मोहित से दूर नहीं रखती है। अब इस ठंड में उसे नहलाना पड़ेगा।/"

यह कहते हुए मोहित की माँ ने दौड़कर मोहित को झापड़ रसीद किया और उसके कपड़े उतारने लगीं। यह जानते हुए भी कि इसमें उसका अपना कोई दोष नहीं है, कमलिया इस सब के लिये अपने को दोषी सिद्ध करने का प्रयत्न करने लगी थी और अपने मन की भड़ास निकालने के लिये वह सतिया की धुनाई करने लगी थी- वह इस ग्रामीण कहावत को चरितार्थ कर रही थी- ‘धोबी पर बस न चले तो गदहिया के कान उमेठे’। सतिया चीख़कर रो उठी थी; उसकी समझ में नहीं आ रहा था कि उसने क्या ग़लती की है और उसकी पिटाई क्यों हुई है। पर पता नहीं उस नन्हीं बालिका के मन में उसके प्रति अन्यायपूर्ण व्यवहार की कैसी प्रतिक्रिया हुई कि वह उठकर मोहित की ओर चल दी थी और उसने अपनी नन्हीं हथेलियों से न केवल मोहित का नंगा बदन छू लिया था वरन् उसकी माँ की टाँग भी दूसरे हाथ से कसकर पकड़ ली थी। मोहित की माँ ने तब खीझते हुए उसे झटके से हटा दिया था।



मानव स्वभाव है कि शरीर पर लगने वाली चोट का दर्द उसे तब तक सालता है जब तक वह चोट ठीक नहीं हो जाती है, चोट ठीक हो जाने के पश्चात वह केवल ऐसे याद आती है जैसे कोई अन्य अनुभव याद आता है; परंतु मानव के अहम् को लगी चोट मन में नासूर बन जाती है और नासूर के रिसने की तरह जब भी याद आती है सालती है। कमलिया को हल्ला से बचा न पाने की अपनी अक्षमता से पस्सराम के मन को ऐसी ही चोट लगी थी। वह उस चोट से तो उद्वेलित रहता ही था, साथ ही साथ उसमें सतिया के अपनी संतान न होने की गाँठ भी बैठ गई थी जो क्रोध अथवा क्षोभ का अवसर आने पर अनायास निकल पड़ती थी। सतिया अब चार साल की हो गई थी और घर के छोटे मोटे कामों में माँ-बाप की सहायता करने लगी थी। एक शाम उसका पिता जब खलिहान से थका हारा घर में घुसा था तो वहाँ कमलिया को न देखकर सतिया से एक लोटा पानी लाने को कह दिया था। सतिया जब पानी भरा लोटा लाकर पिता को दे रही थी तो उसके हाथ से पानी का लोटा पस्सराम के पैर पर गिर पड़ा था और अनायास उसने सतिया को थप्पड़ मारते हुए गाली दी थी,दोगली कहीं की।"

सतिया उस शब्द का अर्थ तो नहीं समझी थी परंतु यह समझ गई थी कि उसके लिये अपमानजनक शब्द कहा गया है। वह रोते हुए अम्मा, जो झोपड़ी के बाहर बर्तन माँज रहीं थीं, की ओर भागी थी। कमलिया को प्रतिदिन पस्सराम के इस तरह के व्यंग्यवाण सुनने पड़ते थे, जिनका उसके मन में भी एक नासूर बन गया था जो कुरेदे जाते ही रिसने लगता था। अतः सांत्वना की आशा में माँ के पास आने पर कमलिया ने सतिया को पुचकारने के बजाय अपने नपुंसक आवेश में झिड़क दिया था,

"हट अभागिन"

सतिया पहले भी अपने लिये माँ द्वारा क्रोध में ‘अभागिन’ शब्द का प्रयोग सुन चुकी थी और उसका भावार्थ समझने लगी थी। माँ और बाप दोनों द्वारा दुत्कार दिये जाने पर सतिया का रोना अचानक बंद हो गया और उसकी आँख के आँसू तिरोहित हो गये थे। उसके मन में घोर विद्रोह उमड़ पड़ा था और क्रोध के आवेश में उसके फूले चेहरे से रक्त फटकर बाहर आने को होने लगा था। फिर अपने पर नियंत्रण खोकर वह दौड़कर अपने पिता की टाँग से लिपट गई थी और दांतों से काटने लगी थी। पस्सराम ने उसके बाल पकड़कर खींचते हुए उसे अपने से अलग झटक दिया था।

उसके पश्चात सतिया न तो माँ के पास गई और न पिता के पास- बस देर तक सिसकती रही थी ।

- क्रमशः


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