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ISSN 2292-9754

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05.06.2016


भीगे पंख
मोहित और रज़िया /तीन/

तभी हरहरमहादेव और अल्लाहोअकबर के उद्घोष से आकाश कम्पायमान होने लगा। क़स्बे की घनी आबादी की छतों से हो-हल्ला, शोर-शराबा, और फ़ायरिंग की आवाज़ें आने लगीं। क़स्बे के निवासियों के दिलों में जितना भय व्याप्त हो रहा था, वे उतना ही अधिक ज़ोर से चिल्ला रहे थे। कहीं-कहीं आग की लपटें उठने लगीं थीं जो रात्रिकालीन अंधकार में किसी राक्षस की लपलपाती जिह्वा सी दिखाई देतीं थीं। रज़िया की अम्मी के कंठ से रुक-रुककर सिसकियाँ निकल रहीं थीं जो बाहर से उठने वाले कोलाहल में डूब जातीं थीं। आज रज़िया के अलावा एक व्यक्ति और इन सिसकियों को सुन रहा था और वह था रज़िया का अब्बा। सुल्तान की सलामती के लिये आज वह भी दुआ कर रहा था।

रज़िया सब कुछ देखसुन रही थी और भयाक्रांत हो रही थी, पर द्रुतगति से घटित होने वाली घटनाओं का कारण, व्यापकता और परिणाम को ठीक से समझ नहीं पा रही थी। अम्मी और अब्बा को सुल्तान की सलामती के लिये दुआ करते देख उसके मन में भाँति-भाँति की आशंकायें उठ रहीं थीं। यद्यपि सुल्तान का रज़िया के जीवन से सम्बंध मुख्यतः अपने काम करवाने तथा गाली-गलौज और धौल-धप्पा करने मात्र का था, तथापि रज़िया के नेत्र सुल्तान के लिये बार-बार गीले हो जाते थे। कल सबेरे ही जब रज़िया को सुल्तान का खाना लगाने में देर हो गई थी तो उसने रज़िया की चोटी खींचते हुए उसे धमकाया था,

"उठती है फ़ुर्ती से या चपत खाने का मन है?"

आज रज़िया उसी भाई के लिये अल्लाहताला से मन ही मन इल्तिजा कर रही थी,

"या अल्लाह! मेरे भाई के सब क़सूर माफ़ कर उसे सही सलामत घर पर वापस भेज दे।"

रज़िया के मन में एक और आशंका उठ रही थी कि इस मारकाट के माहौल में मोहित और उसकी माँ कैसे आयेंगे। इस आशंका, अवसाद और निराशापूर्ण वातावरण में जब उसके शरीर और मन थककर क्लांत हो गये, तब उसकी आँख लग गई। उसे पता नहीं कि वह कितनी देर सोई होगी जब अचानक आँगन के दरवाज़े की ज़ंजीर की खटखट सुनकर उसकी आँख खुल गई। उसके अब्बा भी जाग गये और जब रज़िया उठकर दरवाज़ा खोलने चली, तो बोले थे,

"रुक रज़िया।"

रज़िया ठिठक गई। वह समझी थी कि सुल्तान भाईजान आये होंगे, पर बाहर से भाईजान की आवाज़ की जगह फिर कुंडी ज़ोर से खटखटाने की कर्कश ध्वनि आई। तब रज़िया के अब्बा ने अपनी घबराहट पर नियंत्रण कर पूछा,

"कौन है?"

"अबे हम थाने से आये हैं। दरवाज़ा खोलता है कि तोड़ दूँ।"

मीरअली अचानक पुलिस के आ जाने से किसी विपत्ति की आशंका से घबरा गया था और उसने साँकल अंदर से खोल दी थी। तभी तीन पुलिस वाले एकदम घर में घुस आये थे और पूछने लगे थे,

"सुल्तान कहाँ है?"

मीरअली ने कहा,

"क्या बात है? वह तो कल शाम से घर पर नहीं आया है।"

पुलिसवाले बिना पूरी बात सुने घर की तलाशी लेने लगे थे। सुल्तान के न मिलने पर यह हिदायत देकर चले गये थे कि सुल्तान आये तो तुरंत उन्हें ख़बर की जाये। कारण पूछने पर बस इतना कहा कि साला बड़ा जिहादी बनता है। इसके बाद घर में कोई नहीं सो सका और क़स्बे में दीवाली की रात की तरह गोली और बम्ब चलते रहे। फिर लाउडस्पीकर पर घोषणा होती सुनाई दी,

"क़स्बे में कर्फ्यू आर्डर लग गया है। सब लोग अपने अपने घरों में रहें। बाहर घूमते हुए पाये जाने पर गिरफ़्तार कर लिया जायेगा और दंगाइयों को गोली मार दी जायेगी।"

घोषणा का एक-एक शब्द रज़िया के हृदय में बर्छी सा चुभ रहा था।

सबेरा होते होते ज़िला मुख्यालय से अतिरिक्त पुलिस आ गई थी और कर्फ़्यू का सख़्ती से पालन कराने लगी थी। इससे क़स्बे में शांति तो हो गई थी, परंतु यह शांति उस कब्रिस्तान की शांति के समान थी जहाँ रात भर भूतों का नंगा ताण्डव होता रहा हो और दिन होते-होते भूत अपनी कब्रों में घुस गये हों। क़स्बे में अनेक व्यक्ति मारे जा चुके थे और घायल थे और अनेक दूकानों और मकानों को लूटा या जलाया जा चुका था। पुलिस मुर्दों का पोस्टमार्टम कराने, लाशों को घरवालों को सौंपने और घायलों को अस्पताल पहुँचाने में लगी हुई थी।

सुल्तान अभी तक नहीं लौटा था और रज़िया व उसके घरवाले उसकी प्रतीक्षा में साँस साधे बैठै हुए थे। सबकी अवज्ञा कर धमा-चौकड़ी मचाने वाले रज़िया के भाई भी आज एक दूसरे की ओर आशंकित नेत्रों से निहार रहे थे। करीब चार बजे शाम पुलिस की एक जीप रज़िया के दरवाज़े पर आकर रुकी और उन्होंने मकान का दरवाज़ा खुलवाया। पुलिस के दरोगा ने मीरअली को देखकर कहा,

"अफ़सोस है मियाँ कि तुम्हारा लड़का रात में दंगे में मारा गया है। आज सबेरे हिंदुओं के मुहल्ले की एक गली में उसकी लाश पड़ी मिली है। वहाँ रहने वाले लोगों ने बताया है कि यह कुछ दूसरे लड़कों के साथ एक हिंदू लड़के पर छूरी से हमला करने जा रहा था कि उसकी गुहार सुनकर आसपास के मकानों से लड़कों ने निकलकर उन पर हमला कर दिया। इसके दूसरे साथी तो भाग निकले लेकिन यह पकड़ में आ गया। भीड़ ने गु़स्से में इसके चेहरे को इतना कुचल दिया था कि पहिचानना मुश्किल था और इसको पोस्टमार्टम के बाद लावारिस समझकर जला दिया जाता लेकिन अस्पताल के नर्सिंग अर्दली इस्माइल ने इसके कपड़े देखकर पहिचान लिया कि यह आप का लड़का सुल्तान है। कर्फ़्यू के दौरान लाश को दफ़नाने के लिये चार आदमियों को इजाज़त का रुक्का मैं लिखे देता हूँ। इससे ज़्यादा मत जाना और अँधेरा होने से पहले ही दफ़ना देना।"

व्यस्त पुलिस वालों ने लाश जीप से उतारकर दरवाज़े पर रख दी और अन्य जगह ड्यूटी पर चल दिये।

रज़िया की अम्मी को छोड़कर सभी घरवाले दरवाज़े पर जमा हो चुके थे और धीरे-धीरे उनके मानस में घटना की गम्भीरता का भाव समा रहा था। सुलतान की मृत्यु का अवसाद घर की हवा में तैरने लगा था और उसकी माँ के कमरे में भी पहुँच रहा था। अनहोनी की आशंका से वह किसी प्रकार अपनी बंसखटी से उठकर दरवाज़े तक आ गई थीं और रोने के पहले ही उनकी घिग्घी बँध गई थी। रज़िया अपने भाईजान के शरीर को छूकर विलाप कर रही थी और अम्मी मूर्छित होकर अपनी जगह ही ढेर हो रहीं थीं। पड़ोसी आ आकर मीरअली को सांत्वना दे रहे थे। जब स्थिति कुछ सहज हुई तो रमज़ानी चाचा बोले,

"अब जल्दी से दिन डूबने से पहले ही दफ़नाने का इंतज़ाम करो।"

जब सुल्तान की अर्थी उठाकर ले जाई जा रही थी, उसकी माँ की आँखें एक पल को खुलीं जैसे वे अपने बेटे को अंतिम बार जी भरकर देख लेना चाहतीं हों। अर्थी के जाने के बाद रज़िया और उसके भाई माँ को उठाकर चारपाई पर ले आये। उसके पश्चात वह चेतना और मूर्छा की अवस्था के बीच झूलतीं रहीं और रज़िया उनके सिरहाने बैठकर अल्लाह से उनके जीवन की भीख माँगती रही। रज़िया बीच-बीच में सुल्तान के लिये भी मुँह फाड़ कर रो पड़ती थी क्योंकि उसके द्वारा सताये जाने की दैनिक घटनाओं की उसे रह-रहकर याद आ जाती थी। इस संसार की यह अनोखी विडम्बना है कि हमें अपने को प्यार करने वालों के बजाय त्रसित करने वाले अधिक याद आते हैं- जीवन में भी और मृत्योपरांत भी।

 

दूसरे दिन कर्फ़्यू तीन घंटे को खुलने का ऐलान हुआ। रज़िया को इस बीच मोहित के घर जाकर उससे मिलने और उसका हाल जानने की बड़ी ललक हुई, पर वह गई नहीं क्योंकि एक तो अम्मी की देखभाल के लिये उसका घर में रहना ज़रूरी था और दूसरे वह बीते दिनों की घटनाओं को देखकर समझ चुकी थी कि उसे किसी हिंदू के यहाँ जाने की अनुमति मिलने का सवाल ही नहीं था। रज़िया के मन में एक आशा अवश्य उठती थी कि मोहित अगर आ गया होगा, तो उससे मिलने अवश्य आयेगा। पर उन तीन घंटों में न तो रज़िया मोहित के पास जा सकी और न मोहित ही आया। हाँ, कुछ पड़ोसी मुसलमान मातमपुर्सी के लिये ज़रूर आये थे। इनमें मकतब के मौलवी साहब और सुल्तान के कुछ साथी भी थे, जिन्हें देखकर रज़िया का खू़न खौल गया था क्योंकि वह जानती थी कि इन्हींने भाईजान को काफ़िरों का सफ़ाया करने को उकसाया होगा और जज़्बाती होने के कारण भाईजान इनके बहकावे में आ गये होंगे। दंगे की रात हिंदुओं के बीच घिर जाने पर ये चालाक साथी भाग लिये होंगे और अकेले भाईजान अपनी जान पर खेल गये होंगे। पर वह अपना आक्रोश अपने मन में दबाकर रह गई थी- उसे व्यक्त करने का साहस नहीं कर सकी थी।

अगले दिन फिर तीन घंटे के लिये दोपहर में कर्फ़्यू खुला। कर्फ़्यू खुलने की घोषणा होते ही रज़िया ने मोहित के आने की आशा में पलक-पाँवड़े बिछा दिये, पर आज भी न तो मोहित आया और न उसकी कोई ख़बर मिली। उसी रात में रज़िया की माँ के दिल में ज़ोर का दर्द उठा था और उनकी छटपटाहट सुनकर उसके अब्बा भी जाग गये थे, परंतु इतना कहकर उन्होंने करवट बदल ली थी,

"थोड़ा बरदाश्त करो। ऐसे में क्या किया जा सकता है- कहीं कोई डाक्टर हकीम भी नहीं मिलेगा।"
रज़िया की माँ ने उनकी ओर ऐसी निगाह से देखा था जैसे उलाहना दे रही हो कि इससे ज़्यादा आप से अपेक्षा भी क्या की जा सकती है। फिर बड़ा प्रयत्न कर रज़िया का हाथ अपने हाथ में लेकर -रे फुसफुसाने लगी थी,

"रज़िया, मैं अब जा रहीं हूँ।"

आज अंतिम समय में उनके हृदय में वर्षों से संचित पीड़ा बाहर फूट निकली थी और अपने पति की ओर देखकर आगे बोलने लगीं थीं,

"बेटी! मज़हब नहीं इंसान अच्छा या बुरा होता है। मज़हब से कोई काफ़िर नहीं होता है, इंसानियत न होने से... "

और तभी रज़िया की माँ की आवाज़ सदैव के लिये शून्य में खो गई थी।

 

माँ की मृत्यु से रज़िया के हृदय को बड़ा आघात लगा। समस्त घरवालों में अकेली रज़िया ही उनके लिये हृदय की गहराइयों से रोई थी। शेष घरवालों के मन में यदि क्षणिक दुख उभरा भी, तो तुरंत बाद यह भाव आ गया कि चलो छुट्टी मिली- उनके लिये तो वह न काम की थीं न काज कीं। उस घर में रज़िया का एकमात्र सम्बल माँ ही थीं और वह भी उसे सदैव के लिये छोड़ गईं थीं- रज़िया के लिये वह घर एकदम पराया हो गया था। अगले दिन सबेरे ही कर्फ़्यू उठा लिये जाने का ऐलान हो गया। रज़िया की माँ को सादे ढंग से दफ़ना दिया गया। उसकी मय्यत में घरवालों के अतिरिक्त बस रमज़ानी चाचा ही गये। समाज में केवल उस पत्नी को मान दिया जाता है, जिसका पति उसको मान देता हो। सब जानते थे कि रज़िया की माँ का ख़ाबिंद उसकी परवाह नहीं करता है, इसलिये एक-दो औरतों को छोड़कर किसी ने मातमपुर्सी के लिये भी आना आवश्यक नहीं समझा।

अगले दिन दोपहर होते-होते रज़िया के अब्बा और भाई लोग इतने दिन से दबाये हुए अपने अपने शौकों को पूरा करने के लिये निकल पड़े थे। अम्मी के बिना रज़िया को वह घर काटने को दौड़ने लगा और वह भी घर से निकलकर चुपचाप मोहित की मौसी के घर को चल दी। हाँ, आज उसके क़दम उस सहजता से चाची के घर के लिये नहीं उठ रहे थे, जिस सहजता से पहले उठा करते थे- एक तो मोहित के उसके घर न आने से उसके मन में मोहित के विषय में भाँति-भाँति की शंकायें उठ रहीं थीं और हिंदू-मुसलमानों के बीच हुई मार-काट ने उसके शंकालु मन ने चाची के घर में अपनी स्थिति के विषय में भी शंका उत्पन्न कर दी थी।

"अरे रज़िया!"- जैसे ही रज़िया आँगन के दरवाज़े का पल्ला हटाकर झाँकी थी, मोहित ने उसे देख लिया था और उसकी ओर दौड़ पड़ा था। एक बार तो उसकी इच्छा तीव्रता से हुई कि रज़िया को बाँहों में भर ले, परंतु साहस न कर सका था; वरन् अपने अनियंत्रित उछाह प्रदर्शन पर वह लजा सा गया था। मोहित को देखकर रज़िया के नेत्र भावातिरेक से छलछलाने लगे थे परंतु उसके मुँह से कोई शब्द नहीं निकल रहे थे।

"रज़िया, आओ बैठो,"- तभी मौसी ने रज़िया को देखकर पुकारा था और रज़िया और मोहित दोनों उनके पास आकर बैठ गये थे। मोहित की अम्मा भी पास में चारपाई पर बैठीं थीं। रज़िया ने उन्हें आदाब किया तो वह कुछ बोलीं नहीं थीं, बस पहिचान का भाव उनके चेहरे पर परिलक्षित हुआ था।

"कर्फ़्यू ने तो तुम्हारा आना ही बंद कर दिया था। कितने दिन हो गये तुम्हें देखे,"- मौसी के ममता भरे शब्द सुनकर रज़िया के अश्रु अनवरत बह पड़े। शांत होने पर वह बोली,

"चाची, कर्फ़्यू के दौरान मेरे बड़े भाईजान मारे गये और उनके सदमें में मेरी अम्मी भी नहीं रहीं।"

यह सुनकर मोहित सन्न रह गया था। रज़िया के भाई सुल्तान की किसी हिंदू पर हमला करते हुए मारे जाने की बात मौसी ने अपने पति से सुन रखी थी। सुल्तान के आवारा और अपराधी होने की बात भी उन्हें मालूम थी। उन्होंने मोहित को यह बात जान-बूझकर नहीं बताई थी। रज़िया की अम्मी की मौत की ख़बर उन्हें अभी तक नहीं मिली थीं। रज़िया की अम्मी की सामाजिक स्थिति अत्यंत तुच्छ थी और उसी अनुपात में उनकी मौत समाज के लिये अत्यंत तुच्छ ख़बर थी। मौसी जानतीं थीं कि रज़िया के लिये उसके घर में उसकी अम्मी ही एक-मात्र सहारा थीं, अतः उनकी मौत की ख़बर पाकर मौसी को रज़िया पर बड़ा तरस आया था। उन्होंने रज़िया के कंधे पर हाथ रखकर उसे अपने पास खींच लिया। मन की प्रवृत्ति है कि आसरा पाकर अपने दुख को व्यक्त करने को व्याकुल हो जाता है अतः रज़िया की सिसकियाँ और तेज़ हो गईं थीं।

रज़िया के भाई और अम्मी की मृत्यु का समाचार जानकर मोहित की अम्मा के मन में भी रज़िया के लिये संवेदना जागृत हुई थी और उनकी आँखें भी छलछला आईं थीं। मोहित तो इतना आहत हुआ कि कुछ बोल न सका- बस अपने आँसू रोकने का असफल प्रयत्न करता रहा।

 

"मोहित, तुम कब आये?"- सहज होने पर रज़िया ने पूछा।

रज़िया के दुख की बात जानकर मोहित की अम्मा रज़िया के प्रति नरम हो गईं थीं। अतः मोहित के बोलने के पूर्व ही कहने लगीं,

"हम तौ सुक्कुर कौं चल दये हते और सनीचर की सबेरें अट्टेसन पै आय गये हते। हमैं का पता हतो कि हिंयाँ हिंदू और मुसलमानन में मारकाट हुइ रही है। अगर अट्टेसन सै पुलिस बाले हमैं हिंयाँ न पहंुचाय देते, तौ भगवानई मालिक हतो। / हम तो शुक्र को चल दिये थे और शनिश्चर की सुबह स्टेशन पर आ गये थे। हमें क्या पता था कि यहाँ हिंदुओं और मुसलमानों में मारकाट हो रही है। यदि स्टेशन से पुलिस वाले हमें यहाँ न पहुँचा देते तो भगवान ही मालिक था।"

फिर कुछ रुककर कहने लगीं, "ऐसे मैं हम जांदां दिन हिंयाँ नाईं रहिययैं; हम जल्दियईं लौट जययैं। /ऐसे में हम अधिक दिन यहाँ नहीं रुकेंगे, जल्दी ही वापस चले जायेंगे।"

मोहित की अम्मा का यह वाक्य रज़िया के हृदय में नश्तर सा चुभ रहा था। फिर कुछ चिंतित होकर वह मोहित की मौसी से बोली थी,

"चाची, अभी तो मैं चलूँगी, पता नहीं कब कोई घर पर आ जाये," फिर मोहित की ओर देखते हुए उसने कहा, "तुम्हें फुर्सत हो तो आ जाना।"

इस पर मोहित की माँ घबराकर बोल पड़ीं थीं,

"बिटिया, मोहित कौं तुम्हाई ओर भिजबे मैं हमैं डर लगत है। चाहौ तौ तुम्हई आय जइयौ। / मोहित को तुम्हारी ओर भेजने में मुझे डर लगता है। चाहो तो तुम्हीं आ जाना।"

उनकी चिंता आधारहीन नहीं थी- जिस घर का जवान लड़का हिंदुओं द्वारा मारा गया हो, उसके घरवालों का खून खौलना नामुमकिन नहीं था।

रज़िया को भेजने मोहित अपने दरवाज़े तक आया, परंतु उसके जाते समय कुछ बोला नहीं, बस उसे जाते हुए देखता रहा। इस साम्प्रदायिक दंगे में घटित विस्फोटक घटनाओं ने उन दोनों के बीच आज ऐसी रेखा खींची हुई थी कि अदम्य चाह होते हुए भी वे विगत वर्षों की भाँति उन्मुक्त एवं सहज नहीं हो पा रहे थे। इसके अतिरिक्त बढ़ती आयु के कारण उन दोनों के मन में उत्पन्न "दिल की शिकायत ओर नज़र के शिकवे" भी एक अनांमंत्रित सीमा रेखा खींच रहे थे।

फ़तेहपुर के लिये आते समय ट्रेन में मोहित लगातार सोचता रहा था कि वह रज़िया से क्या-क्या बातें करेगा, तालाब के किनारे उसके साथ कौन-कौन से खेल खेलेगा। पर फ़तेहपुर स्टेशन पर ट्रेन से उतरने पर उसका जिस अफ़रा-तफ़री के माहौल से सामना हुआ, उससे उसकी चाहत और योजनायें गड्डमड्ड हो गये थे। घर आने पर कर्फ़्यू के कारण उसके घर से बाहर निकलने पर पाबंदी लगा दी गई थी। रोज़-रोज़ यह क़िस्से सुनकर कि कैसे हिंदू और मुसलमान एक दूसरे के खू़न के प्यासे हो गये थे, उसकी माँ ने उसे सख़्त मनाही कर दी थी कि इस बार वह किसी मुसलमान के घर झाँकेगा भी नहीं। सुल्तान के हिंदुओं द्वारा मारे जाने का समाचार जानकर उसकी मौसी ने भी इस बात में उसकी माँ का समर्थन किया था। 

रज़िया को मोहित की मौसी के घर की तरफ़ से आते हुए उसके भाई मुन्ना ने देख लिया था और उसकी जमकर धुनाई की थी। इस पर रज़िया ने न तो कोई प्रतिरोध किया था और न रोई थी, बस एक ठूँठ की तरह मार सहती रही थी। इस पर मुन्ना का क्रोध और भड़क उठा था और वह दहाड़ा था,

"काफ़िरों ने हमारे भाई को बेरहमी से कुचल-कुचलकर मार डाला और तू अभी भी उनकी सगी बन रही है?"

रज़िया फिर भी चुप रही थी- वह जानती थी कि वह न तो मुन्ना को अपनी बात समझा सकती है और न स्वयं को मोहित से मिलने को रोक सकती है।

लगभग एक सप्ताह बीत रहा था और रज़िया को मोहित के घर जाने का कोई अवसर नहीं मिल पाया था। रज़िया मोहित से मिलने को छटपटा रही थी और उसे यह आशंका भी थी कि कहीं मोहित जल्दी वापस न चला जाये। मोहित भी रज़िया के घर नहीं आ पाया था। अम्मी की मौत के बाद आज पहली बार वह मकतब गई थी। वहाँ से छुट्टी होने पर वह दीवानी मीरा सी अपने घर के बजाय मोहित की मौसी के घर को चल दी थी। उसके घर में घुसते ही मौसी प्रसन्न होकर बोल पड़ीं थीं,

"अरी रज़िया, तू खूब वक्त से आ गई । मोहित और दीदी आज जाने को तैयार हैं।"

यह सुनकर रज़िया का चेहरा एकदम फक पड़ गया, जिसे देखकर मौसी आगे बोलीं, "मैंने तो बहुत रोका, लेकिन दीदी मानती ही नहीं हैं।"

तब मोहित भी अंदर से वहीं आ गया। मोहित को जाने को तैयार देखकर रज़िया का गला भर आया। उसके मुँह से बस इतना ही निकला,

"इतनी जल्दी जा रहे हो?"

मोहित भी केवल एक शब्द "हाँ" अपने मुख से बोल सका, बस अतृप्त नज़रों से रज़िया को देखता रह गया। जब रज़िया के लिये मोहित की उन निगाहों को देखना असह्य हो गया, तो वह मोहित की माँ को टीन के बक्से में कपड़े रखते हुए, अखबार में पूड़ियाँ और अचार लपेटते हुए और मौसी से गले मिलते हुए देखती रही। परंतु उसका मन मोहित के साथ के इन मूल्यवान क्षणों को अपने मन में ऐसे संजोता रहा जैसे कोई कृपण अपना धन तिजोरी में संजोता है। समय ने किसका साथ दिया है- वह तो निःस्पृह-निष्काम भाव से समान गति से प्रवाहित होता रहता है चाहे कोई आँसू बहाये या मुस्कराये। कुछ ही अंतराल में वह निष्ठुर क्षण आ पहुँचा जब मोहित रज़िया की आँखों से ओझल हो गया- रज़िया के जीवन में एक अमिट अतृप्ति भरकर।

अगले वर्ष गर्मी की छुट्टियों में मोहित मौसी के घर नहीं आया- छुट्टियों के बाद उसे गाँव से दूर इंटर कालेज में भर्ती करा दिया गया था। उसके आगे के वर्षों में भी मोहित नहीं आ सका था।



- क्रमशः


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