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ISSN 2292-9754

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02.26.2016


भीगे पंख
मोहित और सतिया/छह/

 "मोहित रुकौ। हमैं अंधेरे मैं बहुत डर लग रहो है।"- सतिया ने घबराते हुए मोहित से याचना की थी।

उस रात्रि कृष्ण पक्ष की रात्रि का गहन अंधकार फैला हुआ था और सतिया के माता-पिता हल्ला के खलिहान पर काम कर रहे थे। सतिया अपनी झोंपड़ी में अकेली थी। झोंपड़ी में पूर्ण अंधकार था। यद्यपि उसमें एक डिब्बी थी जो केवल कोई त्योहार पड़ने पर अंधेरी रातों में शाम को कुछ देर के लिये जला ली जाती थी। आज कोई त्योहार नहीं था और घर में मिट्टी का तेल भी उपलब्ध नहीं था। पस्सराम के राशन कार्ड के हिसाब से उसे महीने में एक बोतल तेल कुदरकोट के छविराम बनिया की राशन की दूकान से कंट्रोल के भाव पर मिलने का आदेश था, परंतु त्योहार का एक-आध मौका छोड़कर उसे शायद ही कभी तेल मिल पाया हो। उसके तथा अन्य ग़रीब गाँववासियों के कोटे का तेल कोटेदार प्रायः अपनी राशन की दूकान तक लाता ही नहीं था। वह शहर में उसे गोदाम से उठाकर वहीं खुले बाज़ार में ब्लैक में बेच देता था। कभी-कभी किसी बड़े आदमी के यहाँ कोई उत्सव होने पर ग़रीबों के हिस्से का तेल लाता था जिसे बड़े आदमी को बाँट देता था जिससे उनके मुँह बंद रहते थे। राशन के तेल और बाज़ार में ब्लैक में बिकने वाले तेल के भाव में इतना अंतर होता था कि राशन की दूकान वाले को इतना मुनाफ़ा हो जाता था कि आपूर्ति विभाग के अफ़सरों को खिलाने-पिलाने के बाद भी उसकी चाँदी कटती थी। उस रात भी पस्सराम की झोंपड़ी में डिब्बी जलाने को तेल नहीं था और झोंपड़ी की छत पर बैठी दो बिल्लियाँ बुरी तरह गुर्राकर लड़ रहीं थीं। सतिया के मन में छोटे पर से बिल्लियों का भय समाया हुआ था क्योंकि एक रात जब वह डेढ़ साल की थी तब एक बिल्ली के झोंपड़ी में घुसकर रोटी मुँह में दबा लेने पर वह उसकी ओर दौड़ पड़ी थी और बिल्ली ने उस पर आक्रमण कर उसका मुँह नोच लिया था।

उस रात्रि मोहित सूंड़ी नामक खेल खेलते हुए पीछे आती टीम द्वारा अपने को देख लिये जाने से बचाने के लिये बेतहाशा भागा था और अंधेरे में छिपने के लिये छूतछात की बात भूलकर सतिया की झोंपड़ी में तीर के समान घुस गया था। सूंड़ी का खेल आजकल के ‘आइस-पाइस’ जैसा होता था और रात्रि के अंधकार में खेला जाता था। इसमें गाँव के लड़के दो टीमों में बँट जाते थे और आधे लड़के गाँव की गली के एक मोड़ पर और बाकी आधे उसके अगले मोड़ पर खड़े हो जाते थे। फिर आगे वाले ‘चल बोल’ कह कर आगे भाग कर किसी पेड़ या ठूँठ के पीछे अथवा किसी खाली पड़े मड़हे में छिप जाते थे और बाकी आधे उन्हें ढूँढते थे। मोहित आज छिपने वाले लड़कों की आगे की टीम में था और पीछे आती टीम की पदचाप सुनकर बिना कुछ सोचे समझे सतिया की झोंपड़ी में घुस गया था। पर फिर एक अगमनीय स्थान पर पहुँच जाने का भान होते ही वह लौटने लगा था। तभी अंधेरे में बिल्लियों से भयभीत सतिया ने बढ़कर उसका हाथ पकड़ लिया था तथा उससे लिपटकर रुकने की अनुनय करने लगी थी। सतिया रुंआसी हो रही थी जिससे मोहित रुक तो गया था, परंतु किशोर वय के मोहित को किशोरावस्था में प्रवेश करती भरे पूरे बदन की सतिया का स्पर्श उसके जीवन की प्रथम उत्तेजना देने लगा था और उसका उत्तेजन ज्यों-ज्यों बढ़ रहा था त्यों-त्यों उसका साहस जवाब देने लगा था। आज उसका भय ‘अछूत’ के स्पर्श के कारण बड़ों द्वारा धिक्कारे जाने का नहीं था, जितना इस आशंका का भय था कि कहीं सतिया को उसकी उत्तेजना की अवस्था का भान न हो जाये तथा यह भय था कि एक लड़की के उससे लिपटे होने की अवस्था में कहीं कोई उसे देख न ले। यद्यपि मोहित के हाथ सतिया को अपने आलिंगन में ले लेने को मचल रहे थे तथापि अपनी अनियंत्रित उत्तेजना एवं आशंका से उसकी पिंडलियाँ कंपकंपाने लगीं थीं और वह सतिया से अपने को छुड़ाकर उलटा भाग लिया था। बाद में बहुत दिनों तक उसके मन को एक आत्मग्लानि मथती रही थी क्योंकि उसको ऐसा लगा था जैसे एक डरपोक सिपाही युद्धक्षेत्र से पीठ दिखाकर भाग लिया हो।

मोहित के साथ खेलने, उसे स्पर्श करने और उसका साहचर्य पाने की इच्छा सतिया के मन में बचपन से पनपती रही थी। सतिया के लिये चूँकि मोहित अप्राप्य घोषित था अतः अप्राप्य को येन-केन-प्रकारेण प्राप्त कर लेने के अपने मूल स्वभाव के कारण सतिया के लिये यह लालसा अदम्य भी थी। मोहित के द्वारा रामलीला के अवसर पर एवं काँटा चुभ जाने के अवसर पर एकांत में सतिया के प्रति किये गये व्यवहार और यदा-कदा उसके द्वारा अपने को निहारते पाकर सतिया के मन में यह विश्वास भी जम गया था कि मोहित उसे अस्पृश्य नहीं समझता है और उसका साहचर्य चाहता है परंतु सामाजिक प्रतिबंधों के कारण निकट आने का प्रयास नहीं करता है। अपने अच्छे स्वास्थ्य एवं हृष्टपुष्ट शरीर के कारण किशोरावस्था के दस्तक देने के पूर्व ही सतिया के मन में विपरीत लिंगीय आकर्षण का उद्भव भी होने लगा था। आज अकस्मात उसके द्वारा मोहित से लिपट जाने का प्राथमिक कारण बिल्लियों का भय ही था, तथापि लिपटने पर शीघ्र ही सतिया को अपने प्रथम समर्पण की अनुभूति भी होने लगी थी। नारी में प्रथम समर्पण के समय अपने अहं को पुरुष के समक्ष पराजित स्वीकार कर लेने का भाव गहराई से विद्यमान रहता है, और उस समय सतिया के मन में भी समर्पण का यह भाव उदय होने लगा था। आज सतिया ने मोहित के समक्ष न केवल अपना दैन्य प्रकट किया था वरन् अपने अहं को भी मोहित के अहं के समक्ष समर्पित कर दिया था; फिर मोहित द्वारा झट से अपने को छुड़ाकर भाग जाना उसके अहं को गहराई तक आहत कर गया था। सतिया आत्मग्लानि एवं दुख से अभिभूत हो गई थी। अवसाद से ग्रस्त होकर उस रात्रि वह देर तक सिसकती रही थी।

पर सतिया सतिया थी- सदैव अपने को सही मानने वाली। शीघ्र ही उसका अवसाद मोहित को अपने वश में कर लेने की अदम्य प्रेरणा में परिणत हो गया था।

"मोहित! तुम अपयें कौं समझत का हौ? तुमैं अपओं न बनाय लओ, तौ मेरोऊ नांव सतिया नाईं है। / मोहित तुम अपने को समझते क्या हो? यदि तुम्हें अपना न बना लिया, तो मेरा भी नाम सतिया नहीं है।/"- सतिया के मन को सांत्वना तभी मिली थी जब उसके मन के किसी कोने में यह निश्चय स्थापित हो गया था कि एक न एक दिन वह मोहित का समर्पण प्राप्त कर उसे पराजित अवश्य करेगी।



- क्रमशः


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