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ISSN 2292-9754

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04.19.2017


भीगे पंख
मोहित और सतिया /दो/-1

सतिया की मीटिंग में आज बड़ी भीड़ थी। वह अपने हृदय में भरा हुआ क्षोभ, प्रतिशोध एवं तद्जनित विष का वमन कर रही थी। उसकी उत्तेजक बात सुनकर भीड़ तालियाँ पीटने लगी थी एवं सतिया और जोश में भरकर बोलने लगी थी,

"मीटिंग में जो भी मनुवादी हों, वे उठकर चले जायें।.... अब बचे हुए दलित भाइयों-बहिनों से मुझे कहना है कि तुम्हारी लड़ाई इन्हीं ब्राह्मणवादियों से हैं। इन्हींने तुम्हें हज़ारों साल से अछूत बना रखा है और तुम्हारी माँओं बहिनों पर अत्याचार करते रहे हैं। अब तुम सबको हमारे साथ मिलकर इस ब्राह्मणवाद का नाश करना है। ब्राह्मणवादियों को उससे भी बुरे दिन दिखाने हैं जो इन्होंने तुम्हें और तुम्हारे पूर्वजों को दिखाये हैं। ये सरकारी नौकरियों में रिज़र्वेशन का विरोध करते हैं- हमें इनकी ऐसी हालत कर देनी है कि ये रिज़र्वेशन हमसे माँगें.......... आज तक इन्होंने हमें जूते की नोक पर रखा है, अगर हम संगठित हो जायें तो आगे से इन्हें जूते की नोक पर रखेंगे।"

तभी भीड़ से जोशपूर्ण आवाज़ आई, "हम ब्राह्मण-ठाकुर-बनियों को अवश्य जूते की ठोकर लगायेंगे।"

उसी समय भीड़ के दाहिने कोने में कुछ हलचल हुई और तड़ातड़ पथराव होने लगा। भीड़ तितर-बितर होने लगी तो सतिया का रुख और तीक्ष्ण हो गया था,

"भाइयों! इन बदमाशों की ईंट का जवाब पत्थर से दो। इन गुंडों से डरकर काम नहीं चलेगा- इनका डटकर मुकाबला करना होगा और इन गुंडों को नेस्तनाबूद करना होगा ......... "

सतिया का स्वर अफ़रातफ़री में खो रहा था क्योंकि अपनी प्राणरक्षा हेतु श्रोता इधर उधर भाग रहे थे। तभी एक पत्थर आकर सतिया के सिर में लगा और वह वहीं मूर्छित हो गई थी। तब तक पुलिस आ गई और उसने लाठियाँ भांजकर और कुछ लोगों को बंदी बनाकर स्थिति पर नियंत्रण कर लिया था। पुलिस ने सतिया को अपनी गाड़ी में लिटाकर अस्पताल पहुँचा दिया था।

दूसरे दिन दिल्ली के सभी समाचार पत्रों में यह घटना मुख पृष्ठ पर छपी थी। कई समाचार पत्रों में इस घटना पर सम्पादकीय भी छपे थे जिनमें कुछ ने घटना का कारण अनुसूचित जातियों के उत्थान के प्रयत्न के प्रति उच्चजातियों की असहनशीलता को बताया था और कुछ ने सतिया की असंस्कृत, उकसाने वाली एवं विषैली भाषा को घटना का कारण बताया था। इनमें से एक सम्पादकीय को मोहित अपने छात्रावास के कमरे में बैठा हुआ पढ़ रहा था,

"....जनतंत्र में सबको अपनी बात कहने का अधिकार है परंतु दूसरों को अपमानित करने और गालियाँ देने का अधिकार किसी का नहीं बनता है। कु. सतिया अब दलित राजनीति में जानी-मानी नेता बन गईं हैं, उन्हें अगड़ी जातियों के प्रति अपने आक्रोश को संयत भाषा में व्यक्त करना चाहिये। कहा जाता है कि कु. सतिया को स्वयं एवं उनके परिवार को उनके मूल निवास के ग्राम मानिकपुर में तरह-तरह की यातनायें झेलनीं पड़ीं थीं और उन्हें ग्राम से निर्वासित भी कर दिया गया था, परंतु इसके लिये भारत में निवास करने वाले अगड़ी जातियों के सभी व्यक्तियों को दोषी नहीं ठहराया जा सकता है और न उन्हें भरी जनसभा में अपमानित किया जाना उचित कहा जा सकता है। इस तरह के भाषण जातीय विद्वेष के जनक हैं और उन्हें रोका जाना समाज के हित में आवश्यक है । कु. सतिया को भविष्य में अगड़ी जातियों के विरुद्ध विषवमन करने से रोकने के लिये कठोर कानूनी कार्यवाही की जानी चाहिये। हो सकता है कि कु. सतिया इस प्रकार के उत्तेजक भाषण से तात्कालिक राजनैतिक लाभ प्राप्त कर लें, परंतु लम्बे समय में यह विषवमन न केवल समाज के लिये विध्वंसकारी साबित होगा, वरन् कु. सतिया के राजनैतिक भविष्य के लिये भी घातक सिद्ध होगा। कहावत है कि आसमान की ओर थूकोगे तो अपने मुँह पर ही आकर गिरेगा।"

ग्राम का नाम पढ़ते ही मोहित के मन और हृदय दोनों के तार झंकृत हो उठे थे; यद्यपि बात अपने में आश्चर्यचकित करने वाली थी परंतु उसे यह बात मानने का कोई कारण नहीं दिखाई दिया कि यह उसकी अपनी सतिया के अतिरिक्त कोई और सतिया हो सकती है। पर उसके मन में आश्चर्यमिश्रित आशंकाएँ अवश्य उठ रहीं थीं- क्या सतिया नेता बन गई है?.... कैसे वह गाँव से निकलकर दिल्ली पहुँची होगी?... कैसे उसने दलित राजनीति में प्रवेश किया होगा?.... और फिर कैसे वह भाषण देना सीखी होगी? मोहित की कुछ समझ में नहीं आ रहा था। पर मोहित का रोम-रोम सतिया के प्रति संवेदनाग्रस्त हो रहा थाः सतिया घायल है और अस्पताल में भर्ती है, उसे अवश्य ही काफ़ी चोट लगी होगी। सतिया का पता भी लगा तो इस हाल में? मोहित के नेत्रों में अश्रु छलछला आये थे। वह तुरंत तैयार होकर ऑटो लेकर अस्पताल को चल दिया। एक ओर इतने दिन बाद सतिया से मिलने की बात सोचकर उसका मन तरंगित हो रहा था तो दूसरी ओर वह घोर आशंका से ग्रस्त हो रहा था कि पता नहीं सतिया से किस हाल में मिलन होगा।

मोहित जब अस्पताल पहुँचा, तब वहाँ प्रतिदिन चलने वाली गहमागहमी पूरे जोश में प्रारम्भ हो गई थी- मरीज़ों और उनके साथ आने वालों की भीड़, सफ़ेद कपड़ों में दौड़ते से डॉक्टर, हरे कपड़ों में टहलते वार्ड ब्वाय, और सफ़ेद ड्रेस पर कसी बेल्ट बाँधे हुए नर्सें- हर ओर नज़र आ रहे थे। पूछताछ करके जब मोहित सतिया के वार्ड के बाहर पहुँचा, तो उस समय एक सीनियर डॉक्टर जिन्हें दस-बारह जूनियर डॉक्टर घेरे हुए थे, राउंड पर थे। अतः चपरासी ने मोहित को वार्ड के बाहर ही रोक दिया। मोहित के मन में अब एक असमंजस का भाव आने लगा कि सतिया अब उसके गाँव वाली सतिया तो रही नहीं है जो प्रत्येक अवसर पर उसका आश्रय ढूँढती थी, अब तो वह कु. सतिया के नाम की जानी-मानी नेता हो गई है- पता नहीं अब सतिया की उसे देखकर क्या प्रतिक्रिया होगी और फिर उसके साथी भी तो वहाँ होंगे जो पता नहीं एक ब्राह्मण की उपस्थिति को कैसे लें? मोहित को वह रात्रि भी याद आयी जब अँधेरे में डरी हुई सतिया उससे अपने निकट कुछ देर रुके रहने की याचना करती रही थी और सामाजिक उलाहनाओं के भय से मोहित उससे अपने को छुड़ाकर उसकी झोंपड़ी से भाग लिया था। उस दिन के बाद काफ़ी समय तक सतिया मोहित का सामना करने से बचती सी रहने लगी थी और मोहित भी उसकी निगाहों का सामना करने में लज्जा अनुभव करता रहा था। आज वह घटना भी उसके हृदय में असमंजस उत्पन्न कर उसकी धड़कन को तेज़ कर रही थी।

"मो...हित"- मोहित को कक्ष में घुसते देखकर सतिया के मुँह पर आश्चर्य और आह्लाद का जो भाव आया और जिस मिठास से उसने मोहित को पुकारा, सतिया के सिरहाने बैठा युवक उसे देखकर आहत हुए बिना न रह सका। मोहित अपने को सतिया द्वारा पुकार लिये जाने से न केवल आश्वस्त हो गया था वरन् प्रसन्नता के अतिरेक में उसके हृदय में सतिया को बाँहों में लिपटा लेने हेतु हल्का सा कम्पन भी हुआ था, परंतु अजनबी व्यक्ति की उपस्थिति में वह किंकर्तव्यविमूढ़ हो गया था और अपने भावातिरेक को दबाने का प्रयत्न करते हुए सामने खड़ा था। उसकी इस स्थिति को सतिया पूरी तरह समझ रही थी, अतः उसने पास में पड़ी कुर्सी की और इंगित करते हुए कहा,

"बैठो मोहित। यहाँ कैसे आये?"

सतिया के शब्दों में आत्मविश्वास झलक रहा था जिससे प्रभावित हुए बिना मोहित न रह सका। वह अपने में उतना आत्मविश्वास नहीं जुटा पा रहा था और उसने संकुचित स्वर में उत्तर दिया,

"मैं दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ रहा हूँ। आज सुबह अख़बार में तुम्हें चोट लगने की ख़बर पढ़कर तुम्हें देखने चला आया। अब कैसी हो?"

सतिया अपनी प्रसन्न्ता को छिपाने का कोई प्रयत्न किये बिना बोली,

"तब तो मुझे चोट लगना बड़ा शुभ रहा। मैं तो बिल्कुल ठीक हूँ और आज ही अस्पताल से छुट्टी भी हो जायेगी।"

सतिया का तन-मन मोहित को देखकर पुलक से भर रहा था और वह चाहती थी कि मोहित देर तक उसके पास बैठे और उससे घुलमिलकर बातें करे, परंतु तीसरे व्यक्ति की उपस्थिति के कारण औपचारिकता के आगे सम्वाद का विषय ढूँढ नहीं पा रही थी। मोहित भी सतिया के पास बैठकर देर तक बात करना चाहता था परंतु एक तो यौवनावस्था के आगमन से उत्पन्न स्वाभाविक संकोच और दूसरे उस युवक की उपस्थिति के कारण वार्ता का विषय उसकी पकड़ में भी नहीं आ रहा था। फिर कुछ सोचकर मोहित बोला,

"कहाँ रहती हो? क्या तुम्हारे माता-पिता भी दिल्ली में ही हैं?"

"हाँ, हम सभी दिल्ली में ही हैं", उसके द्वारा बताये पते को मोहित याद कर ले, ऐसे निहित उद्देश्य से सतिया विस्तार से बताने लगी, "बंगला नम्बर 194 बी., करोलबाग के आउट हाउस के एक कमरे में रहती हूँ, अम्मा और बापू भी साथ हैं।" फिर कुछ सकुचाहट के साथ पलंग पर बैठे युवक की ओर इशारा करते हुए जोड़ा, "दोनों कमरे इन्हीं विमलसिंह जी के हैं। दूसरे कमरे में विमलसिंह जी रहते हैं। मैं इन्हीं की पार्टी में काम करती हूँ।"

मोहित के आगमन पर सतिया के मन में उठे उछाह का अनुभव विमलसिंह तीक्ष्णता से कर रहा था और उसके मुख पर जाग्रत ईर्ष्या के भाव को संयत करने के उद्देश्य से सतिया उसकी ओर देखकर बोली,

"यह हैं मेरे गाँव के मोहित शर्मा।"

मोहित का परिचय सुनकर विमलसिंह की नाक में एक हल्का सा कम्पन हुआ जो उसमें किसी भी ब्राह्मण से मिलने पर उत्पन्न वितृष्णा के फलस्वरूप हुआ करता था- बस इस बार उस कम्पन का तरंगदैर्घ्य सामान्य से अधिक था। यद्यपि वह कुछ बोला नहीं परंतु अनादर के प्रति अतिसंवेदनशील मोहित के मन ने उसके मौन को स्पष्टतः पढ़ लिया था। उसे लगा कि उसकी उपस्थिति विमलसिंह को अवांछनीय लग रही थी और ऐसी परिस्थिति का दृढ़ता से साहसपूर्वक सामना करने की क्षमता की कमी के कारण वह सतिया के लम्बे सान्निध्य की अपने मन की इच्छा के विपरीत बोला था,

"अच्छा सतिया! मुझे यूनिवर्सिटी जाना है। अब तुम भी आराम करो। मैं चलता हूँ।"

सतिया अपने को अपनी इच्छा का स्वामी समझती थी और विमलसिंह के अनेक उपकारों के होते हुए भी उसकी इच्छा के विरुद्ध वह मोहित को रोक सकती थी परंतु तभी बाहर से डॉक्टर आता दिखाई दे गया और परिस्थिति का ध्यान कर वह प्रकटतः बोली थी,

"ठीक है, परंतु कालेज से फुर्सत होने पर घर आ जाना। अम्मा और बापू भी तुम्हें देखकर प्रसन्न होंगे।"

सतिया के शब्दों और उसके नेत्रों दोनो में आग्रहपूर्ण निमंत्रण का भाव था, जिससे मोहित अभिभूत था ओर विमलसिंह आशंकित।



"ऊँ-हूँ, आज मन नहीं है।"

उस रात्रि में सतिया के कमरे में आते ही विमलसिंह ने उसे बाँहों में भरकर चारपाई पर लिटा दिया था और उसके वक्ष पर हाथ रख रहा था, तभी सतिया ने अपनी अनिच्छा प्रकट कर दी थी। सतिया दिन ढलने से पहले अस्पताल से घर आ गई थी और दिन भर के थके-हारे उसके माता-पिता शाम को जल्दी ही खा-पीकर अपने कमरे में सोने लगे थे। अस्पताल में मोहित के प्रति सतिया का उछाह देखकर विमलसिंह के मन में जो ईर्ष्या जागी थी, वह उसे असामान्य रूप से कामुक बना रही थी- सम्भवतः वह अपने को आश्वस्त करना चाह रहा था कि सतिया केवल उसी की है। सतिया के मना करने पर विमलसिंह ने उसे और ज़ोर से बाँहों में भर लिया था और उसके मुँह पर अपना मुँह ले जाकर अपने तपते होंठ उसके होठों पर रखने लगा था। सतिया ने पहले तो अपने होंठ हटाये और फिर विमलसिंह के बल लगाने पर उसे झटक दिया था। जिस तरह आग पर रखे दूध पर आता उफ़ान ठंडा जल छिड़क देने से एकदम थम जाता है, उसी तरह विमलसिंह की उत्तेजना का उफ़ान एकदम थमकर शंका, ग्लानि एवं क्षोभ में परिवर्तित हो गया था। वह चुपचाप चारपाई से उठा और बल्ब का स्विच ऑन कर नीचे चटाई पर बैठकर एक किताब पढ़ने का दिखावा करने लगा था।

सतिया कुछ देर तक चुपचाप चारपाई पर लेटी रही थी और फिर उठकर अपने कमरे में चली गई थी- आज उसका मन सचमुच नहीं था। उसका मन तो मोहित में रमा हुआ था, जिसको पाने की कामना बचपन से उसके मन में बसी हुई थी और विमलसिंह के साथ कामसुख का अनुभव प्राप्त होने के पश्चात वह कामना और उद्दाम ही हुई थी। जिस प्रकार समुद्र की लहरों पर तैरने वाला व्यक्ति ऊपर विचरने वाली मछलियों से तो खेल सकता है परंतु गहराई में बसने वाली सीपी का मोती प्राप्त नहीं कर सकता है, उसी प्रकार विमलसिंह उसकी उद्वेलित कामेच्छा को तो शांत कर देता था, पर उसके मन में बसी मोहित की मूरत को विस्थापित अथवा ओझल नहीं कर पाता था। मोहित की मूर्ति सतिया के मन का मोती थी- शुभ्र, धवल परंतु अलभ्य। मोहित के सान्निध्य का कल्पनालोक उसका अपना संसार था, जहाँ विमलसिंह का प्रवेश वर्जित था। हाँ, विमलसिंह के सान्निध्य के अनुभव ने मोहित के सान्निध्य के काल्पनिक सुख को शारीरिक तृप्ति के सुख के साथ भोगने की उत्कंठा सतिया के मन में जगा दी थी। आज युवा मोहित को देखकर सतिया तन और मन दोनों को मोहित में समा देने को आतुर हो रही थी।

सतिया कई दिनों तक मोहित के आने की प्रतीक्षा करती रही थी परंतु न तो मोहित आया और न उसकी कोई ख़बर आई थी। उन दिनों विमलसिंह द्वारा सतिया के साथ रात्रि-संसर्ग के प्रयत्न असफल रहे थे, और तब एक रात्रि विमलसिंह ढाबे से देशी शराब पीकर आया था और सतिया के लाख मना करने पर भी उसने बलपूर्वक अपनी कामपिपासा शांत की थी। सतिया को उस समय स्वयं आश्चर्य हुआ था, जब उसका मन न होने पर भी उसके शरीर ने विमलसिंह का साथ दिया था; और फिर वही पुरानी दिनचर्या प्रारम्भ हो गई थी- अंतर केवल इतना आया कि अब सतिया कामक्रीड़ा के प्रति और उग्र हो गई थी। अब विमलसिंह को प्रारम्भ नहीं करना पड़ता था क्योंकि अवसर मिलते ही सतिया उस पर झपट पड़ती थी- यह मोहित के न आने से उभरे आक्रोश का परिणाम था।

अब राजनैतिक सभाओं में सतिया द्वारा दिये जाने वाले भाषण भी सवर्णों के प्रति और उग्र हो गये थे- इनमें सतिया ब्राह्मणों को दलितों का प्रथम शत्रु घोषित करती थी। वह गाँधी को मनुवादी बताकर उन्हें दलितों के विरुद्ध षणयंत्रकारी होना बताती, अम्बेडकर को एकमात्र दलित हितचिंतक एवं एकमात्र संविधान निर्माता बताती और सवर्णों के प्रति ऐसी अपमानजनक भाषा का प्रयोग करती थी जो दलित-अस्मिता को रुचिकर लगे और उनमें प्रतिकार की उत्तेजना जगाये।

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- क्रमशः


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