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ISSN 2292-9754

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07.05.2016


भीगे पंख
सतिया /एक/

 उस होली की रात्रि, जब हल्ला ने मोहित को सतिया के वक्ष पर पिचकारी से रंग मारते और सतिया द्वारा उल्लास से मुस्कराते देख लिया था, और फिर जब कमलिया हल्ला के घर गई तब लौटते समय हल्ला ने उसे बैठक में बुला लिया था। उस दिन उन्होंने खूब भंग चढ़ा रखी थी और उनसे खड़ा नहीं हुआ जा रहा था। कमलिया के अंदर आते ही लड़खड़ाते पैरों से उठकर उन्होंने बैठक का दरवाज़ा बंद करना चाहा परंतु साँकल लगाने के पहले ही वह लड़खड़ाते हुए पलंग पर बैठ गये थे। फिर कमलिया से लड़खड़ाती जु़बान से बोले थे,\

 

"अबै तुम जाउ, लेकिन रात मैं सतिया कौ भेज दीजौ।/अभी तुम जाओ, परंतु रात में सतिया को भेज देना।"

फिर कमलिया के हतप्रभ चेहरे को देखकर कपटमय मुस्कराहट के साथ जोड़ा था, "अब तौ बछेड़ी जवान हुइ गई है; घोड़ी की सवारी सै बछेड़ी की सवारी मैं जांदां मजा अययै।/अब तो बछेड़ी जवान हो गई है; घोड़ी की सवारी से बछेड़ी की सवारी में ज़्यादा मज़ा आयेगा।"

कमलिया का सम्पूर्ण शरीर सनसना गया था और उसने क्रोध के आवेश में हल्ला का मुँह नोच लिया था। नशे की अधिकता के कारण हल्ला उस समय उसका कुछ न कर पाये थे और क्षण भर में आती और दूसरे क्षण जाती चेतनावस्था, जो भंग के नशे की विशिष्टता होती है, में पलंग पर पड़े रहे थे। घबराई हुई कमलिया जल्दी से बैठक से निकल कर अपनी झोपड़ी में चली गई थी। सिसकते हुए जब उसने यह बात पस्सराम को बताई थी तो पस्सराम का कलेजा काँप गया था। सतिया आँखें बंदकर एक कोने में फ़र्श पर बिछी हुई चटाई पर लेटी हुई थी और सब बातें सुन समझ रही थी। आक्रोश से उसका हृदय ज़ोर-ज़ोर से धड़कने लगा था और उसके अंतस्तल में प्रतिशोध का ऐसा ज्वार उठ रहा था कि उस समय यदि हल्ला उसके सामने पड़ जाते तो उनका गला दबा देती। तभी कमलिया का निश्चयात्मक स्वर सुनाई दिया,

"हम हिंयाँ नाईं रहिययैं। अभईं गाँव छोड़ दियैं।/हम यहाँ नहीं रहेंगे। अभी गाँव छोड़ देंगे।"

पस्सराम के मुँह से अनायास निकला, "लेकिन जययैं कहाँ?"

इस वाक्य में पस्सराम की समस्या का हल ढूँढने की असमर्थता निहित थी परंतु वह भी समझता था कि हल्ला के होश में आने के बाद उन लोगों की ख़ैर नहीं है और सतिया का भविष्य तो निश्चय ही आपदामय है।

पस्सराम की अनिश्चितता का कमलिया कोई उत्तर देती, उसके पहले ही सतिया अपनी चटाई पर उठकर खड़ी हो गई थी और दृढ़ स्वर में बोली थी,

"हम कहूँ चले जययैं, लेकिन हिंयाँ नाईं रहिययैं।/ हम कहीं भी चले जायेंगे, परंतु यहाँ नहीं रहेंगे।"

सतिया के निश्चयात्मक स्वर ने उन दोनों को न केवल चौंका दिया था, वरन् उनके अंदर उठने वाले द्वंद्व को ऐसे समाप्त कर दिया था जैसे पथरीले किनारे पर टकराने पर समुद्र की लहरें स्वतः शांत हो जातीं हैं। पस्सराम के स्वर में भी निर्णयात्मक दृढ़ता आ गई थी और वह बोला था,

"ठीक है अभईं सामान बाँध लेउ, और रातईंरात निकर चलौ, जा सै कोइ्र जान ना सकै कि हम कहाँ चले गये हैं। भगवान ने मुँह चीरो है तौ इत्ती बड़ी दुनियाँ मैं कहूँ न कहूँ खइबे भर कौं दइयै दियै।/ठीक है, अभी सामान बाँध लो और रात ही रात निकल चलो, जिससे कोई जान न पाये कि हम कहाँ गये हैं। भगवान ने मुँह चीरा है तो इतनी बड़ी दुनिया में कहीं न कहीं खाने भर को दे ही देगा।"

घंटे भर में कपड़े टीन के टुटहे बक्से में ठूँसकर सतिया ने बक्सा अपने हाथ में लटका लिया, बर्तनों को बोरे में भरकर पस्सराम ने ले लिया और बंसखटी को कमलिया ने सिर पर लाद लिया। जब तीनों झोंपड़ी से बाहर निकल रहे थे तो कमलिया फफक कर रो पड़ी। गाँव के लोगों में अपने घर और अपनी भूमि से हार्दिक लगाव होता है क्योंकि वे उन्हें मातृवत सुरक्षा प्रदान करते हैं एवं पालते हैं। इस झोंपड़ी को बनाने और इस घर को बसाने में तो उसने अपनी युवावस्था बिता दी थी- इस गाँव में वह विवाह के बाद किशोरवय की उमंगें लेकर आई थी, और आज उसके लिये "साजन! मोरा सासुरो छूटो जाय" चरितार्थ हो रहा था। कमलिया को मुड़मुड़कर अपनी झोंपड़ी को देखने पर पस्सराम घबराकर बोला था,

"जल्दी निकर चलौ। कोई देख न लेइ।/ जल्दी निकल चलो, कोई देख न ले।"

सतिया भी अंदर से उतनी ही उद्विग्न थी परंतु ऊपर से अपने को शांत बनाये हुई थी। उसकी उद्विगनता का एक अन्य कारण भी था- मोहित से चिर-विछोह और वह भी इस प्रकार कि मोहित जान भी न सके कि इस विशाल संसार में सतिया कहाँ खो गई है। इसकी कल्पना उसके मन में असह्य वेदना उत्पन्न कर रही थी और उसके नेत्र अनायास बार-बार मोहित के घर की ओर इस आशा में उठ जाते थे कि अकस्मात मोहित घर से बाहर आ जायेगा और वह उससे अंतिम विदाई ले लेगी। इस कल्पना के पीछे यह अभिलाषा भी थी कि तब मोहित भविष्य में उसे कहीं न कहीं ढूँढ लेगा एवं मोहित से पुनर्मिलन की सम्भावना बनी रहेगी। पर जब अर्धरात्रि की निस्तब्धता में आगे-आगे पस्सराम, बीच में कमलिया और पीछे सतिया का यह कारवां मानिकपुर गाँव से बाहर निकला, तब एक दो निंदासे कुत्तों के भूँकने के अतिरिक्त किसी मनुष्य का ध्यान उनकी ओर नहीं गया था।

सुबह जब हल्ला का नशा टूटा, तो अपने चेहरे में पीड़ा का आभास कर और रात्रि की घटना यादकर उनका पारा आसमान पर चढ़ गया था और वह गाली बकते हुए पस्सराम को झोंपड़ी से बाहर बुलाने लगे थे। कोई उत्तर न आने पर उनका क्रोध बेक़ाबू होने लगा था और वह स्वयं झोंपड़ी की ओर चल दिये थे। झोंपड़ी खाली देखकर वह समझ गये थे कि पस्सराम भाग गया है और दुमकटे सियार की तरह बोले थे,

"सारे जययौ कहाँ? घत्ती के छोर लौ तुमें ढूँढ कें बाई मैं गाड़ दियैं।/साले जाओगे कहाँ? धरती के छोर तक तुम्हें ढूँढ कर उसी में गाड़ देंगे।"

फिर वापस आकर झोंपड़ी पर कब्ज़ा करने के उद्देश्य से उसमें अपनी भैंसों के पड़रे बँधवाने भेज दिये थे।

पस्सराम के सपरिवार गाँव से भाग जाने पर लोगों में भाँति-भाँति की चर्चा हुई- पर जितने मुँह उतनी बात। हमारे ग्रामवासियों का स्वभाव है एक दूसरे के घरों की अंदर-बाहर की पूरी जानकारी रखना और किसी की उन्नति अथवा प्रसन्नता देखकर उससे ईर्ष्या करना तथा उसकी पीठ पीछे बुराई कर उसमें रस लेना। औरतें जब गर्मियों की दोपहरी में भोजन के बाद किसी "बड़े" आदमी के घर पर बतियाने हेतु इकट्ठी होती हैं तो वार्तालाप का विषय प्रायः अपनी अथवा किसी अन्य की बहू द्वारा सास या ससुर का अपमान करना और उससे उत्पन्न विवाद ही होता है एवं पुरुष जब सायंकाल की चौपाल पर इकट्ठे होते हैं तो वार्तालाप का विषय प्रायः किसी की बेटी-बहू के सच्चे-झूठे छिनाली के क़िस्से ही होते हैं। हल्ला द्वारा कमलिया को रखैल बनाकर रखने की बात काफ़ी पहले से जग-उजागर हो चुकी थी, और चुनाव में पस्सराम द्वारा चुपचाप हल्ला के विरुद्ध प्रचार की बात पुरानी हो चुकी थी, अतः अनुभवी लोगों को सही बात की अटकल लगाने में अधिक कठिनाई नहीं हुई थी। गाँव के कुछ मसखरे व्यक्तियों ने कुछ इस प्रकार से छींटाकशी की थी,

"बिचारो पस्सराम का कत्तो ? हल्ला बा के लैं कमलिया कौं एकौ रात कौं छोड़त कहाँ हते? और अब तौ उनकी नजर सतिया की छातिन पर जांदां टिकन लगी हती।/ बेचारा पस्सराम क्या करता? हल्ला उसके लिये कमलिया को एक भी रात को छोड़ते कहाँ थे, और अब तो उनकी नज़र सतिया की छातियों पर अधिक टिकने लगी थी।/"

अधिकतर ब्राह्मणों एवं अन्य जातियों के लोगों को पस्सराम के परिवार का ब्राह्मणों की बस्ती के बीच रहना प्रारम्भ से खटकता रहा था और उनके मन को उसके चले जाने से आंतरिक प्रसन्नता का अनुभव हुआ था।

पस्सराम की जाति के भी अनेक लोग पस्सराम के ब्राह्मणों के बीच रहने हेतु स्थान पा जाने से उससे ईर्ष्या करते थे और उनमें कई औरतों ने अपने मन की भड़ास यह कहकर निकाली थी,
"तब तौ कैसी ठसक सै ब्राह्मनन मैं रहिबे कौं चले गये हते? अब आँटा दार को भाव पता चल गओ।/ तब तो कैसी ठसक से ब्राह्मणों के बीच रहने को चले गये थे। अब आटा दाल का भाव पता चल गया है।"



"भैया, राम राम। रामआसरे चमार को घर कियैं है?"

पस्सराम ने गाँव के बाहर "अछूत" बस्ती में पहुँचकर एक बूढ़े आदमी से पूछा था। पस्सराम, कमलिया और सतिया का कारवां दिन भर चलते-चलते सायंकाल रुरूनगला गाँव पहुँचा था। तीनों के बदन पसीने से लथपथ थे और उनका भूख और थकान के मारे बुरा हाल था।

गत रात्रि मानिकपुर से पर्याप्त दूर पहुँचने के बाद जब वे आश्वस्त हो गये थे कि हल्ला के आदमी उन्हें अब नहीं पकड़ पायेंगे, तो बम्बा/छोटी नहर/ के पुल पर बैठकर सुस्ताने लगे थे। तब उनकी दूसरी चिंता प्रमुख हो गई थी कि जायेंगे कहाँ। पस्सराम ने अपनी चिंता जताते हुए कमलिया से पूछा था,

"कहाँ चलो जाय?"

कमलिया के पास भी इस प्रश्न का कोई उत्तर नहीं था, पर यह सोचकर कि पस्सराम उसके माइके चलने का प्रस्ताव न रख दे, उसने एक निषेधात्मक उत्तर अवश्य दिया था,

"हम अपयें मैके तौ जययैं नाईं। अम्मा और बापू के मरबे के बाद इत्ते साल हुइ गये हैं लेकिन भैया-भौजी नें झूठेऊँ मुँह हमाई खबर नाईं लई है। उनके लैं तौ हम मर चुके हैं।/मैं अपने माइके तो जाऊँगी नहीं। अम्मा और बापू के मरने के बाद इतने वर्ष हो गये हैं, परंतु भैया-भौजी ने झूठे मुँह भी हमारी ख़बर नहीं ली है। उनके लिये तो हम मर चुके हैं।"
फिर पस्सराम और कमलिया दोनो विभिन्न सम्भावनाओं को व्यक्त कर एवं उन पर देर तक विचार कर उन्हें स्वयं ही अस्वीकृत करते रहे थे। अंत में कमलिया ने एक नवीन सम्भावना प्रस्तुत की थी और उसमें पस्सराम को भी आशा की किरण दिखी थी। कमलिया ने बताया था,

"हमाये मौसिया रामआसरे जो रुरूनगरा मैं रहत हैं, उनके ढिंगाँ हम बचपन मैं रहीं हतीं और बे हमैं तब बहुत मानत हते। उनके हियाँ चलबे सै हुइ सकत है कि रहिबे को कछू ठिकानों हुइ जाय। /मेरे मौसा रामआसरे जो रुरूनगला में रहते हैं, के यहाँ मैं बचपन में रही थी और वह मुझे बहुत मानते थे। उनके यहाँ चलने से हो सकता है कि रहने का कुछ ठिकाना हो जाये।"

अन्य सभी सम्भावनाओं के पहले ही अस्वीकृत हो जाने के कारण पस्सराम को यह सुझाव ऐसा लगा था जैसे डूबते को तिनके का सहारा; तीनों अपना अपना बोझ उठाकर उसी गाँव की ओर चल दिये थे। उस दिन धूप तेज़ थी और सूर्य भगवान तप रहे थे। बोझ के कारण उन्हें थोड़ी-थोड़ी दूर पर सुस्ताना पड़ता था। तीनों भूख-प्यास से त्रस्त थे, परंतु अँधेरा होने से पूर्व रुरूनगला पहुँचने की जल्दी के कारण कहीं देर तक विश्राम भी नहीं कर सके थे। फिर भी रुरूनगला पहुँचते-पहुँचते अँधेरा घिरने लगा था और रात बिताने हेतु आश्रय मिलने की अनिश्चितता के कारण अँधेरे के साथ ही उन तीनों के हृदय की धड़कन भी बढ़ रही थी। रुरूनगला पहुँचने पर जिस व्यक्ति से पस्सराम ने रामआसरे का घर पूछा था, वह उन तीनों के सिर पर लदे सामान को और उनकी हालत देखकर कुछ देर आश्चर्यचकित सा खड़ा रहा था, पर शीघ्र ही उसने अनुमान लगा लिया था कि ये किसी बड़े आदमी द्वारा ग्राम से निष्कासित लोग हैं। रामआसरे का मकान पूछने से वह यह भी समझ गया था कि ये उसकी अपनी जाति के लोग हैं। वह सहानुभूति के स्वर में बोला था,

"राम, राम। रामआसरे कौं गुजरें तौ सालन बीत गये। उनके लड़का बच्चा सब गाँव छोड़ कें अंत चले गये हैं। अब तौ उनको घरऊ खस गओ है।/ राम राम। रामआसरे को मरे हुए तो कई वर्ष बीत गये हैं। उनके लड़के बच्चे सब गाँव छोड़कर चले गये हैं। अब तो उनका घर भी गिर गया है।"

पस्सराम, कमलिया और सतिया जैसे-जैसे उस व्यक्ति के मुख से निकले शब्द सुन रहे थे, वैसे-वैसे उनके चेहरे विवर्ण होते जा रहे थे- आस का तिनका भी उनके हाथ से छूटता जा रहा था। उनके चेहरे पर उभरती दयनीयता को वह व्यक्ति लक्ष्य कर रहा था। फिर बोला,

"कौन जात हौ? कहाँ तै आये हौ?/किस जाति के हो? कहाँ से आये हो?"

"हम पस्सराम भंगी हैं। मानिकपुर सै आये हें। हुँआँ के जिमीदार के डर के मारें गाँव छोड़ कें भाज आये हैं। रामआसरे हमायी इनके मौसिया लगत हते, सो सोची हती कि हिययीं सरन मिल जययै। पर अब तो समझ मैं नाईं आत है कि कहाँ जांय। का आज रात भर कौं हियाँ कहूँ सरन मिल सकत है?/ मै पस्सराम भंगी हूँ। मानिकपुर से आया हूँ। वहाँ के ज़मींदार के डर के मारे हम गाँव छोड़कर भाग आये हैं। रामआसरे मेरी पत्नी के मौसा लगते थे, अतः सोचा था कि यहीं षरण मिल जायेगी। पर अब तो समझ में नहीं आ रहा है कि कहाँ जायें। क्या आज रात भर को यहाँ कहीं शरण मिल सकती है?"

वह बूढ़ा सामने के छप्पर की ओर इंगित कर बोला,

"आज रात तौ तुम तीनौं हमाये मड़हा के सामने बाले छप्पर मैं रुक जाव। कल्ल सबेरें हम राजा साहब सै बात करिययैं। हुइ सकत है कि बे कहूँ रहिबे कौं जगह दै देंय।/ आज रात तो तुम तीनों मेरे मड़हा के सामने वाले छप्पर में रुक जाओ। कल सुबह मैं राजा साहब से बात करूँगा। हो सकता है कि वह कहीं रूकने को जगह दे दें।"

आसरे का तिनका पुनः पस्सराम की पकड़ में आ गया था।

छप्पर के नीचे तीनों ने अपना अपना बोझा उतारा। बूढ़े ने घर से लाकर उन्हें एक बाल्टी, लोटा और रस्सी दे दी और उस हरिजन बस्ती की पानी की कुंइयाँ का रास्ता बता दिया। तीनों ने कुंइयाँ पर जाकर पानी पिया, नहाये और बाल्टी में पानी भर लाये। तब तक उस बूढ़े की बहू ने खिचड़ी बना दी थी। तीनों ने भर पेट खायी; उनके मुँह एवं आत्मा दोनों से उस बूढ़े काका के लिये आशीष निकल रहे थे। यद्यपि गाँव की रीति के अनुसार उनमें से कोई अपने उद्गार उस बूढ़े काका के समक्ष शब्दों में व्यक्त नहीं कर रहा था, तथापि उनकी कृतज्ञता उनके नेत्रों में झलक रही थी। गाँवों में उन दिनों किसी उपकार के लिये धन्यवाद-ज्ञापन उपकार की महत्ता को कम करने के समान समझा जाता था।

दूसरे दिन सबेरे सूरज निकलते ही बूढ़े काका उन तीनों को राजा साहब की कोठी पर ले गये।

राजा रिपुदमनसिंह की कोठी गाँव के पूर्वी किनारे पर स्थित एक ऊँचे खेड़े पर बनी हुई थी, जिसकी ककइया ईंट की मोटी-मोटी दीवालें दूर से दिखाई देतीं थीं। यद्यपि स्वतंत्रता प्राप्ति के उपरांत कोठी के विषय में यह प्रचार किया जा रहा था कि राजा साहब के पूर्वजों ने 1857 के स्वतंत्रता संग्राम में अँग्रेज़ों का विरोध किया था, जिसके कारण अँग्रेज़ों ने उनकी रियासत को हथियाने का असफल प्रयत्न भी किया था, परंतु गाँव के बड़े-बूढ़ों का कहना है इस कोठी के राजाओं ने अँग्रेज़ों की चापलूसी करने और अय्याशी में लिप्त रहने में कभी कोई कसर नहीं छोड़ी थी। यद्यपि इस कोठी के "राजाओं" को अँग्रेज़ों से राजा की उपाधि नहीं मिली थी, परंतु वे बड़े ज़मींदार थे और अपनी रियाया से अपने को राजा ही कहलवाते थे। स्वतंत्रता से पूर्व राजा रिपुदमनसिंह ने तत्कालीन गवर्नर को इस लालच से अपने यहाँ आमंत्रित किया था कि उन्हें "राजा साहब" का सरकारी ख़िताब मिल जावे। उन्होंने डी.एम. साहब के यहाँ क़ीमती डाली के साथ उपस्थित होकर उन्हें हमवार कर लिया था। डी.एम. की संस्तुति पर गवर्नर ने सपत्नीक आने का निमंत्रण स्वीकार कर लिया था। उनके स्वागत हेतु रिपुदमनसिंह ने अपने ख़ज़ाने की बड़ी धनराशि व्यय कर डाली थी, परंतु गवर्नर साहब बीच रास्ते से वापस लौट गये थे। गाँव वालों का कहना है कि जब वह लाट साहब को आमंत्रित करने गवर्नमेंट हाउस, लखनऊ गये थे, तब चलते वक़्त उनके ख़ास चपरासी ग़ुलाम अली को बख़्शीश देना भूल गये थे। अतः जब लाट साहब की गाड़ी कच्ची सड़क पर आकर रुक-रुककर चलने लगी थी और उनकी मेमसाहब का मेक-अप धूल में ख़राब होने लगा था तो कार की अगली सीट पर बैठा गुलाम अली बड़ी स्वामिभक्ति की मुद्रा में धीरे से बोल पड़ा था,

"हुज़ूर अभी तो शुरुआत है- मैंने सुना है कि आगे का रास्ता तो बिल्कुल कच्चा और ख़राब है।"

गुलाम अली ने मेमसाहब को पहले से भी राजा रिपुदमनसिंह के एक छोटे-मोटे ज़मींदार होने और गवर्नर साहब के उनके यहाँ जाने से गवर्नर के पद का सम्मान गिरने की बात कहकर उनके ख़िलाफ़ भर रखा था। तभी एक ज़ोर की दौंची लगी और मेम साहब बोल उठी थीं,

"डार्लिंग! आई काँट गो ऐनी फ़र्दर। लेट़स गो बैक।/ प्रियतम, मैं और आगे नहीं जा सकती हूँ। चलिये, वापस चलें।"

गवर्नर साहब स्वयं भी देर से दुविधाग्रस्त हो रहे थे कि ऐसी सड़क पर गाँव तक जाया जावे या नहीं; मेमसाहब का रुख देखकर उन्होंने पूरे काफ़िले को वापिसी का हुक्म दे दिया था। ढेर सारा प्रचार करने और धन व्यय करने के पश्चात भी गवर्नर साहब के न आने पर राजा रिपुदमनसिंह की गाँववालों में बड़ी हेटी हुई थी और कुछ मसखरों ने राजा साहव पर एक गाना भी बना लिया था, "धोखे में लुट गओ रिपुदमना, लाट नहीं आओ रे", जिसे वे राजा साहब की पीठ पीछे सुरताल मिलाकर गाया करते थे। राजा साहब के सामने तो किसी गाँववाले की मुँह खोलने की हिम्मत ही नहीं पड़ती थी। वे राजा साहब से आज भी उतना ही डरते थे जैसे अंग्रेज़ी ज़माने में डरते थे- पहले वे राजा साहब की अफ़सरों से निकटता के कारण उनसे भयभीत रहते थे और अब सत्ताधारी नेताओं से निकटता के कारण।

लगभग दो घंटे की प्रतीक्षा के बाद पस्सराम कमलिया और सतिया राजा साहब के समक्ष प्रस्तुत किये गये। सब उनके दरबार वाले कमरे के बाहर मैदान में खड़े किये गये और सबने कमर तक झुककर उन्हें पालागन किया। बूढ़े काका ने संक्षेप में पस्सराम के परिवार की आपबीती सुनाई और राजा साहब से उन्हें गाँव में बसने के लिये जगह दे देने का अनुरोध किया। राजा साहब बिना कुछ बोले पस्सराम, कमलिया और सतिया की ओर देख रहे थे कि पस्सराम के मन में कुलबुलाहट हुई कि राजा साहब कहीं मना करने की न सोच रहे हों और वह बोल पड़ा,

"मालिक, हम हल्ला के बड़े सताये भये हैं। हमाई रच्छा करौ।/ मालिक हम हल्ला के बड़े सताये हुए हैं, हमारी रक्षा करो।"

"मानिकपुर के हल्ला?" राजा साहब जिज्ञासु हो उठे।

"हाँ मालिक।" पस्सराम हकलाता सा बोला।

राजा रिपुदमनसिंह की कुछ ज़मींदारों से अनबन थी जिनमें हल्ला भी थे। अनबन का कारण यह था कि हल्ला ने ऐलान कर रखा था कि बिना पतुरिया के कोई बारात उनके गाँव से होकर न गुज़रे। एक बार राजा रिपुदमनसिंह के रिश्तेदारों की एक बारात को मानिकपुर से होकर आगे जाना था, जिसमें अंतिम समय पर व्यवधान आ जाने के कारण पतुरिया नहीं आ पाई थी। बारात जैसे ही गाँव में पहुँची थी हल्ला और उनके लठैतों ने बारात को लाठियों से खदेड़ना प्रारम्भ कर दिया था। राजा के एक रिश्तेदार घोड़ी पर सवार थे और उन्होंने हल्ला को लाठी लेकर अपनी ओर आते देखकर कहा था कि वह राजा रिपुदमनसिंह के मामा हैं, तो भी हल्ला ने यह कहते हुए घोड़ी पर लाठी मार दी थी,
"मम्मा हौ, तो पाँय ऊपर उठाय लेउ। लाठी तौ जमक के परययै।/ राजा साहब के मामा हो तो पैर ऊपर उठा लो, लाठी तो जमक के पड़ेगी।"

पस्सराम के परिवार के सदस्यों को पैनी निगाहों से देखकर वैसे भी राजा साहब उन्हें गाँव में बस जाने हेतु ज़मीन दे देने का मन बना रहे थे, परंतु हल्ला द्वारा भगाया हुआ होने की बात जानकर उनकी रही-सही द्विविधा भी समाप्त हो गई और वह अविलम्ब बोले,

"ठीक है, तुम रुरूनगला मैं रह सकत हौ।/ ठीक है, तुम रुरूनगला में रह सकते हो।"

फिर सतिया पर एक बार फिर भरपूर निगाह डालकर उन्हांेने अपने कारिंदे को आदेश दिया,

"रामधुन! नौकरन बाली कोठरिन में देवी धानुक के बगल की खाली कोठरी मैं इन्हें टिकाय देउ। इन्हैं कामऊ समझाइ दीजौ। पस्सराम खेत मैं काम करयै और जाकी मिहरिया और बिटिया कोठी के बाहर की झाडू़ बुहारू को काम करियै। /रामधुन! नौकरों वाली कोठरियों में देवी धानुक के बगल की खाली कोठरी में इन्हें टिका दो। इन्हें काम भी समझा देना। पस्सराम खेत में काम करेगा ओर इसकी औरत और बिटिया कोठी के बाहरी हिस्से में सफ़ाई-लिपाई का काम करेंगे।"

राजा रिपुदमनसिंह की बात सुनकर पस्सराम को ऐसा लगा कि साक्षात भगवान उस पर कृपा बरसा रहे हैं। उसने तीन बार झुककर मिट्टी उठाकर माथे में लगाते हुए राजा के प्रति कृतज्ञता व्यक्त की। वे तीनों कुछ ही देर में अपने नये घर में आ गये एवं एक नये जीवन के सपने संजोने लगे।

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