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ISSN 2292-9754

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12.25.2015


भीगे पंख
मोहित और सतिया /दो/

 लालजी शर्मा गुस्सैल स्वभाव के थे और घर वालों, गाँववालों, घर में पलने वाले जानवरों, ओर गली में भैांकने वाले कुत्तों तक को दिन में दस-पाँच बार गालियाँ सुना देना उनके लिये साधारण बात थी; परंतु उनकी धारणा थी कि वह राम के बड़े भक्त हैं- गर्मियों के दिनों में कुएँ से निकलने वाले ठंडे पानी और जाड़ों में उसी कुएँ से निकले गर्म पानी से घर्षण स्नान करने के उपरांत वह प्रतिदिन तख़्त पर पालथी मारकर विराजमान हो जाते थे और लकड़ी के बने ‘गुणा के लिये प्रयुक्त चिन्ह’ के आकार के आसन पर तुलसीकृत रामचरितमानस रखकर देर तक उसका ज़ोर-शोर से पाठ करने के उपरांत ही दोपहर का भोजन करते थे। यद्यपि वह प्रायः यह गाते हुए सुने जाते थे कि ‘ना जाने किस वेश में नारायण मिल जांय’, परंतु व्यवहारकि रूप में उन्हें प्रत्येक गेरुआ वस्त्रधारी व्यक्ति ही नारायण का प्रतिरूप लगता था। गाँव से गुज़रने वाले गेरुआ वस्त्रधारी हर व्यक्ति को भोजन कराना, ठहराना, उसकी सेवा करना और दान-दक्षिणा देने के उपरांत ही विदा करना उनके स्वभाव की विवशता थी। यह अलग बात थी कि ऐरे गैरे साधुओं का समय-बेसमय खाने-पीने का प्रबंध करने में घर की बहू को जो कष्ट होता था, उसके प्रति वह शत-प्रतिशत सम्वेदनहीन थे। उनके रामचरितमानस के पाठ के दौरान यदि कोई लू से त्रस्त कुत्ता उनके तख्त के नीचे आकर अपने हाँफ़ने अथवा अपनी कूं कूं से उनके पाठ में व्यवधान उत्पन्न करने लगता था तो उनका रामचरितमानस के पाठ से अधिक समय उसे माँ-बहिन की गाली देने में बीत जाता था।

"सारे बेईमान कहूँ के। भगवान चहिययैं तौ जाई जलम मैं कीरा परिययैं।...... /साले बेईमान कहीं के। ईश्वर चाहेगा तो इसी जन्म में कीड़े पडे़ंगे।...... "

लालजी शर्मा ने अपनी बैठक, जो उनके परबाबा द्वारा बनवाये चार कंगूरों वाले कुएँ के बगल में स्थित थी, के बाहर पड़े हुए तख़्त पर बैठे हुए कुछ इस प्रकार कही थी कि कुएँ के उस पार अपनी बैठक में बैठे हुए हल्ला कुछ-कुछ सुन तो लें, परंतु फिर भी संशयग्रस्त रह जांय कि बात उनके लिये कही गई है अथवा किसी और के लिये। कुएँ पर धर्माई नाई जांघिया पहिन कर नहा रहा था और पुत्तू कहार की पत्नी घूंघट निकाले हुए गरारी पर चढ़ी हुई रस्सी से पानी भरा कलसा खींच रही थी। वह कभी-कभी आँख उठाकर धर्माई के उघारे बदन को देख लेती थी और चोरी छिपे धर्माई भी रस्सी खींचते समय उसके वक्षों के उठने-गिरने को देख लेता था। लज्जाराम की बात सुनने के समय दोनों के मुख पर विद्रूप की हल्की सी स्मित-रेखा उभरी थी, जिसे हल्ला ने अपनी बैठक में बैठे ही भांप लिया था। उनके चेहरे की व्यंग्यात्मक मुस्कराहट से हल्ला निःशंक समझ गये थे कि लालजी शर्मा ने उनके ऊपर ही कोई छींटाकशी की है। उनका मुँह तमतमा गया था, परंतु उस समय वह चुपचाप उठकर घर के अंदर चले गये थे। उन्हें उठकर जाते हुए देखकर लालजी शर्मा इसे अपनी विजय समझकर एक विद्रूप हास्य के साथ बोले थे,

"सारो अब कैसो मुँह छिपाय कें घर मैं घुसो जात है? /साला अब कैसे मुँह छिपा के घर में घुसा जाता हैं?/"

मुकदमा लड़ना ज़मींदारों का पुराना शौक था। प्रायः ज़मींदार खानदान में जन्म लेने वाले पुरुषों को वयस्क होते-होते इसकी लत लग जाती थी और इसमें उन्हें वही आनंद आने लगता था जो नशेड़ची को नशा करने में आता है। हल्ला और लालजी शर्मा को भी इसकी लत लग गई थी और उनके बीच कोई न कोई मुकदमा चलता ही रहता था। झाबर/खेती की नीची जगह जहाँ पानी जल्दी भरता है/ की ज़मीन की मिल्कियत के बारे में हल्ला और लालजी शर्मा के बीच सालों से मुकदमा चल रहा था। इस मुकदमे के लड़ने में दोनों को अनेक कष्ट उठाने पड़ते थे क्योंकि उनके गाँव से रेलवे स्टेशन सात मील की दूरी पर था और कचहरी जाने के लिये गाड़ी प्रातः पौने आठ बजे मिलती थी, अतः समय से स्टेशन पहुँचने के लिये अँधेरे मुँह बैलगाड़ी से अथवा पैदल चल देना पड़ता था और लौटने में फिर देर रात हो जाती थी। उन दिनों अन्य कोई सवारी हेतु सड़क ही नहीं बनी थी और अँधेरे में ऊबड़खाबड़ रास्ते पर सायकिल चलाना बहुत कठिन था। फिर भी मुकदमे की तारीख पड़ने पर दोनों ऐसे चल देते थे जैसे अपनी बारात में जा रहे हों।

दीवानी के मुकदमे इतने लम्बे खिंचते हैं कि उनके बारे में कहावत है कि ‘दीवानी वह करे जो दीवाना हो’ और यह मुकदमा भी कई वर्ष तक खिंचा था। सभी गवाहों की गवाही दर्ज नहीं हो पा रही थी और किसी न किसी कारण से तारीख पर तारीख पड़ती जाती थी। पैसा भी पानी की तरह बह रहा था परंतु मुकदमा जीतना दोनों ने अपनी प्रतिष्ठा का प्रश्न बना लिया था। तभी मुकदमे की एक तारीख के एक दिन पहले हल्ला ने लालजी शर्मा के एक विश्वासपात्र से कह दिया कि तारीख बढ़ गई है और उस व्यक्ति ने इस बात को सच मानकर लालजी शर्मा तक पहुँचा दिया। इस कारण लालजी शर्मा के गवाह तारीख पर कचहरी नहीं गये। उधर हल्ला ने मजिस्ट्रेट साहब को भी खासी रकम देकर पटा लिया था, जिससे उन्होंने मुकदमे में एकतरफ़ा निर्णय हल्ला के पक्ष में कर दिया। फैसले के बाद जब लज्जाराम को पता चला कि हल्ला ने चाल खेलकर मुकदमा जीत लिया है तो उसकी प्रतिक्रियास्वरूप वह हल्ला के विरुद्ध बकझक कर रहे थे और उन्हें कोस रहे थे।

पस्सराम की झोपड़ी हल्ला की बैठक और लालजी शर्मा की बैठक के बीच में थी और हल्ला का अनुमान था कि पस्सराम ने लज्जाराम की गाली-गलौज वहाँ पर स्पष्ट सुनी होगी। इसलिये घर में घुसते ही उन्होंने उसे पुकारा,

‘पस्सा........... पस्सा......... "

पस्सराम समझ गया कि उसे किसलिये पुकारा जा रहा है और वह अपने को दो ज़मींदारों के झगड़े से बचाने हेतु खिसकना चाहता था कि हल्ला फिर दहाड़े,

"पस्सा सारे कहाँ मरिययो है- का जूता खाओ चाँहत है? /पस्सा, साले कहाँ मर गया है? क्या जूता खाना चाहता है?/"

हल्ला की क्रोध भरी धमकी सुनकर पस्सराम का साहस जवाब दे गया और वह सूखा सा मुँह लेकर हल्ला के मकान की सहन में जाकर खड़ा हो गया।

हल्ला का क्रोघ उफान पर था और वह वैसे ही अपने क्रोघ पर नियंत्रण करने का प्रयत्न कर रहे थे जैसे उबलते हुए दूध पर कोई पानी के छींटे मारे। दूध का उफान कुछ थमने पर बोले,

"लालजी का बकत हते? /लालजी क्या बक रहे थे?/"

पस्सराम चुप्प। उसकी चुप्पी से हल्ला का क्रोध फिर बेकाबू होने लगा और वह अपना जूता निकालने लगे। पस्सराम उनके जूते उतारने की मंशा समझकर तुरंत बोल पड़ा,

"मालिक! बे कहत हते ‘सारे बेईमान कहूँ के............सारिन के जाई जलम मै कीरा परिययैं...........सारो कैसो मुँह चुराय कें घर मै घुसो जात है?"

हल्ला क्रोध से काँपने लगे, परंतु अपना क्रोघ पीते हुए धीरे से बोले,

"अच्छा हम देखत हैं किनकें कीरा परत हैं। जाउ, बिजयीनगरा के सतबीरसिंह यादव सै कहिकें लठैत बुलाय लाउ। कहि दीजौ कि हल्ला ने कही है खूब इनाम मिलययै और पुलिस-कचहरी को सब खच्च हम उठययैं। / अच्छा मैं देखता हूँ कि किसके कीड़े पड़ते हैं। जाओ, बिजयीनगला के सतबीरसिंह यादव से कहके लाठी चलाने वाले बुला लाओ। कह देना कि हल्ला ने कहा है कि खूब इनाम मिलेगा और पुलिस कचहरी का खर्च भी हम ही उठायेंगे।/"

बिजयीनगरा के अहीर नामी लठैत थे और किराये पर लाठियाँ चलाते थे। पस्सराम के चलते चलते हल्ला ने हिदायत की कि मानिकपुर में किसी को इस बात की कानोंकान खबर नहीं होनी चाहिये।

मानिकपुर गाँव के लोगों में एक विशेषता गाँव के बसने के समय से ही रही थी कि उन्हें अपने गाँव की इज्ज़त बहुत प्यारी थी। आपस में वे चाहे कितना भी लड़ें, परंतु बाहर वालों के किसी भी आक्रमण को वे अपने गाँव की इज्ज़त पर हमला समझते थे। अतः बाहर से आये लठैतों एवं बदमाशों का उन्होंने सदैव एकजुट होकर मुकाबिला किया था। इस कारण मानिकपुर वालों को आज तक न तो कोई बाहरी लोग परास्त कर सके थे और न आज तक इस गाँव में चोर-डकैतों ने लूट-पाट करने की हिम्मत की थी। मानिकपुर गाँव के लोग अपने गाँव की इस विषेशता को प्रायः गर्व से बखानते भी थे। आज पस्सराम हल्ला के आतंकवश कुछ ना-नुकुर तो नहीं कर सका और लठैत बुलाने चल दिया, परंतु वह मन ही मन मना रहा था कि किसी तरह गाँव वालों को बाहरी लठैत बुलाये जाने की खबर हो जाय। तभी लालजी शर्मा के यहाँ बचपन से काम करने वाले टुड़ई कक्का सामने पड़ गये और उन्होंने पूछ लिया,

"पस्सराम कहाँ जात हौ? /पस्सराम कहाँ जा रहे हो?/"

"विजयीनगरा लठैत बुलान जाय रहे हैं," पस्सराम धीरे से बोला।

आश्चर्य से टुड़ई का मुँह खुला का खुला रह गया, "साँचेऊँ? /सच?/"

"और का मालिक बहुत गुस्सां में हैं। /और क्या ? मालिक बहुत गुस्सा में हैं।/"

यह कहते हुए पस्सराम ने हल्ला के क्रोध का कारण भी बता दिया और जोड़ा,

"अब जा गाँव की लाज तुम्हायेई हाथन मैं है। /अब इस गाँव की लाज तुम्हारे ही हाथ में है।/"

शाम को जब तक विजयीनगरा के लठैत मानिकपुर आ पाये, तब तक मानिकपुर वाले उनका ‘स्वागत’ करने को चुपचाप एकजुट हो चुके थे और उन्होंने अपने गाँव की आन बचाते हुए बाहर के लठैतों को पीट-पीट कर पस्त कर दिया। गाँव के चौकीदार ने पुलिस को खबर कर दी। दरोगा जी के आने पर हल्ला ने विजयीनगरा के अहीरों की चोटें दिखाते हुए लालजी शर्मा की पार्टी के लोगों पर दोष मढ़ना चाहा, परंतु थानेदार को चौकीदार ने पहले ही बता दिया था कि हल्ला ने लालजी शर्मा को पिटवाने को बाहरी लठैत बुलाये थे। अतः वह घुड़ककर अर्थपूर्ण अंदाज़ में बोला,

"पर लठैत बुलाये किसने थे?"

हल्ला को अविलम्ब उसकी घुड़की का अर्थ समझ में आ गया था और उन्होंने थानेदार को चुपचाप एक तरफ़ बुला लिया था और मामले को रफ़ा दफ़ा करने की अनुनय करने लगे थे। थानेदार ने उनसे पूरे दो सौ रुपये वसूल किये थे और तब थाने जाकर ग़ैर दस्तांदाज़ी अपराध की रिपोर्ट दर्ज कर प्रकरण समाप्त कर दिया था।

हल्ला ज़ख़्मी शेर की तरह रात भर सोचते रहे थे कि किसने लठैतों को बुलाने की खबर गाँव वालों को दी होगी। फिर वह इस नतीजे पर पहुँचे कि बिना पस्सराम के बताये मानिकपुर वाले बाहरी लठैतों को बुलाये जाने की बात जान ही नहीं सकते थे। अतः सबेरा होते ही उन्होंने पस्सराम को बुलाया था। वह पहले से ही घबराया हुआ था क्योंकि वह भी समझ रहा था कि गाँव वालों में बात फैल जाने के लिये हल्ला उसी को दोषी मान रहे होंगे और वह उसके द्वारा की गई अवज्ञा कतई बरदाश्त नहीं करेंगे। उसने रात में अपना भय कमलिया को भी बता दिया था, अतः वह भी सतिया को साथ में लेकर पस्सराम के पीछे पीछे चली गई थी। हल्ला ने पस्सराम को देखते ही कहा,

"बोल सारे तूने किनै बताओ हतो? /बोल साले, तूने किसे बताया था?/"

पस्सराम को काटो तो खून नहीं। वह मौन खड़ा था क्योंकि वह जानता था कि अपराध को झुठलाने अथवा उसकी संस्वीकृति करने में से किसी विकल्प से उसकी पिटाई कम नहीं होगी, वरन् बढ़ ही सकती है। अतः वह चुप रहा था। उसकी चुप्पी पर हल्ला का क्रोध अनियंत्रित हो गया और उन्होंनें जूता उठाकर पस्सराम पर जड़ापड़ प्रहार करना प्रारम्भ कर दिया था। कमलिया हाथ जोड़कर उनसे क्षमा की भीख माँगने लगी, परंतु हल्ला ने पस्सराम को तब तक नहीं छोड़ा था जब तक सतिया ने दौड़कर उनकी टाँग अपनी नन्हीं हथेलियों में पकड़ कर उसमें अपने दाँत नहीं गड़ा दिये थे। तब हल्ला को भान हुआ कि एक अछूत ने उनकी टाँग पकड़ रखी है और उन्होंने सतिया को ज़ोर से झटक दिया था। उनकी पहलवानी वाली मज़बूत टाँग से छिटक कर सतिया दूर जाकर गिरी थी और वह बेहोश हो गई थी। उसके सर से लहू बह रहा था। कमलिया ने दौड़कर सतिया को उठाया, अपनी झोपड़ी पर आकर उसका खून से लथपथ चेहरा धोया और मूर्छित सतिया को अपनी गोद में लेकर सिसकती रही थी। हर उच्छवास के साथ वह अपनी किस्मत को कोसती जाती थी जिसने उसे भंगी के घर में पैदा किया था, जिसने उसे निर्धन और पराश्रित बनाया था, और जो उसे हल्ला की चाकरी हेतु यहाँ ले आई थी।

इस संसार में जन्म लेने वाला हर मनुष्य जन्म के समय ही कतिपय प्रकृतिप्रदत्त गुणों में दूसरों से भिन्न होता है क्योंकि गर्भाधान के समय जब पुरुष और स्त्री के जीन्स का मिलन होता है तो उनमें अवस्थित डी.एन.ए. की शृंखलायें एक दूसरे में समाहित होते समय मिलन की अपरिमित सम्भावनायें प्रस्तुत करतीं है जिनमें किसी एक सम्भावना के अनुसार दोनों के डी.एन.ए. मिलते है और तदनुसार उस मनुष्य के शारीरिक और मानसिक गुणों का प्रादुर्भाव होता है। सतिया अपनी माँ और बाप /पस्सराम/ से इन गुणों में भिन्न थी, और सम्भव है कि वह हल्ला की ही पुत्री हो क्योंकि उसमें उनके जैसे चालाकी, दम्भ, उग्रता एवं प्रतिशोध के गुण विद्यमान थे। उसके मन में जन्म से ही ‘आई. एम. ओ.के. : यू आर. नॉट ओ.के.’ की मनःस्थिति पनप रही थी। मूर्छा समाप्त होने पर यद्यपि सतिया की आँखों में भी अश्रु उमड़े थे, परंतु वे अश्रु दैन्य के न होकर घृणा, क्षोभ और प्रतिशोध के अश्रु थे। उस दिन के बाद सतिया सात दिन तक ज्वरग्रस्त रही। ज्वर की अवस्था में वह प्रायः एक ही स्वप्न देखा करती थी कि उसके आदेश पर उसके अनुचर हल्ला को जूता से पीटते हुए एक अग्निकुंड में ढकेल देते हैं और हल्ला माफ़ किये जाने की दुहाई देते हुए अनंत गहराई वाली अग्नि में गिरते जाते हैं। ऐसा स्वप्न देखते हुए वह कभी-कभी बड़बड़ाने लगती थी,

"मार सारे कौं..................हड्डी पसरी एक कर देउ........ मार जूता सै.... /मार साले को.................हड्डी पसली एक कर दो..............मारो जूता से।/"

लिया और पस्सराम उसकी बड़बड़ाहट सुनकर घबरा जाते थे और उसे जगाकर पूछने लगते थे कि क्या बात है, परंतु तभी सतिया चुप हो जाती थी और उसके चेहरे पर संतोषपूर्ण स्मित की एक आभा झलकने लगती थी।

सात दिन बाद जब सतिया ठीक हुई, तो कमलिया ने उसमें एक नवीन परिवर्तन होना पाया। उसके बाद से वह अपने पिता का विशेष ध्यान रखने लगी और उसके फलस्वरूप पिता के मन में भी उसके प्रति अपना बीज न होने की शंकाजनित वितृष्णा कम होने लगी। सतिया को हल्ला के प्रति जितनी घृणा उत्पन्न हुई थी, उसी अनुपात में उसका अपने पिता के प्रति प्रेम बढ़ने लगा था।

जिस दिन विजयीनगला के लठैत आये थे और लाठियाँ चलीं थी, मोहित गाँव में ही था और उसने अपने अट्टे से वह हृदयविदारक दृश्य देखा था; लाठियों से एक दूसरे का सिर फोड़ते देखकर उसके मन में दुख एवं भय उत्पन्न हुआ था। उसने दूसरे दिन पस्सराम को जूतों से पिटते और सतिया को झटककर फेंके जाते भी देखा था। पस्सराम को पिटते देखकर उसके मन में क्रोध उत्पन्न हुआ था और सतिया को फेंके जाते देखकर दुख से उसकी आँखों से अविरल अश्रुप्रवाह होने लगा था, परंतु उसका क्रोध व दुख उसे किसी प्रकार का प्रतिरोध प्रदर्शित करने के लिये पर्याप्त प्रेरणा न दे सके थे क्योंकि वह इन्हें बड़े लोगों का मसला समझता था, जिनमें टाँग अड़ाना वह बड़ों की अवज्ञा समझता था। अपने को आज्ञाकारी बालक सिद्ध करने के इस प्रयत्न में उसे स्वमन में उत्पन्न विरोधाभासों एवं उद्वेगों को दबाना पड़ता था जिसके कारण वह अनावश्यक तनावों से घिरा रहता था। ये तनाव उसके स्वच्छ एवं सम्वेदनशील मन में ग्लानिभाव एवं हीनभाव उत्पन्न करते थे।



- क्रमशः


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