अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली
ISSN 2292-9754

मुख पृष्ठ
06.07.2017


भीगे पंख
मोहित और सतिया /दो/-2

  सतिया के माता-पिता सतिया और विमलसिंह के सम्बंधो के विषय में सब जान गये थे परंतु परिस्थितिवश और सतिया के स्वभाव का ध्यान कर उन्होंने अपने आँख व कान बंद कर रखे थे। विमलसिंह के कारण ही उन्हें दिल्ली जैसे महानगर में सहारा मिला था और उनकी आर्थिक एवं सामाजिक स्थिति में सुधार भी हो रहा था। विमलसिंह की पार्टी फल-फूल रही थी और उसको इतना चंदा मिलने लगा था कि संगठन के विस्तार के साथ-साथ स्वयं के छोटे-मोटे सुख साधनों की आपूर्ति भी आसानी से हो जाती थी। वह सतिया के परिवार की आर्थिक सहायता भी और अधिक करने लगा था। अब सतिया की रातें अबाध ढंग से विमलसिंह के कमरे में ही बीतती थीं। सतिया की माँ ने सतिया से एक आध बार दबी ज़बान से कहा भी था,

"तुम और विमलसिंह ब्याह काँयें नाईं कर लेत हौ?/तुम और विमलसिंह विवाह क्यों नहीं कर लेते हो?"

पर सतिया ने प्रश्न को हवा में उड़ा दिया था और उसका उत्तर देना भी आवश्यक नहीं समझा था। सतिया की मनःस्थिति, उसके जीवन के कटु अनुभवों एवं विमलसिंह के सान्निध्य ने उसे सामाजिक मान्यताओं के बंधन से इतर स्तर पर पहुँचा दिया था। माँ के प्रश्न पर उसकी चुप्पी में ही उसका उत्तर निहित था ओर उसकी माँ यह जान भी गईं थीं। उस उत्तर को स्वीकार करने के अतिरिक्त उनके पास कोई विकल्प नहीं था। लाज, हिचक, एवं समझौता सतिया के व्यक्तित्व से परे हो चुके थे- वह अपनी मान्यताओं, अपनी इच्छाओं, अपनी लालसाओं के लिये किसी भी सामाजिक अथवा नैतिक नियम को ताक पर रख सकती थी, एवं अपने प्रतिशोध हेतु सारे समाज को तहस-नहस कर सकती थी।

उसके आमंत्रण पर मोहित अभी तक नहीं आया था, इससे उसका अंतर्मन आहत हो रहा था और वह उतना ही अधिक विष-वमन कर रही थी।



मोहित को प्रायः सतिया की घनी कमानीदार भौंहों के मध्य स्थित उसके बड़े-बड़े नेत्रों की झील सी वह गहराई याद आती रहती थी, जो उसने उसके द्वारा घर आने का आमंत्रण देते समय देखी थी और प्रायः रात्रि के एकांत में मोहित उस गहराई में खो जाने को उतावला हो जाता था और निश्चय करता था कि कल वह अवश्य सतिया के घर जायेगा, परंतु सबेरा होते होते उसके अनिश्चय उस पर हावी हो जाते थे। जाने का अवसर आते ही उसे एक अनजान भय सताने लगता था कि पता नहीं वहाँ पहुँचने पर क्या अनहोनी घटित हो जाये। उसे लगता कि यदि उसके पहुँचने पर विमलसिंह वहाँ उपस्थित मिला तो कहीं उसकी अपमानजनक एवं हिंसात्मक प्रतिक्रिया न हो? और यदि वह उपस्थित नहीं मिला और सतिया अकेली मिल गई तो क्या वह स्वयं को यौवन-मदमाती सतिया के साथ एकांत के क्षणों में सामान्य रख पायेगा? किसी भी युवती के साथ का एकांत उसने केवल कल्पना में भोगा था, कभी भी यथार्थ में नहीं।

इस ऊहापोह में दिन बीतते गये और शरत, शिशिर एवं हेमंत व्यतीत हो गये और वसंत आ गया। वसंत ऋतु के अपने यौवन पर आते ही इम्तिहानी हवायें चलने लगीं थीं। ये हवायें विद्यार्थियों के लिये परीक्षा की सन्निकटता का संदेश लेकर आतीं हैं और उनके मन में पढ़ाई पूरी न कर पाने की छटपटाहट एवं परीक्षा का भय उत्पन्न कर उनकी उद्विगनता बढ़ा देतीं हैं। इन हवाओं की ठंडक सूर्य की किरणों की कुनकुनाती गर्मी में लिपटी रहती है जो युवाओं के तन और मन को स्पर्श कर उनमें प्रमाद का प्रवाह भी करती है एवं उनकी विपरीतलिंगी मिलन की इच्छा को प्रबल कर देती है। होली का त्योहार इसके लिये अग्नि में घृत का काम करता है।

बीती रात मोहित देर से सोने गया था- गणित के प्रश्नों में उलझ जाने के कारण उसे समय का पता ही नहीं चला था। होली की छुट्टियाँ होने के कारण उसने शीघ्र सोने का यत्न भी नहीं किया था। फिर सोने का समय निकल जाने के कारण नींद बिल्कुल उचट गई थी और बिस्तर पर लेटे हुए मोहित दिवा स्वप्न देखता रहा था। उसे घूम-फिरकर उस होली की याद बार-बार आती रही जब वह भरतपुर में नवीं कक्षा का छात्र था और होली की छुट्टी में गाँव गया हुआ था। गाँव की गली में सतिया सामने आ पड़ी थी। सतिया देर तक मुस्कराते हुए मोहित के होंठों पर उभरती मूँछों की रेख को एकटक निहारती रही थी और फिर निर्भीक बोल पड़ी थी,

"मोहित! अब की बार मैं भी खेलूँगी होली तुम्हारे साथ।"

मोहित उसके साहस पर आश्चर्यचकित था और अवाक होकर उसे देखते हुए बस इतना बोल पाया था,

"किसी ने देख लिया तो?" परंतु सतिया के आमंत्रण भरे नयनों में निहारकर उसकी सतिया के संग रंग में सराबोर होने की आकांक्षा उद्वेलित हो गई थी।

फिर होली वाले दिन एकांत देखकर सतिया मोहित की हवेली के फाटक के निकट स्थित एक कोने में आकर खड़ी हो गई थी- एक फटा पुराना फ़्राक पहिने हुए जिसके छिद्रों से उसके छोटे-छोटे गोल-गोल वक्ष यहाँ वहाँ झाँकते से दिखाई पड़ जाते थे। मोहित ने उसे देखकर अपनी पिचकारी में लाल रंग भरकर इधर-उधर देखकर चोरी से पूरी पिचकारी उसके वक्षस्थल पर चला दी थी। फ़्राक का झीना कपड़ा सतिया के बदन पर चिपक गया था और उसमें उसके कटिप्रदेश और जंघायें भी झाँकने लगीं थीं, जिन्हें सीधे देखने का साहस मोहित नहीं जुटा पा रहा था। सतिया उसे रंग लगाने को आगे बढ़ी थी कि मोहित की माँ की आवाज़ सुनाई दी थी और वह ठिठक गई थी। मोहित की माँ को सतिया के हाव-भाव अटपटे लगे थे और उन्होंने डाँटते हुए कहा था,

"सतिया, अपने लोगों में जाकर होली खेल।"

यह सुनकर सतिया का चेहरा तमतमा गया था और वह गर्दन झुकाये वहाँ से खिसक ली थी। मोहित भी लज्जावनत होकर वहाँ से चल दिया था परंतु वह कनखियों से सतिया के रंग से नहाये मांसल बदन को निहारने का लोभ संवर्ण नहीं कर सका था।

प्रातःकाल उठने पर भी मोहित के मन में रात्रि के स्वप्नों का ख़ुमार शेष था जो उसे सतिया की याद दिला रहा था। उसने सोचा कि सतिया ने उसे अपने यहाँ बुलाया तो था ही, और होली के अवसर पर मिलने की प्रथा भी है, तो क्यों न होली के बहाने मिल आया जाये? यदि वहाँ कमलसिंह उपस्थित भी हुआ और उसने मोहित के आगमन को संदेहपूर्ण निगाह से देखा, तो भी सतिया के माँ-बाप तो उसका हृदय से स्वागत करेंगे हीं। मन में द्वंद्व होते हुए भी वह साहस बटोरकर सिटी बस से चल पड़ा और मन में अनेक कल्पनायें सँजोये हुए अपरान्ह में सतिया के कमरे के दरवाज़े पर पहुँच गया। दरवाज़े की कुंडी अंदर से बंद थी। दरवाज़ा खटखटाने के पूर्व मोहित का हाथ एक बार ठिठका, परंतु फिर उसके हाथ ने दरवाज़े पर हल्की थाप देने का साहस जुटा ही लिया। कुछ पलों के विलम्ब से अंदर की कुंडी खटक की ध्वनि के साथ खुल गई और फिर रंग खेलने के उपरांत सद्यःस्नातः सतिया मोहित के सामने खड़ी थी- अपने गदराये बदन पर बासंती रंग की साड़ी लपेटे हुए। यद्यपि वक्ष साड़ी से ढके हुए थे परंतु मोहित को लगा कि वह ब्लाउज़ नहीं पहिने हुए है और वह घबराकर पीछे मुड़ने लगा कि सतिया प्रसन्नता के अतिरेक में मुस्कराकर बोली,

"अरे मोहित तुम हो! अंदर आ जाओ।"
मोहित के अंदर आ जाने पर सतिया ने दरवाज़े की कुंडी फिर अंदर से यह कहते हुए बंद कर दी थी कि दरवाज़ा अपने-आप खुल जाता है और बाहर से धूल आती है। फिर मोहित को चारपाई के सामने रखी कुर्सी पर बैठने का इशारा किया था। दरवाज़ा बंद कर देने पर पहले तो मोहित को लगा कि कमरे में पूर्ण अंधकार हो गया है क्योंकि पीछे की दीवाल की एकमात्र खिड़की परदे से भली-भाँति ढकी हुई थी, परंतु फिर आँखों के अभ्यस्त हो जाने पर उसे सब कुछ स्पष्ट दिखाई देने लगा था। कमरे में एक कुर्सी, एक छोटी सी मेज़ और एक चारपाई के अतिरिक्त एक बड़ा सा टीन का बक्सा रखा हुआ था। खूँटी पर सतिया के अंगवस्त्र टँगे हुए थे और एक आले में बाल काढ़ने हेतु शीशा और कंघा रखे हुए थे। टीन के बक्से के ऊपर दलित राजनीति की कुछ पुस्तकें और पत्रिकाएँ रखीं हुईं थीं। चारपाई पर नीले रंग की चादर बिछी हुई थी और नीले रंग का ही तकिया रखा हुआ था। मोहित सतिया के द्वारा दरवाज़ा बंद कर देने पर हतप्रभ हो गया था और कुर्सी पर बैठकर बगलें झाँकने लगा था, परंतु सतिया का उत्साह उसके हाव-भाव से स्पष्ट परिलक्षित हो रहा था और वह पूर्ण आत्मविश्वास के साथ उसके सामने चारपाई पर बैठ गई थी। उसने सचमुच ब्लाउज़ नहीं पहिन रखा था एवं उसके बदन पर साड़ी उसी तरह लिपटी हुई थी, जैसे कि उसके गाँव में अधिकतर स्त्रियाँ बिना ब्लाउज़ के साड़ी लपेटे रहतीं थीं। मोहित को सतिया के हिलने-डुलने पर साड़ी के यहाँ-वहाँ हट जाने पर बदन का कोई न कोई मांसल भाग दिख जाता था और उसके तन में सनसनी फैल जाती थी और मन में उतनी ही घबराहट पैदा हो जाती थी। अपनी घबराहट को नियंत्रित करने के उद्देश्य से मोहित ने सतिया से पूछा,

"अम्मा और बापू कहाँ हैं?"

सतिया ने होठों पर हल्की सी स्मित लाकर उत्तर दिया,

"होली का रंग खेलने के बाद वे तो काम पर निकल गये हैं और विमलसिंह एक होली मिलन में गये हुए हैं।"

यह सुनकर मोहित का तनाव और बढ़ने लगा, जिसे भाँपकर सतिया बोली,

"मोहित! क्या बात है? क्या अभी भी मुझे छूने में घबराते हो?"

मोहित यह सुनकर लज्जित हो गया क्योंकि उसे वह घटना याद आ गई जब एक रात्रि सूंड़ी का खेल खेलते हुए वह अपने को छिपाने के उद्देश्य से दौड़ते हुए अनायास सतिया की झोंपड़ी में घुस गया था, और अँधेरे में डरी हुई सतिया द्वारा उसे पकड़कर रोकने के प्रयास के बावजूद वह अपने को छुड़ाकर भाग गया था क्योंकि उसे डर था कि कोई उसका सतिया द्वारा छुआ जाना देख न लें। मोहित को बचपन में भी सतिया को छूने की वर्जना अनुचित लगती थी और कालांतर में तो मोहित ने विज्ञान पढ़कर वैज्ञानिक जीवन दर्शन भी अपना लिया था- आज वह एक मानवतावादी नास्तिक था। वह अपनी मान्यताओं में जाति-पाँति के साथ धर्म के बंधन से भी ऊपर उठ गया था। उसका विश्वास था कि ईश्वर की कल्पना चाहे समाज में अनुशासन, समरसता, एवं शांति लाने के उद्देश्य से की गई हो, परंतु उसका दुरुपयोग प्रायः स्वार्थ सिद्ध करने, भयजनित प्रभुत्व स्थापित करने, एवं अंधविश्वास उत्पन्न कर शोषण करने के उद्देश्य से किया जाता रहा है; और यह स्वार्थचक्र हिंदू, इस्लाम, ईसाई आदि सभी धर्मों में निरंतर घूमता रहा है। धर्म और आस्था प्रायः सामाजिक एवं राजनैतिक षडयंत्रों का अमोघ अस्त्र बनकर रह गये हैं। सतिया के प्रश्न के उत्तर में अपनी इन मान्यताओं को रखने की तीव्र अभिलाषा होते हुए भी मोहित के मुख से शब्द नहीं निकल रहे थे क्योंकि एक तो बंद कमरे में सतिया से एकांत-मिलन उसमे नियंत्रणविहीन उत्तेजना उत्पन्न कर रहा था और दूसरे उसे संकोच लग रहा था कि सतिया इसे आत्मश्लाघा न समझ बैठे। मोहित ने अपने जीवन में इससे पूर्व कभी भी किसी युवती की इतनी निकटता का ताप नहीं सहा था। सतिया का उन्मुक्त भाव एवं उच्छृंखल वक्ष उसकी जिह्वा को सुखाये दे रहे थे। उसकी चुप्पी को सतिया समझ रही थी और वह मंद-मंद मुस्करा रही थी। अपने कल्पनालोक के प्रेमी को अपने इतने निकट इस मनोदशा में पाकर उसका मन और उच्छृंखल हो रहा था। जोख़िम में आनंद लेने वाले अपने स्वभाव से प्रेरित होकर सतिया अचानक बोल पड़ी थी,

"अच्छा, अगर मैं तुम्हें अभी छू लूँ, तो पुनः पवित्र होने के लिये तुम नहाओगे तो नहीं?"- और यह कहने के साथ ही सतिया ने आगे झुककर मोहित का हाथ अपने हाथ में पकड़ लिया था। ऐसा करते समय उसकी धोती छाती पर से नीचे खिसक गई थी। सतिया की कोमल गर्म हथेली के स्पर्श एवं उसके मचलते वक्ष के उन्मुक्त दर्शन से मोहित के शरीर का रोम-रोम वीणा के कसे हुए तार सम खड़ा होकर झंकृत होने को मचल उठा था- उसके गुप्तांगों में असह्य तनाव उत्पन्न हो गया था। सतिया अपना अगला क़दम उठाने से पूर्व मोहित की आँखों में आँखें डालकर उसे सम्मोहित कर रही थी कि तभी बाहर साँकल खटखटाने की अनवरत ध्वनि होने लगी थी और उसे सुनकर मोहित इतना घबरा गया था कि साँकल की प्रत्येक खटखटाहट के साथ वह स्खलित होता रहा था।

मोहित को लगा कि सतिया साँकल की खटखटाहट के साथ मोहित का स्खलन भाँप गई थी और उसके होंठों की स्मित बढ़ गई थी। वह मोहित का हाथ छोड़ कर आराम से चारपाई से उठी थी और अपनी साड़ी ठीक कर उसने निःसंकोच दरवाज़ा खोल दिया था। अंदर मोहित को बैठा देखकर विमलसिंह का चेहरा तमतमा गया था। मोहित को आशंका हुई थी कि कहीं विमलसिंह उस पर अथवा सतिया पर आक्रमण न कर बैठे और उसका रक्षा तंत्र सक्रिय हो गया था कि तभी विमलसिंह बिना कुछ बोले उस कमरे से निकलकर दूसरे कमरे की ओर चला गया था। मोहित को लगा कि सतिया उसे स्पष्टीकरण देने हेतु उसके पीछे जायेगी ओर वह जाने हेतु अपनी कुर्सी से उठ खड़ा हुआ था, परंतु मोहित को आश्चर्य हुआ जब सतिया विमलसिंह के पीछे जाने के बजाय मोहित से बोली थी,

"मोहित, बैठो न। अभी तो कुछ बातें ही नहीं हुईं हैं।"

परंतु मोहित ऐसी असहज स्थिति में था कि "आज चलता हूँ, फिर कभी आऊँगा।" कहकर चुपचाप चल दिया था। विमलसिंह के वापस आ जाने के कारण सतिया ने भी उसे रोकने की ज़िद न की थी।



- क्रमशः


अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें