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ISSN 2292-9754

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01.22.2016


भीगे पंख
मोहित और सतिया /चार/

 कुदरकोट की रामलीला दूर दूर के गाँवों तक प्रसिद्ध थी। दस दिन तक चलने वाले इस भक्तिरसपूर्ण मनोरंजन की प्रतीक्षा साल भर सबको रहती थी, परंतु धनुष भंग के दिन होने वाला लक्ष्मण-परशुराम सम्वाद इस रामलीला का प्रमुख आकर्षण था। इसकी ख्याति परशुराम का पार्ट करने वाले पंडित गयाप्रसाद के कारण बहुत बढ़ गई थी। यद्यपि रामलीला में राम, लक्ष्मण और सीता की भूमिका निभाने वाले बालक पूजनीय होते थे, परंतु परशुराम की भूमिका वाले पं. गयाप्रसाद सबके प्रिय पात्र थे। वह कुदरकोट से दस कोस दूर रहते थे और सबसे अधिक महँगे परशुराम थे, परंतु कुदरकोट के रामलीला के आयोजक प्रतिवर्ष उन्हीं को परशुराम का पार्ट करने के लिये बुलाते थे क्योंकि एक बार वह लक्ष्मण पर क्रोध दिखाते हुए इतना उछले थे कि वह तख़्त, जिस पर मंच बनाया गया था, ही टूट गया था। इससे दर्शक आनंदातिरेक में देर तक तालियाँ बजाते रहे थे। तब से वह तख़ततोड़ परशुराम मशहूर हो गये थे और रामलीला के दिन आने के काफ़ी पहले से कुदरकोट की रामलीला समिति उन्हें अग्रिम बयाना देकर आमंत्रित कर लेती थी। इस लक्ष्मण-परशुराम सम्वाद के मंचन में तुलसीकृत रामचरितमानस में लिखे सम्वाद का कुछ ही अंश होता था, अपितु अपनी गेयता के लिये प्रसिद्ध राधेश्याम रामायण के अंशों की प्रधानता रहती थी। इसके अतिरिक्त लक्ष्मण और परशुराम की तारीफ़ इसमें समझी जाती थी कि मंचन के समय तत्काल ऐसे समयोचित सम्वाद बना लें जो दर्शकों को मुग्ध कर सकें। लक्ष्मण, जो क्षत्रिय थे, और परशुराम, जो ब्राह्मण थे, दोनो अपनी अपनी वीरता का बखान करते हुए क्रमशः ब्राह्मण एवं क्षत्रियों की एक दूसरे से लज्जापूर्ण पराजयों को दोहा, चौपाई आदि में गा-गाकर बखानते थे। इन बखानों में केवल कवित्व का जोश नहीं रहता था वरन् हर दोहे अथवा छंद का अंत ढोलक की एक थाप के साथ होता था और इस थाप के साथ सम्वाद बोलने वाले लक्ष्मण अथवा परशुराम मंच पर उछलते हुए तख़्त पर पैर की थाप मारते थे। यद्यपि लक्ष्मण और परशुराम दोनों के जोशीले बोल और ज़ोरदार उछलकूद दर्शकों को आह्लादित करते थे, परंतु चूँकि कुदरकोट में और आस-पास के गाँवों में ब्राह्मणों का बाहुल्य था अतः लक्ष्मण-परशुराम के बखानों में परशुराम की विजय होने पर अधिकतर दर्शकों के हृदय विशेष तौर पर गदगद हो जाते थे। लक्ष्मण का पार्ट करने के लिये किसी बालक अथवा नवयुवक को चुना जाता था जबकि परशुराम का पार्ट करने वाले मंजे हुए अभिनेता थे, अतः दोनों की वीरता के बखानों में परशुराम का अधिक प्रभावी होना लगभग तय रहता था।

हथिया नक्षत्र, जिसमें वर्षा ऋतु की समाप्ति पर बड़ी-बड़ी बूँदों की बौछार छोड़ते हुए बादल उड़ते चले जाते हैं, को बीते हुए एक माह बीत रहा था। गर्मी अपनी चुभन खो चुकी थी और किसी किसी संध्या की वायु के झोंके में गुलाबी जाड़े की लहर आने लगी थी। रामलीला का समय आ चुका था। क्वार माह के शुक्ल पक्ष की तृतीया की रात्रि में लक्ष्मण परशुराम सम्वाद का मंचन था। उस दिन मानीकोठी के अधिकतर पुरुष और बच्चे रामलीला देखने गये हुए थे- मोहित भी उन्हीं में से था। सतिया भी ज़िद करके अपने पिता के साथ रामलीला देखने चली गई थी। मंच के सामने कई खेस और जाजिम बिछा दी गईं थी, जिन पर सवर्ण लोग और उनके परिवार बैठ गये थे, अन्य जातियों के लोग पीछे ज़मीन पर बैठै थे और अस्पृश्य माने जाने वाले लोग सबसे पीछे दूसरों से दूरी रखकर बैठे हुए थे- पस्सराम और सतिया भी पीछे एक कोने में बैठे हुए थे। सतिया एक दो बार उठकर आगे चलने को हुई थी परंतु पस्सराम ने उसे घसीटकर अपनी गोद में बिठा लिया था। धुँधलका होते ही मंच पर एक धुँआता सा पेट्रोमैक्स जला दिया गया था। इतना अधिक प्रकाश गाँव के बच्चों को केवल शादी-विवाह के अवसर पर देखने को मिलता था, अतः पेट्रोमैक्स के जलते ही उनके हृदय प्रफुल्लित हो उठे थे। राजकुमारों की वेशभूषा में सुसज्जित अनेक युवक एवं प्रौढ़ पार्श्व से आकर मंच पर विराजमान हुए और उनके सामने एक धनुष, जिस पर प्रत्यंचा नहीं चढ़ी थी, रखा गया। फिर कुछ देर में एक गायक ने दोहे चौपाई गाकर दधीचि की हड्डियों से बने धनुष के माहात्म्य का बखान किया एवं घोषणा की कि जो राजकुंवर उस धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ा देगा, सीता जी स्वयम्वर में उसी का वरण करेंगी। सभी हट्टे-कट्टे दिखने वाले राजकुमार एक-एक कर उठे, परंतु उनमें से कोई धनुष को उठा तक न पाया। जब जनक निराश होकर कहने लगे कि पुत्री जानकी कहीं कुँआरी ही न रह जाय, तब पीले रंग की धोती पहने और उसी से कंधों को आंशिक रूप से ढके, माथे को गेरुआ तिलक और श्वेत बिंदियों से सजाये, केशों का जूड़ा बनाये, कमनीय मुख वाले धनुषधारी राम के मंच पर साक्षात दर्शन हुए और राम का दमकता हुआ मुखारबिंद देखकर दर्शक श्रद्धा और प्रेम के वशीभूत हो गये।

राम ने बिना किसी विशेष प्रयास के तिनके की तरह धनुष को उठाया और उस पर प्रत्यंचा चढ़ाने हेतु उनके द्वारा उसे मोड़ते ही वह बीच से टूट गया- दर्शकगण में हर्षातिरेक छा गया। धनुष भंग कर दिये जाने के उपरांत मंच पर परशुराम क्रोधित मुद्रा में दहाड़ते हुए प्रकट हुए कि किसने ब्रह्मर्षि दधीचि की हड्डियों से बना धनुष तोड़ने का दुस्साहस किया है? राम कोई उत्तर देते उससे पहले ही लक्ष्मण बीच में कूद पड़े और परशुराम को चैलेंज करने लगे और दोनों में वाक्युद्ध प्रारम्भ हो गया। दर्शकगण मंत्रमुग्ध होकर उनके सम्वादों का रसास्वादन करने लगे। इस बीच मोहित को पीछे से किसी बच्चे के रोने की आवाज़ आई। उसने पीछे मुड़कर देखा तो कुछ दूर पर घबराई सी खड़ी सतिया रोते हुए मोहित को पुकार रही थी। इसके पहले कि कोई इस बात पर ध्यान देता कि एक अछूत लड़की सवर्णों के मध्य आ गई है, मोहित ने उठकर सतिया का हाथ पकड़ लिया और उसे भीड़ से बाहर पीछे ले आया और उससे रोने का कारण पूछने लगा। सतिया ने सिसकते हुए उत्तर दिया,

"बापू जा कह कें बाहिर चले गये हते कि हियईं बैठियो, हम पेसाब करकें आत हैं, लेकिन देर हुइ गई है नाईं लौटे हैं। /बापू यह कहकर चले गये थे कि यहीं बैठो, मैं पेशाब करके अभी आ रहा हूँ, परंतु देर हो गई है वह नहीं लौटे हैं।।"

मोहित को आँखों में मोटा सा काजल लगाये हुए उससे रक्षा की गुहार करने वाली सतिया बड़ी अच्छी लगी थी, और वह उसके कंधे पर हाथ रखकर उसे सांत्वना देने लगा था। सतिया के अंतर्मन में भी मोहित का सान्निध्य चकोर के लिये चाँद की प्राप्ति के समान था; उसे मोहित का स्पर्श न केवल सांत्वनादायक वरन् मनभावन भी लग रहा था। वह चुप होकर मुस्कराने लगी थी। फिर कुछ दूरी पर पस्सराम को आते देखकर मोहित घबरा गया था कि कहीं सतिया के कंधे पर हाथ रखे हुए पस्सराम उसे देख न ले और उसने झटके से अपना हाथ हटा लिया था। पस्सराम को देखकर वह अपनी झेंप छिपाते हुए बोल पड़ा था,

"सतिया कौं सम्हारौ। जा रोत हती। /सतिया को सम्हालो। यह रो रही थी।।"

पस्सराम कृतज्ञ नेत्रों से मोहित को देखकर खीसें निपोरकर बोला था,

"अरे नेक देर का हुइ गई, ताई मैं रोअन लगी। /अरे थोड़ी सी देर क्या हो गई, उसी में रोने लगी।।"

सतिया को मोहित को छूने की जितनी वर्जना मिल रही थी, उसका उग्र मन उतना ही मोहित के साथ लिपटकर खेल कूद करने को लालायित रहने लगा था। आज अकेले में मोहित द्वारा बिना झिझक उसका हाथ पकड़कर उसे दर्शकों की भीड़ से पीछे लाने एवं कंधे पर हाथ रखकर आश्वस्त करने से सतिया को लगा था कि मोहित को उसको छूने में कोई बुराई नहीं लगती है। मन को मिले इस आश्वासन से सतिया के मन में लड्डू फूट रहे थे।



स्वतंत्रता आने के बाद सवर्णों के अतिरिक्त बीच की जातियों के काफ़ी बच्चे भी स्कूल जाने लगे थे। इनमें अपवादों को छोड़कर सभी लड़के होते थे। कुछ लड़कियाँ प्राथमिक पाठशाला तक पढ़ने जातीं थी। उसके पश्चात उनको पढ़ाने का साहस बिरला बाप ही कर सकता था- एक तो लड़कों की संगत का भय और दूसरे गाँव के बड़े-बूढ़ों के तानों की बौछार। ‘अछूत’ मानी जाने वाली जातियों के बच्चों को स्कूलों में अब भी हेय दृष्टि से देखा जाता था, परंतु उन्हें भी भर्ती करने और समान रूप से शिक्षा देने का शासकीय आदेश होने के कारण उनके कुछ बच्चों ने पढ़ना प्रारम्भ कर दिया था। हल्ला ‘अछूतों’ की शिक्षा के घोर विरोधी थे, और प्रायः उनके स्कूल जाने वाले बच्चों को लेकर उनके पीठ पीछे एवं उनके सामने भी ताने कसा करते थे; परंतु जब सतिया करीब पाँच साल की हो गई और उनके एवं कमलिया के मौके-बेमौके समागम के बीच ‘कबाब में हड्डी’ की भाँति आने लगी, तो उसे दूर रखने के उद्देश्य से उन्होंने एक दिन पस्सराम को बुलाकर कहा था,

"तुम्हाई बिटिया तौ हुसियार लगत है। बाय स्कूल मैं भरती कराय देउ। /तुम्हारी बिटिया तो होशियार लगती है। उसे स्कूल में भर्ती करा दो।।"

पस्सराम अपनी संतान को- एवं विषेशकर पुत्री को- पढ़ाने की बात सोच भी नहीं सकता था और उसे मालिक का यह कोई नया मज़ाक लगा था। वह फिक्क से हँस दिया था, परंतु हल्ला ने फिर गम्भीर होकर कहा था,

"कल्ल दस बजें बाय लैकें हेडमास्टर साहब के ढिंगाँ पहुँच जइयौ। हम भरती कर लीबे के लैं कह दियैं। पढ़ाई मैं तुम्हाओ कछू खरचऊ नाईं हुययै, काये सै अछूतन की फीस सरकार सै माफ़ है और ऊपर सै बजीफा और मिलत है। /कल दस बजे उसे लेकर हेडमास्टर साहब के पास पहुँच जाना। मैं भर्ती कर लेने के लिये कह दूंगा। पढ़ाई में तुम्हारा कुछ खर्च भी नहीं होगा, क्योंकि ‘अछूतों’ की फ़ीस माफ़ है और ऊपर से वजीफ़ा भी मिलता है।।"

पस्सराम समझ गया कि यह सुझाव नहीं आदेश है और उसने घर आकर कमलिया से इसकी चर्चा की। कमलिया पहले तो अविश्वास से आश्चर्यचकित हुई, पर सोचने पर उसे लगा कि इसमें सतिया की भलाई ही है। शायद पढ़ लिख जाने पर वह उसकी तरह यौन शोषण का शिकार होने से बच जाये। अतः उसने कह दिया,

"कोई हज्ज नाईं है, पढ़ लिख कें चिट्ठी पत्री तौ बाँचन लगयै। कल्ल स्कूल मैं भरती कराय देउ। /कोई हर्ज़ नहीं है, पढ़-लिख कर चिट्ठी पत्री तो पढ़ने लगेगी। कल स्कूल में भर्ती करा दो।"

सतिया जब अपनी अम्मा के साथ सबेरे-सबेरे मोहित के घर जाती थी, तब मोहित को स्कूल के लिये साफ़ कपड़े पहिनकर, बालों में कड़ुआ तेल लगाकर और बस्ता कंधे पर उठाकर जाते हुए हसरत भरी निगाहों से देखा करती थी। स्कूल में पढ़ने जाने की बात जानकर उसके मन में लड्डू फूटने लगे। उसे लगा कि वह भी मोहित की तरह सज-धज कर जायेगी और वहाँ उसके साथ ही रहेगी। दूसरे दिन माँ ने उसका मुँह धोया पोंछा और बापू के साथ स्कूल भेज दिया। कपड़े बदलने को थे ही नहीं, परंतु इससे सतिया का उत्साह कम न हुआ। वह सोच रही थी कि स्कूल में वह मोहित के पास ही बैठेगी, परंतु स्कूल में उसका प्रथम अनुभव बड़ा कटु रहा। हेडमास्टर साहब ने नाक-भौं सिकोड़ते हुए उसे भर्ती तो कर लिया, परंतु ‘अलिफ़’ कक्षा में सवर्णों के बच्चों से अलग बैठा दिया, जहाँ अन्य अछूतों के कुछ बच्चे बैठे हुए थे। सतिया को न तो मोहित की कक्षा में बैठने को मिला था और न अपनी कक्षा में सबके साथ बैठने का। दाखिला कराके पिता के जाने के बाद वह सिसकने लगी थी और किसी द्वारा उस पर ध्यान न देने पर वह कक्षा से उठकर रोते हुए इधर-उधर घूमने लगी थी। तभी उसे मोहित अपनी कक्षा में बैठा दिखाई दे गया था और वह धीरे से उसके पास जाकर खड़ी हो गई थी। यद्यपि उस समय मोहित की कक्षा में अध्यापक नहीं थे, तथापि वह सतिया को अपने पास खड़ा देखकर चकरा गया था और घबराहट में उससे बोल पड़ा था,

"सतिया! तुम हिंयाँ का कर रहीं हौ? /सतिया! तुम यहाँ क्या कर रही हो?।"

तब अन्य बच्चों का ध्यान भी उस पर आकृष्ट हो गया था और वे बोल पड़े थे,

"हट, हट हिंयाँ सै। /हट, हट यहाँ से।।"

सतिया को इससे अपमान एवं दुख की अनुभूति हुई थी, और वह अपनी सहायता हेतु मोहित को देखने लगी थी। मोहित के मन में सतिया के प्रति सहानुभूति एवं अपनत्व उभरा था परंतु वह उसे किसी प्रकार की सांत्वना अथवा सहायता देने में अपने को असमर्थ समझकर सतिया को वहाँ से चले जाने को कहने लगा था। सतिया इससे मर्माहत हो गई थी और रोना बंद कर चुपचाप अपनी कक्षा में आकर बैठ गई थी। इस घटना के बाद सतिया ने स्कूल में मोहित के निकट आना तो कम कर दिया परंतु मोहित से निकटता की उसकी चाह अदम्य ही रही थी और वह मोहित के स्कूल से घर आने पर और घर से स्कूल जाने पर उसके पीछे-पीछे चलती रहती थी। मोहित कनखियों से उसे अपने पीछे आते देखता रहता था और सतिया जानती थी कि मोहित उसको पीछे आते हुए बीच-बीच में देखा करता है। मोहित और सतिया दोनों का मन साथ-साथ चलने को होता था परंतु न तो मोहित चार कदम पीछे चलता था और न सतिया चार कदम आगे। मोहित प्रायः अपने साथियों से बात करने में व्यस्त रहता था और सतिया चुपचाप उसकी बातों में रस लिया करती थी।

इस तरह की शांत लुकाछिपी में माह और वर्ष व्यतीत हो रहे थे। एक दिन जब मोहित अकेला स्कूल से घर आ रहा था और सतिया उसके पीछे-पीछे आ रही थी, तो सतिया के नंगे पैर में बड़ा सा काँटा चुभ गया था और वह पीड़ा से चीख कर बैठ गई थी। मोहित ने घबराकर पीछे देखा था और उसके पैर में निकलते खून को देखकर दुखी होकर उसके निकट बैठ गया था। फिर उसका पैर अपने हाथों में पकड़ कर काँटा निकालने लगा था। काँटा निकल जाने पर भी कुछ देर तक सतिया के पैर में पीड़ा बनी रही थी और मोहित उसके आँसू अपने हाथ से पोंछते हुए उसे सांत्वना देता रहा था और जब सतिया की पीड़ा कम हई थी, तभी उसके साथ-साथ साथ घर वापस आया था। सतिया का मन उस दिन बड़ा उल्लसित रहा था और उसे रात में देर तक नींद नहीं आई थी- उसे पैर की पीड़ा में भी सुखानुभूति होती रही थी।

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- क्रमशः


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