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ISSN 2292-9754

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04.26.2016


भीगे पंख
मोहित और रज़िया /दो/

ट्रेन के थर्ड क्लास के डिब्बे में उस समय अधिक भीड़ नहीं थी और मेाहित खिड़की के किनारे की ख़ाली सीट पर बैठ गया था। मोहित का ट्रेन का यह दूसरा सफ़र था- पहली बार वह आते समय ट्रेन पर बैठा था और आज जाते समय। शैशवकाल से ही ट्रेन और उसमें यात्रा की सुखद कल्पना मोहित के मानस में घर किये हुई थी; मानिकपुर की उसकी हवेली की छत पर यदा-कदा रात्रि की नीरवता में दूर जाती ट्रेन की धुकधुक एवं लम्बी सी सीटी सुनाई पड़ जाती थी अथवा गर्मियों की स्वच्छ-धवल प्रातः में उससे उठ़ता हुआ धुआँ दिखाई दे जाता था। मोहित जब उन्हें सुनता-देखता, तो उसे ट्रेन किसी परीलोक की वस्तु प्रतीत होती थी। फ़तेहपुर आते समय ट्रेन के डिब्बे में खिड़की के किनारे बैठकर चक्रवात में घूमती सी दुनिया के दृश्य भी उसे परीलोक के समान लगे थे और उन्हीं को भरपूर पुनः देख पाने की लालसा में वह आज भी शीघ्रता से किनारे की सीट पर जम गया था। गाड़ी के गति पकड़ते ही उसे सामने की सारी दुनिया पीछे भागती लगने लगी थी। फिर सुदूर क्षितिज में देखा कि अर्धवृत्ताकार क्षितिज रेखा उसके साथ-साथ आगे बढ़ रही है। इस पर मोहित को लगा कि रज़िया पता नहीं क्षितिज रेखा के उस पार उससे दूर कहाँ खड़ी होगी और पता नहीं अब उसके और रज़िया के बीच में स्थित इस क्षितिज रेखा का कभी अंत होगा भी या नहीं। भावावेग में मोहित के नेत्र नम हो रहे थे कि तभी "बेटे! ज़रा सी जगह करना।" कहकर एक दाढ़ी वाले मियाँ जी मोहित द्वारा कोई जगह बनाये जाने के पहले ही उसकी बगल में धँस गये थे, जिससे मोहित की मोहनिद्रा चरमराकर टूट गई थी। गाड़ी एक स्टेशन पर पहुँची थी और उसके रुकते ही डिब्बे में भीड़ का एक रेला आ गया था, जिसके एक अंग मियाँ जी भी थे; और मियाँ जी को मोहित ऐसा नज़र आया था कि उसकी तकलीफ़ का ख़याल किये बिना उसके बगल में धँसा जा सकता था। इससे मोहित के बैठने हेतु इतना कम स्थान बचा था कि वह कसमसा रहा था, और उसके मन में मियाँ जी पर घोर क्रोध आ रहा था, और उनका प्रतिरोध करने की तीव्र उत्कंठा हो रही थी परंतु उसके मुँह से कोई शब्द नहीं निकल रहा था। उसका क्रोध कंठ तक तो आता था परंतु एक अज्ञात भयवश मुखर होने से पहले ही कंठ में अटक जाता था। फिर उस क्रोध को व्यक्त करने की अपनी अक्षमता का भान होने पर वह क्रोध आत्मग्लानि में परिवर्तित होने लगा था।

मोहित की अम्मा जो कनखियों से यह दृश्य देख रहीं थीं, मियाँ जी का बदन मोहित से सट जाने के कारण जली भुनी जा रहीं थीं और वह मोहित से बोलीं,

"मोहित तुम हिंयाँ आय जाव। पुरी-अचार खाय लेव।/ मोहित, तुम यहाँ आ जाओ। पूड़ी अचार खा लो।"

मोहित को इस बुलावे पर लगा कि चलो यंत्रणा से छुट्टी मिली और वह "अच्छा" कहकर माँ के पास आकर बैठ गया। चलते समय मौसी ने शुद्ध घी की पूड़ी और अचार रख दिया था, जिसे माँ ने निकाला और मोहित उसे हाथ में लेकर चुपचाप खाने लगा। क्षुधातृप्ति पर मोहित का मन भी स्वस्थ हो गया और उसने माँ से पूछा,

"अम्मा कै बजे लौ घरै पहुँच जययैं? /अम्मा! कितने बजे तक घर पहुँच जायेंगे?"

"जा गाड़ी संजा लौ अछल्दा अट्टेसन पहुँचययै। फिर दुइ-तीन घंटा बैलगाड़ी लियै। घरै पहुँचत पहुँचत अधरत्ता हुइ जययै। /यह गाड़ी सायंकाल तक अछल्दा स्टेशन पहुँचेगी। फिर दो तीन घंटे बैलगाड़ी लेगी। घर पहुँचते-पहुँचते आधी रात हो जायेगी।"

अम्मा ने समय का हिसाब लगाते हुए उत्तर दिया। मोहित शारीरिक एवं मानसिक दोनों रूप से क्लांत हो रहा था- वह शांत होकर अम्मा के कंधे पर सिर रखकर सो गया। उसके स्वप्नों में सुदूर क्षितिज में खड़ी रज़िया एक क्षण को आ जाती और दूसरे क्षण अंतर्घान हो जाती। सुषुप्तावस्था में भी रज़िया के ओझल होते ही उसके मुँह से उच्छवास निकल जाती थी। शाम होने पर गाड़ी अछल्दा पहुँची, तभी मोहित की आँख खुली। वहाँ बैलगाड़ी पहले से आ चुकी थी और उन्हें लेकर अविलम्ब चल दी। मोहित को अब अपने गाँव के मित्रों और सतिया की याद आने लगी थी और उसकी कल्पना अब इतने दिनों बाद उनसे मिलने के उत्साह में उड़ने लगी थी। घंटे भर बाद मोहित पर फिर आलस्य छाने लगा और वह गाड़ी की मद्धिम गति के साथ बजतीं बैलों के गले में बंधी घंटियों की ध्वनि के साथ निद्रित होने लगा। इस अर्धनिद्रित अवस्था में मोहित का मन यदि बैलगाड़ी के पहिये की चूँ के साथ मौसी के घर और रज़िया से बिछोह की याद में दुखी हो जाता, तो चरर-मरर के साथ अपने गाँव के साथियों और सतिया से मिलने के उछाह से भर जाता। बिछोह अथवा उछाह में किसी एक भाव को चुनकर उस पर स्थिर हो जाना उसके लिये सम्भव नहीं हो पा रहा था। दृढ़विश्वास की कमी प्रायः मनुष्यों में ऐसी मनःस्थिति उत्पन्न करती है।

उसके मन में एक झुँझलाहट भी उठती थी जब उसे ध्यान आता कि अम्मा ने उससे यह झूठ बात क्यों कही थी कि मुसलसान बुरे होते हैं और कुछ भी खाने को देते समय उसमें चुपचाप थूक देते हैं। रज़िया तो बड़ी अच्छी थी और उसने उसे कुछ भी खाने-पीने को थूककर नहीं दिया था। रज़िया की अम्मी भी उसे बड़ी अच्छी लगीं थीं। फिर उसके मन में यह द्वंद्व भी उठने लगा कि सतिया भी तो अच्छी है और उसके साथ भी खेलने को उसे अनावश्यक मना किया जाता है। मोहित को चुप देखकर उसकी माँ ने पूछा,

"बेटा का सोच रहे हौ? / बेटा क्या सोच रहे हो?"

मोहित पहले तो चुप रहा पर फिर साहस जुटाकर माँ से पूछ बैठा,

"अम्मा सतिया के संग हमैं खेलन काँयें नाईं देतीं हौ? /अम्मा, सतिया के साथ मुझे खेलने क्यों नहीं देती हो?"

"बेटा बा अछूत हैं खेल-खेल में कहूँ तुम सै छू जाये तौ? /बेटा, वह अछूत है। खेल-खेल में कहीं तुमसे छू जाये तो?"

माँ ने मोहित के प्रश्न का निहितार्थ समझे बिना उत्तर दिया।

मोहित उत्तर से संतुष्ट न हुआ और माँ से पुनः प्रश्न किया,

"अम्मा बा अछूत कैसें बन गई? / अम्मा, वह अछूत कैसे बन गई?"

माँ झुंझला उठीं,

"इत्ते बड़े हुइ गये हौ, जाऊ नाईं जान्त हौ? बा भंगी की बिटिया है। /इतने बड़े हो गये हो, यह भी नहीं जानते हो? वह भंगी की बेटी है।"

माँ की झुँझलाहट भाँपकर मोहित आगे प्रश्न करने का साहस न कर सका, परंतु उसके मन में यह धारणा दृढ़ हो गई कि सतिया को अछूत मानने का कोई समुचित कारण नहीं है; यह अलग बात है कि बड़ों के विरोध के कारण वह सतिया के साथ सबके सामने न खेले कूदे।

अपने घर पहुँचने के दूसरे दिन जब सतिया अपनी माँ के साथ उसके घर आयी तो मोहित को देखकर अपने उल्लास को छिपा न सकी और उसकी आँखों में प्रसन्नता को जो भाव दीप्त हुआ, उसे मोहित के नेत्रों ने भी पढ़ लिया और उसका प्रतिदान भी किया- सतिया के मन में चंद्रमा को पकड़ने की लालसा थी तो मोहित के मन में बिखरी चाँदनी को समेटने की।



"रज़िया! इतनी देर कहाँ थी? चौका बर्तन कौन करेगा? क्या तेरा बाप?" कहते हुए रज़िया के अब्बा ने एक झन्नाटेदार तमाचा रज़िया के गाल पर मारा था। रज़िया आज सबेरे ही मोहित को विदा करने उसके घर चली गई थी और अब्बा भुनभुनाये बैठे थे। उन्हें अपने घर में अपनी धौंस जमाये रखने की बड़ी तमन्ना रहती थी, परंतु रज़िया और उसकी अम्मी को छोड़कर उनका रौब किसी पर नहीं चलता था। एक शाम पीकर जब वह घर लौटे थे तो रज़िया की अम्मी या रज़िया को सामने न पाकर मझले बेटे को गरियाने लगे थे, और आपे से बाहर होते हुए जब उस पर हाथ उठा रहे थे तो उसने हाथ पकड़कर ऐसी पटकनी दी थी कि उनकी कूल्हे की हड्डी खिसक गई थी, जो आज तक जाड़े में दर्द करती थी। तब से वह चाहे कितनी भी पीकर आये हों, लड़कों से कुछ भी नहीं कहते थे- उन पर आने वाला क्रोध भी रज़िया और उसकी अम्मी पर निकालते थे। शरीर से अक्षम पत्नी के प्रति तो उनका तकिया कलाम बन गया था,

"साली मरती भी नहीं है, न काम की न धाम की।"

मीरअली द्वारा रज़िया को प्रतिदिन गरियाने और पीटने का एक और कारण भी था। वह बचपन से लड़कियों को फँसाने का खेल खेलते रहे थे, इसलिये उनका मन सदैव इस आशंका से ग्रस्त रहता था कि अगर रजि़्ाया को प्रताड़ित कर नियंत्रण में न रखा गया तो वह लड़कों से फँस जायेगी। रज़िया के निखट्टू भाई भी उससे वैसा ही व्यवहार करते थे जैसा मीरअली करते थे, क्योंकि उन्हें भी अपनी चाकरी के लिये एक बाँदी की आवश्यकता थी। दिन में एक-दो बार अब्बा या भाइयों की गालियाँ सुनना और मार खाना रज़िया की दिनचर्या का अंग बन चुका था। वह अपनी "आई ऐम नॉट ओ.के." की स्थिति को पहले ही स्वीकार चुकी थी, और पिता तथा भाइयों की अनवरत अनुचित प्रताड़ना से "यू आर नॉट ओ.के." का भाव भी उसके मन में स्थायी हो रहा था।

आज मोहित के जाने से रज़िया अत्यंत उदास थी और अपने आँसुओं को कठिनाई से छिपाते हुए घर लौटी थी, अतः आज गाल पर तमाचा पड़ने पर वह रोज़ की तरह और अधिक गति से काम में जुट जाने के बजाय निर्जीव सी बैठकर अश्रुप्रवाहित करने लगी थी। इससे उसके अब्बा का क्रोध और बेक़ाबू हो गया था और उन्होंने "नखड़े दिखाती है?" कहते हुए उसकी चोटी पकड़कर उसे चौके में ढकेल दिया था।

रज़िया की अम्मी अपनी खाट से यह अत्याचार देख रहीं थीं परंतु किसी प्रकार के प्रतिरोध की निरर्थकता वह जानतीं थीं, और उनके मन में यह भय भी था कि प्रतिरोध जताने से रज़िया को दी जाने वाली प्रताड़ना बढ़ ही सकती हे, कम नहीं होगी। उनके मुँह से बस ये शब्द निकल रहे थे,

"या अल्लाह रहमकर और मुझे उठा ले।"

उस रात रज़िया देर तक सो न सकी, चुपचाप आँसू बहाती रही थी। नींद आने पर उसे स्वप्न आया कि वह ताल के शीतल जल में स्नान कर रही है और उसका रोम-रोम शीत का अनुभव कर रहा है। नहाते-नहाते वह ताल के बीच में चली जाती है और डूबने लगती है। बाहर की ओर आने के प्रयास में उसकी दम फूलने लगी है। अचानक उसे लगता है कि मोहित किनारे पर खड़ा है और उसके मुँह से चीख निकलती है,

"बचाओ, बचाओ- मोहित! मोहित!"

परंतु मोहित उसे बचाने नहीं आ रहा है, बस दूर खड़ा देखता रहता है। रज़िया घबराहट की चरमस्थिति में पहुँच जाती है और उसकी आँख खुल जाती है। वह देखती है कि उसकी अम्मी उसके माथे पर हाथ रखकर कह रहीं हैं,

"रज़िया बेटे, तुम्हें तो तेज़ बुखार है।"

रज़िया का बुखार तो पाँचवें दिन उतर गया था, परंतु उसका मन घनीभूत अवसाद से ग्रस्त होकर रह गया था। रज़िया सदैव स्वयं को अकिंचन और निरीह समझती रही थी और उसके मन को एक ऐसी छत्रछाया की आस रहती थी जो उसके मन और शरीर पर होने वाले प्रहारों के लिये अभेद्य दीवाल बनकर उसकी रक्षा कर सके। ऐसे व्यक्ति को अपने समस्त दुख-दर्द समर्पित कर वह उसके आश्रय की शांति में जीना चाहती थी। उसने कभी प्रत्यक्षतः ऐसा नहीं सोचा था कि मोहित उसका ऐसा कोई आश्रय बन सकता है, परंतु उसके अवचेतन में ऐसी धारणा अवश्य अंकुरित हो चुकी थी जिसके कारण अपने को डूबते से बचाने के लिये उसे मोहित का ही ध्यान आया था। पर मन द्वारा यथार्थ के आकलन ने स्वप्न में भी मोहित को उसे बचाने हेतु आगे नहीं आने दिया था।

अब रज़िया ताल के पास जाने से कतराती थी क्योंकि वहाँ जाते ही उसे रुलाई आने लगती थी। बस जब मन अनियंत्रित होने लगता तो हसरतभरी निगाहों से उधर देख लिया करती थी। कभी-कभी मन अधिक अशांत हो जाने पर वह दोपहर में फुरसत होने पर माँ से कहकर मोहित की मौसी के पास चली जाती थी। मोहित की मौसी प्रायः शिकायत करतीं,

"रज़िया इतने दिन बाद क्यों आई हो?"

रज़िया यह प्रश्न सुनकर किंकर्तव्यविमूढ़ हो जाती, तो मौसी बिना उसके उत्तर की प्रतीक्षा किये उसे पास बिठाकर उसके सिर पर प्यार से हाथ फेरने लगतीं और कहतीं,

"गर्मियों की छुट्टियों तक की बात है, मोहित को फिर से ज़रूर बुला लूँगी।"

मोहित की मौसी रज़िया के अंतर्मन को समझतीं थीं, परंतु सामाजिक एवं धार्मिक मर्यादाओं की जकड़न को भलीभाँति समझने के कारण उसे एक सीमा तक ही बढ़ावा देतीं थीं।

आगे के दो वर्षों में दस-दस महीने के अंतराल पर दो बार गर्मियों की छुट्टियाँ फिर आईं और मोहित भी फिर आया। रज़िया के लिये दोनों बार वसंत जैसे फिर-फिर लौटकर आ गया। प्रत्येक बार रज़िया की दोपहरियाँ फिर मोहित के साथ ताल के किनारे बीतीं और रज़िया को मोहित की निकटता का आभास, मोहित की छत्रछाया की आवश्यकता, तथा मोहित से चिरअनुराग की आशा और अधिक गहराई से अनुभव होने लगी; और छुट्टियाँ समाप्त होने पर उसे मोहित का विछोह और अधिक सालने लगा।

तीसरा वर्ष चुनाव का वर्ष था। क़स्बे में नारे और जुलूसों का माहौल था। राजनैतिक दल वोटरों को अपने पक्ष में करने हेतु प्रत्येक प्रकार का हथकंडा अपना रहे थे- जाति तथा धर्म के नाम पर वोटरों को बाँट कर अपने पक्ष में करना उनमें प्रमुख था। फ़तेहपुर क़स्बे के अधिकतर निवासी प्रवासी थे जो आस-पास के गाँवों से आकर बसे थे। प्रवासियों में असुरक्षा की भावना स्थायी निवासियों की अपेक्षा अधिक होती है- यह असुरक्षा की भावना केवल भौतिक असुरक्षा न होकर अपनी भाषा, अपने रीति-रिवाज़, अपने धर्म एवं अपनी पहिचान की भी होती है। अतः क़स्बों में धर्म के नाम पर लोगों को बाँटना अथवा दंगा कराना आसान होता है।

इस वर्ष जब स्कूलों की छुट्टियाँ प्रारम्भ हुईं तो रज़िया मोहित की मौसी से पूछने गई कि मोहित के आने की कोई ख़बर आई है या नहीं। रज़िया को देखते ही मोहित की मौसी ने स्वतः मुस्कराकर कहा,

"रज़िया, जिज्जी की चिट्ठी कल ही आई है। इसी शनिश्चर को मोहित के साथ आ रहीं हैं।"

रज़िया का हृदय प्रसन्नता से बल्लियों उछलने लगा। उस दिन वह देर तक मोहित की मौसी से बातें करती रही। आज मौसी कुछ उद्विग्न थीं। मौसी ने अपने पति को तहसील के कर्मचारियों से हिंदुओं और मुसलमानों के बीच उत्पन्न गम्भीर धार्मिक तनाव के बारे में बात करते सुना था, जिसमें मंदिरो में मुसलमानों के विरुद्ध नारे लगाये जाने और मक़तबों एवं मस्जिदों में हिंदुओं के विरुद्ध मीटिंग किये जाने की बात भी आई थी। अतः उन्होंने रज़िया से पूछा,

"रज़िया! मक़तब में आजकल तुम्हें मौलवी साहब क्या पढ़ा रहे हैं?"

रज़िया ने बताया कि अरबी, उर्दू, और गिनती-पहाड़ा के अलावा कुरानशरीफ़ की आयतें पढ़ाते हैं और उनका उर्दू में तर्जुमा कर समझाते हैं। लेकिन कल वहाँ एक मीटिंग हुई थी जिसमें तमाम लोग शरीक़ हुए थे। उसमें मौलवी साहब बता रहे थे कि क़स्बे के हालात बिगड़ रहे हैं। ईमान ख़तरे में है। मुसलमानों को एकजुट रहकर ईमान को बचाना है। क़यामत के दिन अल्लाहताला सबका फै़सला करेगा और ईमान पर चलने वालों और उस पर मरने वालों को जन्नत में हर तरह के सुख मुहैया करायेगा- काफ़िरों को सिर्फ़ दोज़ख़ ही नसीब होगी। काफ़िरों के खिलाफ़ जिहाद /धर्मयुद्ध/ जायज़ है; और अब जिहाद का वक़्त आ गया है।

मौसी एक ओर रज़िया की स्मरणशक्ति एवं अभिव्यक्ति की क्षमता पर आश्चर्यचकित हो रहीं थीं और दूसरी ओर इस प्रकार की भड़काऊ बात सुनकर चिंतित हो रहीं थीं। तभी रज़िया उनसे पूछने लगी,

"चाची हिंदुओं को काफ़िर क्यों कहते हैं? आप और मोहित तो इतने नेक हैं?"

वह रज़िया को इसका उत्तर क्या देतीं, अतः कह दिया,

"बेटी मुझे नहीं मालूम। तुम अपनी अम्मी से पूछ लेना।"

उस समय बात आई गई हो गई थी। पर शुक्रवार की शाम जब रज़िया ने अपने बड़े भाईजान सुल्तान को मुर्गी को ज़िबह करने वाली छूरी को पैनी करते देखा, तो जिज्ञासावश पूछ बैठी थी,

"भाईजान! इस वक्त छूरी क्यों पैनी कर रहे हैं?"

सुल्तान ने क्रोधित मुद्रा में कहा था,

"काफ़िरों को ज़िबह करूंगा।"

अम्मी ने जब यह बात सुनी तो अपनी मरियल आवाज़ में बोल पडीं थीं,

"क्या बकता है सुल्तान? क्या दिमाग़ फिर गया है?"

पर बेटे ने जैसे उनकी बात को सुना ही न हो, ऐसे छूरी पर सान देता रहा था और फिर उसे लेकर दरवाज़े से बाहर निकल गया था। तब रज़िया को फिर ध्यान आया कि चाची ने उसकी अम्मी से काफ़िरों के विषय में पूछने को कहा था, अतः उसने अपनी अम्मी से प्रश्न किया,

"अम्मी, काफ़िर किसको कहते हैं? भाईजान उन्हें ज़िबह करने की बात क्यों कह रहे थे?"

अम्मी कुछ देर तक सोच में डूबीं रहीं, फिर बोलीं थीं,

"काफ़िर उनको कहते हैं जो अल्लाह को नहीं मानते हैं।"

"क्या मोहित और मौसी भी काफ़िर हैं? वे तो अल्लाह को नहीं मानते हैं।" रज़िया अविश्वास भरे भाव से बोली।

रज़िया की अम्मी को मोहित अच्छा लगता था और उसकी मौसी भी, अतः वह धर्मसंकट में पड़ गईं। फिर सोचकर बोलीं,

"हाँ हिंदू अल्लाह को तो नहीं मानते हैं, पर होते तो वे भी इंसान ही हैं और इंसान इंसान सब बराबर हैं- हिंदुओं में भी कई बड़े नेक बंदे होते हैं।"

इस उत्तर से रज़िया की संतुष्टि नहीं हुई थी और उसने आगे पूछा था,

"पर भाईजान तो काफ़िरों को ज़िबह करने की बात कर रहे थे?"

रज़िया की अम्मी कोई उत्तर दे पातीं, उसके पहले ही रज़िया के अब्बा घबराये से घर में आ गये थे और बोल पड़े थे,

"बच्चे कहाँ हैं?"

अम्मी और रज़िया आश्चर्यचकित थे कि इन्हें आज बच्चों का ध्यान कैसे आ गया। उनके प्रश्नवाचक चेहरों को देखकर मीरअली बोले,

"क़स्बे में हिंदू-मुस्लिम फ़साद हो गया है। आज सबेरे जुमे की नमाज़ के पहले मस्जिद में गोश्त का टुकड़ा पड़ा मिला था, जिसके बारे में नमाज़ के दौरान अफ़वाह फैली कि सूअर का गोश्त है। तब से नये लौंडों में चुपचाप मिस्कौट होती रही और शाम को बाज़ार में छूरेबाज़ी हो गई। फिर आनन-फ़ानन में दूकानें बंद हो गईं और अब छिटपुट मारकाट शुरू हो गई है। सब बच्चों को आगाह कर दो कि घर से बाहर न जायें।"

बच्चों की तलाश हुई तो इरफ़ान और रज़ा बाहर एक दूसरे को गरियाते हुए मिले, शाकिर पड़ोस की लड़की रौशन को एक ओर ले जाकर माचिस की तीली से ज़मीन पर "बे-पेश-रे" लिखना सिखा रहा था, मुन्ना दोस्तों के साथ बीड़ी के कश लेकर छल्ले बना रहा था- बस सबसे बड़ा सुल्तान का कुछ पता नहीं था। आस-पड़ोस में पूछताछ करने पर भी सुल्तान के बारे में कोई कुछ न बता सका- यहाँ तक कि अपने बरामदे में हुक्का गुड़गुड़ाते रहने वाले रमज़ानी की नज़र में भी वह आज बस घर से निकलते समय ही पड़ा था। हार कर मीरअली अपने भय को अपनी बड़बड़ाहट में निकालने लगे थे,

"आवारा कहीं का। घर तो इसे जैसे काटता है। साला पी पा रहा होगा कहीं शोहदों के साथ।"
रज़िया की अम्मी के सिकुड़े चेहरे पर चिंता की रेखायें और गहरीं हो रहीं थीं और अनिष्ट की आशंका से उनका और रज़िया का चेहरा फक था।



- क्रमशः


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