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ISSN 2292-9754

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02.01.2017


भीगे पंख
 रज़िया /एक/ (१)

काल की गति अबाध है- वह निर्लिप्त, निरपेक्ष, निःस्पृह एवं निर्मम रहकर प्रवाहित होता रहता था। वशानुवर्ष गर्मिंयों की छुट्टियों के आगमन के साथ रज़िया के हृदय में बढ़ने वाली धड़कन, नयनों में उद्वेलित प्रतीक्षा की प्यास, और मोहित के न आने से लू के थपेड़ों से सूखे चेहरे पर बहने वाले अश्रुओं से उसे क्या मतलब? उसे तो बस अनवरत वर्तमान से भविष्य की ओर प्रवाहित होते रहना है। कहते हैं कि लम्बा समय बीत जाने से हृदय के घाव भर जाते हैं और समय पुराने सम्बंधों की चमक को फीका कर नये सम्बंध बना देता है; परंतु रज़िया के जीवन में ऐसा कुछ घटित नहीं हो रहा था। उसका जीवन मोहित पर ठहर सा गया था- उसका तो जो भी था वह मोहित ही था; न तो उसके मन में कोई नवीन सम्बंध बनाने की लालसा थी और न वह अपने को इस योग्य समझती थी। वह तो ऐसी मीरा थी जिसके लिये उनका पद "मेरे तो गिरधर गोपाल दूसरो न कोई" अक्षरशः चरितार्थ होता था।

रज़िया अब बड़ी हो रही थी और "जहाँ मौक़ा मिले मुँह मारने वाले" उसके अब्बा और भाइयों का उसके विषय में ऊँच-नीच हो जाने से आशंकित रहना स्वाभाविक था; उनकी उस पर पहरेदारी सख़्त होती जा रही थी। उसके मोहित की मौसी के घर जाने पर भी रोक लगा दी गई थी। इस वर्ष पुनः गर्मियों की छुट्टियाँ प्रारम्भ हो चुकीं थीं और मोहित के आगमन की आशा में रज़िया के हृदय की धड़कनें बढ़ गईं थीं। एक दोपहर में वह अपने घर से निकलकर तालाब की ओर गई और जामुन के वृक्ष के नीचे खड़ी होकर कुछ देर तक मोहित की स्मृतियों में खोई रही और फिर दीवानी मीरा की भाँति मोहित के आने की ख़बर जानने मौसी के घर को चल दी। उस दोपहर उसे रोकने वाला कोई नहीं था क्योंकि सबसे बड़े भाई की तहसील में चपरासी की नौकरी लग गई थी और वह वहीं गया हुआ था, दूसरा भाई अपने दोस्त की बड़ी बहन के साथ भाग गया था और उसका कुछ पता नहीं था, तीसरा भाई मिंया फ़ज़लू की दूकान पर टेलरिंग सीखने के बहाने रेलवे स्टेशन पर जेबकतरी की ट्रेनिंग ले रहा था, और छोटा भाई सायकिल की दूकान पर पंचर जोड़ता था तथा सायकिल की दूकान के लौंडेबाज़ मालिक का माशूक बन जाने के कारण अधिकतर समय वहीं बिताता था। रज़िया के अब्बा सेवानिवृत्त हो चुके थे और अब ख़ाली थे, परंतु अब अपनी दूसरी बीबी से भी उनका मन उचटने लगा था और उन्होंने अपनी ख़ालाज़ाद बहिन को पटा लिया था और मुआफ़िक मौक़ा पाते ही उसके घर में दाख़िल हो जाते थे। आज उन्हें ऐसा मौक़ा मिल गया था और वह अपने घर की मुर्गियों द्वारा उस दिन दिये हुए चार अंडे लेकर वहीं चले गये थे।

वाह्य संसार से बेख़बर शंख के अंदर बंद प्राणी की तरह रज़िया अपने में खोई हुई चली जा रही थी कि पीछे से घोड़ा दौड़ाता हुआ एक घुड़सवार उसके इतने निकट से आगे निकला था कि रज़िया बहुत घबरा गई थी और साधारतः विपरीत परिस्थितियों को चुपचाप सहने वाली रज़िया के मुँह से घबराहट में निकल गया था,

"घोड़े पर क़ाबू नहीं रख सकते हैं तो चढ़ते क्यों हैं?"

शानदार शर्ट, ब्रीचेज़ और हैट पहने इस अधेड़ आयु के घुड़सवार को एक तुच्छ लड़की द्वारा यूँ बोलना बड़ा नागवार लगा था और वह घोड़ा रोक कर पीछे लड़की की ओर घूरने लगा था। वह कुछ बोलता कि उसके पीछे से दौड़ कर आये साईस ने रज़िया से कहा,
"जानती भी हो कि किससे बात कर रही हो? यह ताल्लुक़ेदार सलाहुद्दीन साहब है।"

रज़िया ने ताल्लुक़ेदार साहब के रोबदाब के बारे में सुन रखा था और वह किंकर्तव्यविमूढ़ होकर अपने को कुछ भी कहने में असमर्थ पा रही थी। तभी उस घुड़सवार ने साईस को अपने पास बुलाकर फुसफुसाकर उससे कहा,

"पता लगाओ कि यह किसकी लड़की है।"

फिर घुड़सवार और साईस दोनों उसी गति से आगे बढ़ गये थे। रज़िया उनकी बात स्पष्ट नहीं सुन पाई थी किंतु उसका संवेदनशील मन किसी आने वाली विपत्ति की सम्भावना से विचलित होने लगा था। वह घबराई सी जल्दी-जल्दी मौसी के घर पहुँची- वहाँ मोहित नहीं आया था बस उसकी माँ की ख़बर आई थी कि अब मोहित की कालेज की पढ़ाई कठिन हो गई है, अतः वे लोग इस वर्ष भी न आ सकेंगे। वास्तविकता यह थी कि छुट्टियाँ होने पर मोहित ने तो माँ से फ़तेहपुर चलने का प्रस्ताव रखा था और ज़िद भी की थी परंतु उसकी माँ एक तो साम्प्रदायिक दंगों के पश्चात फ़तेहपुर जाने में भय खाने लगीं थीं और दूसरे अब आयु में बढ़ते हुए मोहित का रज़िया से मिलना जुलना उन्हें पसंद नहीं था; मोहित में माँ की अवज्ञा कर अकेला आने का साहस नहीं था। मोहित के न आने की बात जानकर आज रज़िया के मन की पीड़ा का बाँध फट पड़ा था और वह मौसी के कंधे पर सिर रखकर फूट-फूट कर रोने लगी थी। मौसी रज़िया के मन की वेदना को समझतीं थीं परंतु सामाजिक बंधनों को तोड़ पाने की असम्भाविता को भी वह जानतीं थीं। उन्होंने रज़िया को अपने सीने से लगा लिया और देर तक उसके बालों को सहलातीं रहीं। जब रज़िया का अश्रुप्रवाह रुका तो वह अपने को धीरे से छुड़ाकर सूनी आँखों से मौसी को देखते हुए अपने घर को चल दी थी- मौसी को भी सांत्वना के कोई शब्द न सूझे और वह उसे जाते हुए चुपचाप देखतीं रहीं थीं।

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रज़िया की परिस्थितियों की यह विडम्बना थी कि माँ को छोड़कर न केवल उसके अपने घरवाले उससे शत्रुवत व्यवहार करते थे वरन् उसके स्वयं के व्यक्तित्व के सद्गुण भी उसके शत्रु बन रहे थेः वह सीधी-साधी और आज्ञाकारिणी थी अतः उसके पिता और भाई उससे घर के सब काम कराते थे और उसी को ताड़ना भी देते थे, वह धार्मिक भेदभावों के ऊपर रहकर इंसानियत की क़द्र करती थी अतः उसने किसी मुस्लिम लड़के के बजाय एक हिंदू लड़के को अपना मनमीत बना लिया था जिससे चिरमिलन असम्भव था, और वह देखने में अत्यंत आकर्षक थी अतः दिलफेंक ताल्लुक़ेदार सलाहुद्दीन का उस पर दिल आ गया था। ताल्लुक़ेदार साहब ने अभी तक जो दो शादियाँ की थीं उनमें पहली बीवी मर चुकी थी, और पहली व दूसरी में से किसी के कोई संतान नहीं थी, इसलिये उनके लिये न केवल तीन और बीवियों को रखने की गुंजाइश थी वरन् नाम चलाने के लिये और बीवियों की ज़रूरत भी थी। उनके रिश्तेदार और गुमाश्ते उन्हें जल्दी और शादी कर लेने को उकसाया करते थे जिससे इतनी बड़ी ज़ायदाद का वारिस तो आये। कुछ दिन पहले उन्होंने एक राह चलते फ़कीर को सम्मानपूर्वक घर बुलाकर संतान का सवाल उठाया था तो वह काफ़ी देर तक उन्हें घूरता रहा था और फिर किसी भी अधेड़ पुरुष की चाहत को ध्यान में रखकर बोला था,

"अब की बार आाप किसी कमसिन से निक़ाह कीजिये, औलाद ज़रूर पैदा होगी।"

तब से ताल्लुक़ेदार साहब सोच में पड़ गये थे कि उनके चालीस की उमर पार कर लेने के बाद अब किसी ज़मींदार ख़ानदान की कमसिन के घरवाले उनसे निक़ाह को क्योंकर राज़ी होंगे। तभी उनकी निगाह रज़िया पर पड़ गई थी जो अपने फटे पुराने सलवार कुर्ते में उन्हें किसी निर्धन मुसलमान के घर की लगी थी और कमसिन होने के साथ-साथ बहुत दिलकश भी लगी थी। एक निगाह में ही उनका दिल लोटनकबूतर हो गया था। तीसरे दिन जांच पड़ताल के बाद उनके साईस ने उन्हें बताया था,

"हुज़ूर! उस लड़की का नाम रज़िया है। उसकी माँ मर चुकी है और उसका बाप मीरअली मरभुखा पियक्कड़ है। घर में खाने-पीने के लाले पड़े रहते हैं।"

मीरअली के पियक्कड़ होने की बात जानकर सलाहुद्दीन को यह सोचकर ख़ुशी हुई थी कि उसको पटाने में कठिनाई नहीं होगी। उसी शाम सलाहुद्दीन के गुमाश्ते ने मीरअली के दरवाज़े की साँकल खटकाई थी और दरवाज़ा मीरअली ने ही खोला था। गुमाश्ता उनसे बस इतना कहकर चला गया था,

"ताल्लुक़ेदार सलाहुद्दीन साहब ने कल सबेरे आप को याद फ़रमाया है।"

सलाहुद्दीन से हुई आकस्मिक मुठभेड़ के उपरांत रज़िया के मन में एक ऐसा भय समा गया था जैसा बाघ की आहट पाकर हरिणी के मन में समा जाता है और वह विशेष चौकन्नी रहने लगी थी। अतः घर के अंदर होते हुए भी उसने गुमाश्ते की बात सुन ली थी और उसका दिल धक से रह गया था। बाघ द्वारा घात लगाये जाने वाली हरिणी की छठी इंद्रिय जाग्रत रहती है और वह आने वाले ख़तरे की भयावहता का पहले से आभास पा लेती है, उसी तरह रज़िया को आभास हो गया था कि यह बुलावा रज़िया द्वारा ताल्लुक़ेदार के प्रति की गयी गुस्ताख़ी के लिये नहीं है वरन् उसके जीवन के साथ खिलवाड़ किये जाने के लिये है। वह हताशा के अथाह सागर में गोते लगाने लगी थी- वह स्वयं तो अकिंचन और निरीह थी ही, उसका एकमात्र अवलम्ब मोहित भी मोहन की भाँति रूठकर बिना पता ठिकाना बताये ही वृंदावन छोड़कर चला गया था। रज़िया उस रात सोते-सोते बार-बार चौंक कर उठती रही और हर बार उसे रात्रि और अधिक अंधकारमय दिखाई दी थी।

रज़िया के अब्बा भी उस रात सोच में डूबे रहे थे। ताल्लुक़ेदार साहब के यहाँ से उन्हें पहली बार ऐसा फ़रमान मिला था और उनका अनुमान था कि ज़रूर उनके किसी लौंडे की करतूत से ख़फ़ा होकर तालुकदरार साहब ने बुलाया होगा। वह सबेरे जल्दी तैयार होकर कोठी पर पहुँचे और उन्हें बिना इंतज़ार कराये ताल्लुक़ेदार साहब के हुज़ूर में पेश किया गया। ताल्लुक़ेदार साहब गद्देदार आरामकुर्सी पर बैठे हुक्का गुड़गुड़ा रहे थे। वह गहरे सोच में डूबे लग रहे थे और आदत के अनुसार अपनी दाँयें हाथ की उँगलियों से अपनी सफ़ेद होने लगी मूँछों को उमेठ रहे थे। रज़िया के अब्बा के बैठक में घुसते ही उन्होंने उनको अंदर लाने वाले व्यक्ति से कहा,

"आप जाइये। इनसे अकेले में बातें करनी हैं।"

साथ ही मीरअली को सामने रखे सोफे़ पर तशरीफ़ रखने को कहा। मीरअली सकपका गये और उनका अस्सलामवालिकउम करने के लिये उठा हाथ उठा ही रह गया। ताल्लुक़ेदार साहब उनकी मनोदशा समझकर बोले,

"बैठिये, बैठिये मीरअली साहब।"

ताल्लुक़ेदार साहब का अपने प्रति इतना सम्मानजनक सम्बोधन सुन मीरअली उन्हें अवाक देखते हुए अधबैठे से सोफ़े पर बैठ गये। तभी ताल्लुक़ेदार साहब की मूँछें और अधिक चंद्राकार हो गईं क्योंकि उनके होठों पर एक रहस्यपूर्ण मुस्कान आ गई थी। वह बोले,

"मीरअली साहब! आप के घर में एक हीरा है जिसे मैं अपना बनाना चाहता हूँ।"

रज़िया के अब्बा अभी भी भौंचक्के थे और मुँह फाड़कर ताल्लुक़ेदार साहब की तरफ़ देख रहे थे। तब ताल्लुक़ेदार साहब ने बात का ख़ुलासा करते हुए कहा,

"मैं आप की बेटी रज़िया से शादी करना चाहता हूँ।"

रज़िया के अब्बा को अपने कानों पर विश्वास नहीं हो रहा था- वह अविश्वास, आश्चर्य और आह्लाद के समुद्र में गोते लगाने लगे थे। ताल्लुक़ेदार साहब उनके चेहरे पर आने वाले भावों को समझते हुए बोले,

"मैंने आप की बेटी को कुछ दिन पहले राह चलते देखा था और तभी फ़ैसला कर लिया था कि रज़िया से पैदा होने वाली संतान ही मेरी वारिस बनेगी।"

अब मीरअली प्रस्ताव की गम्भीरता के विषय में आश्वस्त हो चुके थे और अपने स्वर्णिम भविष्य की कल्पना करने लगे थे, पर अपने को बहुत उतावला होना न लगने देने के इरादे से बोले थे,

"हुज़ूर इससे बड़ी इज़्ज़त अफ़ज़ाई मेरे लिये क्या हो सकती है, पर रज़िया अभी बच्ची है।"

"आप फ़िक्र न करें, मैं रज़िया की बहबूदी का पूरा ख़़याल रखूंगा।"

"हुज़ूर फिर मुझे क्या उज्र हो सकती है?"

मीरअली के यह कहने पर ताल्लुक़ेदार साहब ने गुमाश्ते को बुलाकर मीरअली के लिये नाश्ता-पानी मँगाया और काज़ी साहब को बुला लाने को कहा। काज़ी साहब आनन फ़ानन में उपस्थित हो गये और उनके मशविरे से सात दिन बाद ही निक़ाह की तारीख़ तय हो गई।

मीरअली के विदा होते वक्त ताल्लुक़ेदार साहब ने चुपचाप उन्हें नोटों की दस गड्डियाँ शादी के इंतज़ामात के लिये थमा दीं थीं और गुमाश्ते के हाथ शराब की दस बोतलें भी उनके साथ भिजवा दीं थीं। मीरअली सातवें आसमान पर उड़ रहे थे।

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उस दिन के बाद रज़िया के घर में गहमागहमी मच गई थी। इतने कम समय में कितना प्रबंध करना था- घर में जगह कम होने के कारण पास के बग़ीचे में बड़ा सा शामियाना लगाया जाने लगा; मिठाइयों, पकवानों, शर्बतों और इत्रों की सूची बनने लगी। पास पड़ोस के वे लोग भी शादी के प्रबंध में सलाह देने और सहायता करने आने लगे, जो कल तक मीरअली को धेले भर इज़्ज़त नहीं देते थे- उनकी निगाह में वह अब मियाँ मीरअली हो गये थे। मीरअली की ख़ुद की और उनके बेटों की निगाह में रज़िया की इज़्ज़त बहुत बढ़ गई थी और अब वह अपने को उसका ख़ास होना दिखाने में एक दूसरे से होड़ ले रहे थे।

इस बीच ताल्लुक़ेदार साहब के गुमाश्ते बीच-बीच में मीरअली के घर आते और मीरअली से पूछकर आवश्यकतानुसार रुपया और मदिरा मीरअली को दे जाते थे। बाहर से देखने में मीरअली का सारा घर मगन था, पर यह सारी गहमागहमी, गुमाश्तों के चक्कर और पड़ोसियों की इज़्ज़तभरी निगाहें रज़िया को ऐसे लगतीं थीं जैसे बलि देने से पहले बकरी के समक्ष सुस्वादु भोजन परोसे जा रहे हों। रज़िया के मन में विद्रोह का तूफ़ान उठता था, पर फिर अपनी बेबसी का ध्यान कर अश्रुभरी सिसकन के रूप में फूट पड़ता था। विवाह के विषय में उससे पूछने की बात भी किसी के मन में नहीं आई थी- और आती भी किसलिये जब रज़िया की सहमति का न तो कोई मूल्य था और न ही कोई यह सोच सकता था कि इतने बड़े खानदान में विवाह के प्रस्ताव पर रज़िया को कोई आपत्ति हो सकती है? रज़िया स्वयं भी नहीं जानती थी कि अगर कोई कुछ पूछता भी तो वह क्या कहती और किस आशा के सहारे कुछ कहती? उसके जीवन में तो बस एक ही आया था मोहित, और वह उसका मन मोहित कर न जाने कहाँ अंतर्धान हो गया था? कभी-कभी वह यह कल्पना अवश्य करती थी कि मोहित अकस्मात आ जायेगा और वह अपने मन की समस्त व्यथा और उलाहना उसे समर्पित कर अपना मन हल्का कर लेगी और उसके प्रेम की शीतल छाया में गहरी नींद सो जायेगी। पर न मोहित आ रहा था और न उसके आने की कोई ख़बर मिल रही थी। रज़िया को कहीं कोई प्रकाश की किरण नहीं दिखाई दे रही थी- उसके सामने थी बस अंधकार की एक अंतहीन सुरंग। इस सुरंग से उसे बाहर निकालने वाला बिना बताये ही कहीं चला गया था और अंधकार में स्वयं मार्ग ढूँढ लेने की क्षमता रज़िया में जन्मजात नहीं थी। वह मन ही मन अल्लाह से रहम की भीख माँगती और दुआ करती कि मोहित को भेजकर उसे मुक्ति दिला दे और कभी-कभी वह स्वप्न में देखती कि मोहित मुस्कराता हुआ आ रहा है और उसे अपने में छिपा लेने हेतु अपनी ओर बुला रहा है।

पर सपने सपने होते हैं- प्यार भरे और मीठे, परंतु वास्तविकता प्रायः कठोर एवं निर्मम होती है। रज़िया के सपनों का राजकुमार तो नहीं आया, वरन् सातवें दिन सायंकाल हाथी, घोड़ों और कारों पर सवार एक लम्बी सी बारात लेकर ताल्लुक़ेदार साहब रज़िया को ब्याहने आ गये थे। अब तक रज़िया का मन इतना त्रसित और निराश हो चुका था कि वह बुझे हुए शोले के समान हो गया था और रज़िया मूर्तिवत हो गई थी। फिर वह यंत्रवत वह सब करती रही थी जो उससे करने को कहा गया था। काज़ी साहब ने जब उससे पूछा था,

"रज़िया बानों! क्या दस हज़ार रुपये के मेहर पर जनाब सलाहुद्दीन वल्द अलाउद्दीन साहब से निक़ाह कुबूल है?", तब उसके मुँह से एक शब्द भी नहीं निकला था, परंतु उसकी प्रतीक्षा किये बग़ैर ही उसके भाई लोग, अब्बा और पड़ोसिनें "मुबारक हो, मुबारक हो" बोल पड़े थे और क़ाज़ी साहब ने मुस्कराकर अनुमोदन कर दिया था। फिर हर कोई रज़िया को मुबारकबादी देने को बेताब हो उठा था, और हर मुबारक पर रज़िया को ऐसे लगता था जैसे उसे बेहोशी की दवा खिलाने के बाद हथौड़े से कूटा जा रहा हो। जब रुख़सती के वक्त रज़िया की आँखों से एक भी आँसू नहीं निकला, तो दिलजली पड़ोसिनें आपस में धीरे से बोल पड़ीं थीं,

"हाय, ऐसी क्या ख़ुशी कि दिखावे के लिये भी टेसुए नहीं बहा सकती है?"

बाजे-गाजे के साथ रज़िया की पालकी जब ताल्लुक़ेदार साहब के दरवाज़े पर पहुँची तो वहाँ स्वागत के लिये टोले, मुहल्लेवालों का हुजूम लगा हुआ था। अंदर हवेली औरतों से ठसाठस भरी हुई थी जिनमें ताल्लुक़ेदार साहब की दूसरी बेगम भी शामिल थीं। यद्यपि उनके सीने में आग धधक रही थी पर चेहरे पर दिखावटी मुस्कान क़ायम थी और मुँह दिखाई की रस्म अदा करते समय उन्होंने भी औरों की हाँ में हाँ मिलाई थी कि छोटी बेगम का मुखड़ा चाँद जैसा है। देर रात तक रस्मो-रिवाज़ निभाये जाते रहे थे और हँसी-ठिठोली होती रही थी, पर रज़िया ऐसी विस्मृति की दशा में थी कि उसे जैसे अपनी अवस्था का भान ही नहीं था। उसके ज्ञानतंतु तब जाग्रत हुए थे जब कुछ लड़कियों ने उसे सुहागरात के लिये फूलों से सजे और इत्र-फुलेल से गमकते हुए एक कमरे में पहुँचा दिया था और खिलखिलाकर हँसते हुए दरवाज़ा बंदकर चलीं गईं थीं।

कमरे के अंदर का दृश्य जितना भव्य था, रज़िया के लिये उतना ही भयजनक था। कमरा इतना बड़ा था कि उसमें रज़िया के घर का कमरा, बरामदा और आँगन तीनों समा जायें, उसकी ऊँचाई रज़िया के घर के कमरों की ऊँचाई की दोगुनी से भी अधिक थी। मोज़ेक के फ़र्श पर बने लाल हरे रंग के बेल-बूटे, चारों दीवालों में लगे आदमक़द शीशे, खिड़कियों और दरवाज़ों पर टँगे भारी मखमली परदे और बीच में दैत्य सम पड़ा विशालकाय पलंग अपने आकार के अनुपात में रज़िया को अपनी अकिंचन एवं असहाय स्थिति का गहराई से भान करा रहे थे। घबराहट में उसके हृदय की गति अनियंत्रित हो रही थी। अपनी निरीहता की इस चरमावस्था में भी रज़िया का मन मोहित द्वारा उसे उबार लेने की आशा को तिलांजलि नहीं दे पा रहा था। तभी सुहाग-सेज पर उसकी दृष्टि पुनः पड़ी और उसका काल्पनिक विश्वास भी तिरोहित होने लगा। वह भयाक्रांत हो पलंग से दूर दीवाल की ओर हटने लगी और वहाँ रखे सोफे़ से टकराकर उस पर गिर गई। भय एवं निराशा का आधिक्य जब असहनीय होने लगता है तो मन की रक्षाप्रणाली मनुष्य को मूर्छावस्था की ओर ले जाती है- रज़िया की आँखें बंद हो गईं और वह अर्धमूर्छित सी हो गई। कुछ देर के उपरांत वह उसी अवस्था में दिवास्वप्न देखने लगीः उसे लगा कि वह अपने घर में असहनीय ग्रीष्म से त्रस्त हो रही है कि तभी घनघोर घटायें उमड़ आतीं हैं और पहले रिमझिम रिमझिम तथा कुछ देर में मूसलाधार बरसने लगतीं हैं। वह बारिश में नहाने को उतावली होकर बाहर ताल की ओर दौड़ पड़ती है। वहाँ जामुन के पेड़ के नीचे मोहित खड़ा है और रज़िया को देखकर प्रसन्नता से बाँहें फैला देता है और रज़िया दौड़कर उनमें समा जाती हैं। मोहित की बाँहों का अवगुंठन उसके मन का समस्त ताप हर लेता है और तब रज़िया उससे शिकायत करती है,

"मोहित तुम अब तक क्यों नहीं आये थे? ......अब मुझे छोड़कर कहीं नहीं जाना।"

पर तभी आकाश में "तड़-तड़, तड़-तड़, तड़ाक-तड़ाक........." बिजली के कड़कने से वह भयभीत हरिणी सी जाग गई थी और बाहर से आने वाली रिमझिम की ध्वनि से उसने जाना कि सचमुच वर्षा हो रही है। वह उठकर एक खिड़की का पर्दा खींचकर बाहर निहारने लगी थी कि तभी पीछे से उसके पास आकर सलाहुद्दीन उसे बाँहों में भरकर अपनी छाती में ऐसे कसने लगे थे कि उसकी साँस ही रुकने लगी थी। रज़िया की साँस सलाहुद्दीन के मुँह से आने वाली भभक से भी रुक रही थी। वह इस भभक से परिचित थी क्योंकि इस प्रकार की भभक उसके अब्बा के मुँह से प्रायः आती रहती थी। रज़िया इस भभक से बचपन से ही घृणा करती थी क्योंकि जब यह भभक उसके अब्बा के मुँह से आती थी, तभी वह उसकी अम्मी और उसके प्रति अधिक निर्दयता का व्यवहार करते थे। रज़िया को लगा कि वह उसके अब्बा के समान एक निर्दयी शराबी के जाल में फँसी हुई है। अनायास ही रज़िया उस जाल से निकलने का प्रयत्न करने लगी थी, परंतु नारी की कोमल भावनाओं से पूर्णतः निर्लिप्त एवं रज़िया की मनःस्थिति से अनजान ताल्लुक़ेदार साहब ने उसे अपनी बाँहों में उठाकर पलंग पर गिरा दिया था। उसके पलंग पर गिरते ही शराब के नशे में धुत ताल्लुक़ेदार ने उसके कपड़े फाडकर उतार फेंके थे और फिर उस पर जुट पड़े थे। आक्रमण की आकस्मिकता, भयावहता, एवं जंगलीपन से नोंचे-खसोटे जाने से उत्पन्न पीड़ा एवं ग्लानि असह्य हो जाने पर रज़िया सचमुच मूर्छित हो गई थी।
बड़ी देर बाद रज़िया की पलकों में हलका सा कम्पन हुआ था, परंतु उनको उठाने में भी उसे असह्य पीड़ा हुई और वे पुनः मुंद गईं थीं। फिर धीरे-धीरे प्रयास कर रज़िया ने पलकें खोलीं और उसके होठों से अनायास निकला,

"हाय अम्मी!"

अपने चारों ओर देखने पर पहले उसे लगा कि वह किसी अनजान स्थान पर है, पर फिर उसका परिस्थिति-ज्ञान उभरने लगा था। उसने देखा कि उसके बगल में ताल्लुक़ेदार साहब गहरी नींद में खर्राटे ले रहे थे, उसके स्वयं के कपड़े फटे हुए थे, और उसका नग्न वक्ष दीवालों में लगे आदमकद शीशों में उसे सरेआम नंगा कर रहा था। उनको ढकने के उद्देश्य से उसने जैसे ही उठने का प्रयास किया, तो उसे अपनी जंघाओं के मध्य में गहरी पीड़ा का आभास हुआ था। पीड़ा-स्थल को देखने के प्रयत्न में वह जैसे ही झुकी, तो पलंग पर बिछी चादर पर फैली रक्त की धार को वह भयविस्फारित नेत्रों से देखती रह गई थी। किसी प्रकार साहस कर बिना कराहे वह पलंग से चुपचाप नीचे उतरी और अपने संदूक से दूसरा सलवार कुर्ता निकालकर गुसलखाने में चली गई थी। उसने पानी से अपने को रगड़-रगड़ कर ऐसे धोना प्रारम्भ किया जैसे वह अपने शरीर में चिपकी मलिनता, पीड़ा एवं ग्लानि से मुक्ति पाने का प्रयास कर रही हो- वह तब तक अपने को धोती रही थी जब तक पानी की अंतिम बूँद भी समाप्त नहीं हो गई थी। नहाकर जब वह बाहर आयी तब उसे भान हुआ कि वह अपने जीवन में बहुत कुछ खो चुकी थी- अपना कौमार्य, अपना सम्मान और अपना मोहित। उसे लगा कि वह जीने की इच्छा भी खो चुकी थी, परंतु तुरंत कुछ कर गुज़रने हेतु न तो साधन उपलब्ध थे और न साहस था।

उसने अपनी अम्मी को अब्बा के अत्याचार सहते देखा था, उन्हें अपने भाग्य को कोसते भी सुना था और वह समझ गई थी कि अब उसका भविष्य भी उसकी अम्मी के जीवन जैसा ही है- बिना विरोध दर्शाये आततायी के अत्याचार सहते रहना और तिल-तिल मरना। वह जानती थी कि अत्याचारों के खुले विरोध की क्षमता उसमें नहीं है परंतु फिर भी अपने को उस प्रकार के जीवन में ढाल लेना उसकी प्रकृति में नहीं था।

उस समय सलाहुद्दीन का सामना होने से बचने के लिये वह चुपचाप दरवाज़ा खोलकर बाहर चली गई थी।



- क्रमशः


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