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ISSN 2292-9754

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03.20.2017


भीगे पंख
रज़िया /एक/ (२)

 प्रयास कर रज़िया ने पलकें खोलीं और उसके होठों से अनायास निकला,

प्रातःकाल का भुकभुका हो चुका था। यद्यपि वर्षा पूरी तरह थम चुकी थी, तथापि आकाश में बादल घटाटोप छाये हुए थे। शीत वायु के झोंके आँगन में आकर दीवालों से वैसे ही टकरा रहे थे जैसे समुद्र की वेगवती लहरें किनारे से टकराकर चूर चूर होकर शांत हो जातीं हैं। रज़िया इन बादलों और शीत वायु के झोंकों से बेख़बर बरामदे में ऐसे छिपी खड़ी थी कि कहीं किसी के सामने न पड़ जाये और कोई उसकी दुर्दशा का साक्षी न बन जाये, कि तभी बड़ी बेगम अपने कमरे का दरवाज़ा खोलकर बाहर आयीं और कुछ देर तक घूरकर रज़िया को देखतीं रहीं थीं। फिर कुटिल स्मित की एक क्षीण रेखा उनके चेहरे पर उभर आई थी। उनसे निगाह मिलते ही रज़िया अप्रतिभ हो गई थी कि वह चिल्लाईं,

"अल्लाहरक्खी! मुई कहाँ मर गई है? अभी तक चाय नहीं लाई है?"

"अभी लाई बड़ी बेगम।" अल्लाहरक्खी का उत्तर सुनकर उन्होंने कमरे में वापस मुड़कर फटाक से कमरे का दरवाज़ा बंद किया जैसे रज़िया के मुँह पर तमाचा मारा हो। उस अरूप तमाचे की चोट से रज़िया के रुके हुए आँसू बहने लगे थे।

बड़ी बेगम को चाय देने जाते समय अल्लाहरक्खी ने रज़िया को देख लिया था और आदाब भी किया था, पर रज़िया के मुँह से कोई उत्तर नहीं निकला था। बड़ी बेगम को चाय देने के बाद अल्लाहरखी एक ट्रे में रज़िया के लिये चाय ले आयी थी और बरामदे में रखी मेज़ पर रख दी थी, पर रज़िया उससे बेख़बर सिसकती रही थी। फिर अल्लाहरक्खी एक कप में चाय बनाकर रज़िया के पाछे खड़ी हो गई थी और उसे चुपचाप निहारती रही थी। इस हवेली की हर हलचल की बीसियों वर्ष से गवाह रही अल्लाहरक्खी की अनुभवी आँखें रज़िया को देखते ही समझ गईं थीं कि वह निर्मम शेर द्वारा भभोड़ी हुई हिरनी है। रज़िया को देखते-देखते उसकी आँखों में भी आँसू उतर आये थे- दो साल पहले उसने ऐसी ही एक प्रातः में अपनी इकलौती किशोरी बेटी को इसी बरामदे में लगभग ऐसी ही दशा में गुमसुम खड़ा पाया था। उसके पूछने पर वह कुछ नहीं बोली थी परंतु फिर उसे उसकी लाश ही देखने को मिली थी। अल्लाहरक्खी बहुत रोई थी। यद्यपि उसकी लड़की ने अपनी अम्मी अल्लाहरक्खी से कुछ भी नहीं कहा था, पर अल्लाहरक्खी सब बात समझ गई थी और उसके मन में ताल्लुक़ेदार के लिये एक गाली बस गई थी, "हरामी का पिल्ला"। आज अनायास उसके मुँह से ये शब्द निकल पड़े थे। अल्लाहरक्खी के मुँह से इन्हें सुनकर रज़िया चौंक पड़ी थी और अल्लाहरक्खी के हाथ से चाय का प्याला लेकर अपने आँसुओं को रोकने का प्रयत्न करने लगी थी।



"छोटी बेगम! आप यहाँ सर्दी में क्यों खड़ी हैं?" रज़िया के कानों में सलाहुद्दीन की आवाज़ ऐसे गूँजी जैसे जंगल के अंधकार में भयातुर खड़े किसी व्यक्ति के पीछे आकर शेर दहाड़ मार दे। शेर से मनुष्य केवल अपने प्राणों के लिये डरता है, जिनके एक बार निकल जाने पर उसे भविष्य के समस्त दुखों से छुटकारा मिल जाता है, परंतु रज़िया का भय कहीं अधिक स्थायी था क्योंकि वह जान गई थी कि ताल्लुक़ेदार रूपी शेर तो रज़िया के शरीर के साथ उसके आत्मसम्मान को एवं उसके मन में बसी मोहित की मूरत को तिल तिल मारता रहेगा।

ताल्लुक़ेदार के स्वर में अपने किये हुए पर किसी प्रकार के खेद अथवा पश्चात्ताप का भाव नहीं था, वरन् उसमें एक विजेता के स्वर की खनक थी। यह खनक रज़िया को अपनी तुच्छता एवं असहायता का और गहन आभास करा रही थी। उसने अपने अब्बा को नशे में धुत होकर घर में घुसते ही अम्मी को गालियाँ बकने और उनकी मारकूट करते हुए देखा था और अपनी अम्मी को अपनी विवशता पर आँसू बहाते देखा था। उसके मन में यह स्थायी भाव घर कर गया था कि पुरुष अत्याचारी है और नारी अत्याचार सहने को विवश। उसके मुँह से ताल्लुक़ेदार साहब के प्रश्न का कोई उत्तर न निकला था और वह अपने मन का उद्वेलन एवं पीड़ा छिपाने हेतु बरामदे के फ़र्श पर बने बेल-बूटों की ओर एकटक देखती रही थी। स्वयं में मग्न ताल्लुक़ेदार साहब बिना उत्तर की प्रतीक्षा किये मुस्कराते हुए आगे बढ़ गये थे- उन्हें अपने प्रश्न के उत्तर की प्रतीक्षा थी भी कहाँ? उन्होंने अपना प्रश्न तो ऐसे फेंका था जैसे भिखारी की ओर कोई सिक्का फेंक देता है- यदि भिखारी सिक्के को न उठाये तो दानदाता उसकी मनुहार थोड़े ही करेगा?

ताल्लुक़ेदार साहब का स्वर सुनकर बड़ी बेगम भी यह दृश्य देखने हेतु अपने कमरे के दरवाज़े पर आकर खड़ी हो गईं थीं, और रज़िया ने देख लिया था कि सब कुछ देख-सुनकर बड़ी बेगम के चेहरे पर अनिर्वचनीय संतोष का भाव परिलक्षित हुआ था। ताल्लुक़ेदार साहब के जाते ही बड़ी बेगम रज़िया को लक्ष्य कर बोलीं थीं,

"रज़िया बेगम! ठंड में क्यों खड़ी हैं? यहाँ तशरीफ़ ले आइये।"

बड़ी बेगम के स्वर में एक चुभने वाली चहक थी, परंतु रज़िया को उन्हें मना करने का न तो साहस था और न उसे कोई बहाना ही सूझा। मदारी की डोर में बँधी बंदरिया सी वह हौले-हौले बड़ी बेगम के कमरे में पहुँच गई थी। बड़ी बेगम एक हाथी दाँत के फ़्रेम वाले मखमली सोफ़े की ओर इशारा करते हुए बड़ी अदा से बोलीं थीं,

"तशरीफ़ रखिये।"

और रज़िया उसके एक कोने में दुबकी सी बैठ गई थी।

"आराम से बैठिये छोटी बेगम। सोफ़ा शायद आपको आराम देह लगे- असली आइवरी का है।" यह कहकर बड़ी बेगम ने ठसक के साथ जोड़ा था, "मेरे माइके से दहेज़ में आया था।"

रज़िया आइवरी का मतलब नहीं जानती थी पर वह इतना अवश्य समझ रही थी कि बड़ी बेगम की बात का निहितार्थ रज़िया को जताना है कि रज़िया तुच्छ खानदान की है और बिना दहेज़ के आई है जबकि वह ऐसे वैसे खानदान की नहीं हैं।

रज़िया ने कोई उत्तर नहीं दिया, बस निगाह उठाकर एक नज़र बेगम को देखा और फिर सोफ़े के मरमरी हत्थे को। बेगम का भरा-भरा गोरा बदन और हाथी दाँत के सोफ़े की चिकनाई दोनों रज़िया की हीनभावना को अग्नि में घृत डाल देने के समान प्रज्वलित करने लगे थे। स्वयं की तुच्छता के आभास के वशीभूत होकर उसके मुँह से कोई शब्द नहीं निकल रहा था। उसकी यह चुप्पी देखकर बड़ी बेगम का साहस और बढ़ रहा था, और जिस प्रकार भय से वशीभूत मेमने की चुप्पी देखकर भेड़िया आक्रमण की मुद्रा में आ जाता है, उसी तरह बड़ी बेगम सब कुछ जानते हुए बोलीं थीं,

"छोटी बेगम! आप के भाई लोग क्या क्या करते हैं?"

बड़ी बेगम के कहने के अंदाज़ से ही रज़िया समझ गई थी कि उन्होंने उनके भाइयों की करतूतों का कच्चा चिट्ठा पहले ही जान रखा है, परंतु अब कोई न कोई उत्तर देना परिस्थितिजन्य विवशता बन गई थी। वह मन में बुदबुदाती सी बोली थी,

"कुछ ख़ास नहीं।" और फिर यह कहकर उठ खड़ी हुई थी,

"मेरे सिर में तेज़ दर्द है। अभी माफ़ी चाहती हूँ। फिर आऊँगी।"

रज़िया का सिर सचमुच दर्द से फटा जा रहा था।



"अल्लाहरक्खी, ओ अल्लाहरक्खी! कहाँ मर गई है हरामज़ादी? छोटी बेगम कहाँ हैं?"- नशे में धुत ताल्लुक़ेदार साहब दहाड़ रहे थे। रात आधी से ज़्यादा बीत चुकी थी और ताल्लुक़ेदार साहब दोस्तों और चाटुकारों की रुख़्सती होने पर अभी अभी ज़नानखाने में लड़खड़ाते हुए तशरीफ़ लाये थे। कमरे में छोटी बेगम को न पाकर उनका पारा सातवें आसमान पर चढ़ रहा था। दिन भर की थकावट से चूर अल्लाहरक्खी की आँख लग गई थी, इसलिये उसे आने में दो पल की देर हुई थी। इस अँधेरी रात में छोटी बेगम के कमरे में न होने की बात जानकर वह भी भौचक्की रह गई थी। अविलम्ब उसके मन में आशंका उठी कि कहीं उसकी बेटी की तरह छोटी बेगम भी छत से न कूद पड़ी हों, पर मन की बात मन में छिपाकर वह अदब से बोली थी,

"शायद बड़ी बेगम के कमरे में होंगी। अभी बुलाती हूँ।"

अल्लारक्खी दिन में काम करते समय कनखियों से छोटी बेगम पर नज़र रख रही थी और उसे रज़िया की विक्षिप्त सी मनोदशा का आभास था; वह यह भी समझती थी कि अपने भर छोटी बेगम बड़ी बेगम के कमरे में नहीं गईं होगीं। पर उसे उस समय ताल्लुक़ेदार को शांत करने को वही बहाना कारगर लगा था क्योंकि वह जानती थी कि बड़ी बेगम का नाम ले लेने पर ताल्लुक़ेदार साहब कुछ न बोल पायेंगे। फिर वह कमरे से निकलकर बड़ी बेगम के कमरे में जाने के बजाय हाँफती हुई सीधी छत पर चढ़ गई थी, जहाँ रज़िया को मुँडेर पर बैठकर शून्य में निहारते हुए देखकर उसे बड़ी तसल्ली हुई थी क्योंकि रज़िया के कमरे में न मिलने पर उसे आशंका हो रही थी कि कहीं रज़िया उसी तरह छत से न कूद पड़ी हो जैसे एक दिन उसकी बेटी नीचे कूद पड़ी थी। वह घबराहट में बोली,

"छोटी बेगम!"

रज़िया ने शाम को अल्लाहरक्खी के यह पूछने पर कि वह कब खाना खायेगी, उससे कह दिया था कि उसे भूख नहीं है और वह खाना नहीं खायेगी। वह चुपचाप एकांत में पड़ी रहना चाहती थी, परंतु ज्यों-ज्यों अँधेरा बढ़ने लगा था, रज़िया का मन ताल्लुक़ेदार के आगमन की कल्पना से अधिकाधिक भयभीत होने लगा था। जब यह स्थिति असह्य होने लगी थी, तो वह अँधेरे में सबकी निगाह बचाकर छत पर चली गई थी और मुँडेर पर एक कोने में गुमसुम बैठकर आकाश के शून्य को निहारने लगी थी। तभी पूरब दिशा में एक इकलौते चमकते तारे को देखकर उसके मन में विचार आया था कि हो सकता है मोहित भी कहीं एकांत में बैठकर उस तारे को देख रहा हो, और उसके मन ने उस तारे के माध्यम से मोहित से एक सुखद तादात्म्य स्थापित कर लिया था। उसे लगने लगा था कि वह मोहित के पास है- मोहित की शरण में, मोहित की छत्रछाया में और मोहित के बाहुपाश में; उन दोनों के बीच के समस्त अवरोध समाप्त हो रहे है, उसके समस्त संताप मोहित के स्पर्श से पिघल कर बह रहे हैं और मोहित के तन का स्पर्श उसके तन में शीतलता व्याप्त कर रहा है। पता नहीं कितनी देर तक रज़िया इस अवर्णनीय सुख में डूबी रही थी, जब अल्लाहरक्खी ने उसे पुकारा था। गहरी नींद में सुख-स्वप्न देखते हुए किसी व्यक्ति को जगाने हेतु यदि कोई उसकी चादर खींच दे, तो सोने वाला व्यक्ति और ज़ोर से चादर में अपने को छिपा लेने का प्रयास करने लगता है, उसी प्रकार प्रथम बार अल्लाहरक्खी की आवाज़ सुनकर रज़िया भी अपने को उस तारे में व्याप्त मोहित की छवि में छिपाने लगी थी, पर तभी अल्लाहरक्खी ने फिर ज़ोर से पुकारा था,

"छोटी बेगम! जल्दी चलिये। ताल्लुक़ेदार साहब ज़नानखाने में तशरीफ़ ला चुके हैं और आप को फ़ौरन याद फ़रमा रहे हैं।"

ताल्लुक़ेदार साहब का फ़र्मान सुनकर रज़िया वास्तविकता के धरातल पर उतर आयी थी और निर्दयी मालिक के डंडे से भयभीत गाय सी धीरे से उठकर अल्लाहरक्खी के पीछे चल दी थी। उसके कमरे में घुसते ही अल्लाहरक्खी ने दरवाज़ा बाहर से उढ़का दिया था और अल्लाह से रज़िया की ख़ैर की दुआ करती हुई अपनी कोठरी में चली गई थी।

रज़िया के कमरे में घुसते ही ताल्लुक़ेदार साहब क्रोध में बोले थे,

"इतनी देर कहाँ कर दी छोटी बेगम?"- और रज़िया के उत्तर की प्रतीक्षा किये बिना ही उसे बेसब्री से बाँहों में उठा लिया था और पलंग पर डालकर उसका सलवार और अंगिया फाड़ने लगे थे। रज़िया आँख मूँदकर निस्पंद पड़ी रही थी और ताल्लुक़ेदार साहब उसके अंग-अंग से नृशंसता से खेलते रहे थे। बीच-बीच में रज़िया की पीड़ा भरी कराहों को सुनकर वह अपने विजयोल्लास में और उन्मत्त हो जाते थे।

रज़ि़या शीघ्र ही समझ गई कि उसकी देह, उसकी अस्मिता, उसका आत्मसम्मान एवं उसके मन में विराजमान मोहित की मूरत को मसला जाना ही उसकी नियति है। शनैः शनैः उसने अपने को ऐसा बना लिया था कि उसकी देह को मसले जाने पर यथासम्भव उसके मुँह से आह भी न निकले। उसने अपने अस्तित्व को स्वयं ही नकार सा दिया; वह बड़ी बेगम के ताने मारने पर कोई प्रतिक्रिया प्रदर्शित नहीं करती थी; और कुचले मसले जाते समय वह स्वयं शवासन जैसी स्थिति में चली जाती थी तथा मन में बसी मोहित की मूरत को विस्मृति की खोह में डाल देती थी, पर दूसरी सुबह उसे खोह से निकालकर बड़े दुलार से धोती-पोंछती थी और फिर उसकी पूजा करने लगती थी।

- क्रमशः


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