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ISSN 2292-9754

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03.15.2016


भीगे पंख
मोहित और रज़िया /एक/

 जून की चिलचिलाती दोपहरी में हवा एकदम शांत रुकी हुई थी, परंतु फिर भी ऊष्मा की लहरें ऐसे प्रवाहित हो रही थीं जैसे ईथर के माध्यम में विद्युत्चुम्बकीय लहरें प्रवाहित होती रहतीं हैं। फ़तेहपुर क़स्बे के अधिकतर व्यक्ति बदन को जलाने वाली उस ग्रीष्म से बचने हेतु कमरों की छाँव में बंद हो गये थे- और अलसाये उनींदे पड़े थे। ऐसे में मोहित दबे पाँव अपने मौसा के घर से बाहर निकल आया था और पीछे जाकर जामुन के पेड़ की छाँव में खड़े होकर सामने के ताल को देख रहा था, जहाँ चार बतखें एक पंक्ति में तैर रहीं थीं। आगे तैरने वाला नर और पीछे तैरने वाली मादा बतखें तो धीर-गम्भीर परंतु सतर्क मुद्रा में आगे बढ़ रहीं थीं परंतु बीच में तैरने वाले दोनों बच्चे कभी-कभी पानी में डुबकी लगाकर कुलाँच भर लेते थे। जामुन के पेड़ के नीचे हाँफता हुआ पड़ा़ एक कुत्ता भी आँखें बंद किये था, बस कभी-कभी बतखों को उनींदी आँखों से निहार लेता था। जामुन के पेड़ पर बैठे कौए ने एक कच्ची जमुनी कुतर दी थी जो मोहित के सिर पर आकर गिरी थी, तब उसका ध्यान जामुन के हरे लहलहाते पेड़ पर गया था। जामुन कुछ कुछ ललछौंहे हो आये थे, परंतु अभी पके नहीं थे। मोहित को जामुन बहुत पसंद थे और वह सोच रहा था कि जामुन यदि पक गये होते तो खाने में कितना मज़ा आता कि तभी पीछे से एक दबी हुई धीमी सी आवाज़ मोहित ने सुनी थी,

"तुम मोहित हो?"

और वह घूमकर पुकारने वाली लड़की की ओर प्रश्नवाचक नेत्रों से देखने लगा था। छींट के फटे-पुराने कुर्ते और फीके पड़ चुके शोख लाल रंग की सलवार पहिने उस दुबली गोरे रंग की लड़की के गोल चेहरे पर हिरणी जैसी भयभीत आँखें थीं जो न केवल देखने का काम करतीं थीं वरन् बोलतीं भी थीं।

चौथी कक्षा की परीक्षा देने के बाद ग्रीष्मावकाश बिताने हेतु मोहित अपनी माँ के साथ आज सुबह ही इस क़स्बे में अपनी मौसी के घर आया था। यहाँ आने का उसका यह पहला मौका था- असल में किसी भी क़स्बे में जाने का उसका यह पहला मौका था। उसके मैासा कुछ दिन पहले कानूनगो से नायब तहसीलदार के पद पर प्रोन्नत होकर तहसील फ़तेहपुर में नियुक्त हुए थे और उन्हें आते ही तहसील प्रांगण में स्थित नायब तहसीलदार का मकान रहने हेतु मिल गया था। तब उसकी मौसी ने अपनी बहिन और जीजा को विशेष मनुहार करके मोहित के साथ गर्मियाँ वहीं बिताने हेतु बुलाया था। मोहित के पिता मोहित और उसकी माँ को फ़तेहपुर पहुँचाकर वापस चले गये थे। फ़तेहपुर क़स्बा पहुँचने से पूर्व मोहित की माँ ने मोहित को कई बातें समझाईं थी जिनमें अधिकतर इस उद्देश्य से थीं कि वह वहाँ गँवारू न लगे। परंतु एक उपदेश यह भी था,

"मौसी के मकान के बगल में मुसलमान रहत हैं जो मलेच्छ होत हैं। उनसै दूरई रहियौ। उनके घर पै तौ कबहूँ कछूं ना खइयैा- काऊ कौं पानी लौ पीबे कौं देत हैं तौ बा मैं थूक मिलाय देत हैं।"/ मौसी के मकान के बगल में मुसलमान रहते हैं, जो म्लेच्छ होते हैं। उनसे दूर रहना। उनके घर पर कभी कुछ भी न खाना- किसी को पानी भी पीने को देते हैं तो उसमें थूक देते हैं।"

मोहित ने माँ की इस बात को संदेहपूर्ण आश्चर्य के साथ लिया था, क्योंकि उसका हृदय संवेदनशील और विशाल था। उसने रामलीला में राम को शबरी के जूठे बेर खाते देखा था। विद्यालय में प्राप्त होने वाली गाँधी-नेहरू के विचारों से प्रेरित शिक्षा भी उसे मानव-मानव में समानता का भाव रखना सिखा रही थी। उसका मन उसकी माँ के द्वारा सतिया को अस्पृश्य माने जाने की बात को भी कभी स्वीकार नहीं कर पाया था। फिर भी वह माँ की बात का प्रत्यक्ष विरोध नहीं कर पाया था वरन् माँ की बात सुनकर उसने सप्रयत्न अपने चेहरे पर ऐसा भाव नहीं आने दिया था जिससे लगे कि माँ अनुचित बात कह रहीं हैं।

मौसी के घर पहुँचकर उसने दौड़कर मौसा और मौसी के पैर छुए थे। मौसी के कोई अपना बच्चा नहीं था और मौसी मोहित को हृदय से प्यार करतीं थी- उन्होंने उसके गाल पर थपकी ली, उसकी बलैयाँ लीं और उसे निकट खींचकर गले से लगा लिया था। मोहित मौसी के नेत्रों में मातृवत प्रेम देखकर अभिभूत हो गया था। औपचारिक वार्ता के पश्चात मौसी यह कहकर चौके में चलीं गईं थीं,
"मोहित भूखा होगा। जल्दी से खाना लगा दूँ।"

दोपहर का भोजन करने के पश्चात सब लोग कमरों में आराम करने लगे थे, परंतु मोहित को दोपहर में सोने की आदत नहीं थी और आज तो उसका मन इतना उल्लसित था कि प्रयत्न करने पर भी नींद आ ही नहीं सकती थी। अतः वह नये स्थान की नवीनता को आत्मसात करने हेतु चुपचाप घर से बाहर निकल आया था। वह घर के पीछे स्थित ताल की ओर चला आया था और जामुन की छाँव में खड़े होकर इस स्थान की नवीनता में तल्लीन हो रहा था कि तभी उसे अपने से छोटी उस दुबली-पतली लड़की की मरियल सी आवाज़ सुनाई दी थी। यहाँ नवीन स्थान पर किसी के द्वारा अपने को पहिचान लिये जाने पर मोहित आश्चर्यचकित था और उस लड़की को प्रश्नवाचक निगाह से देख रहा था। मोहित के हाव-भाव देखकर जब वह लड़की आश्वस्त हो गई कि वह मोहित ही है, तो मोहित का आश्चर्य समाप्त करने को स्वतः ही बोल पड़ी थी,

"मैं रज़िया हूँ। तुम्हारी ख़ाला यानी तुम्हारी मौसी, जिन्हें मैं चाची पुकारती हूँ, ने मुझे बताया था कि तुम आज आओगे।"

रज़िया ऐसे बोल रही थी जैसे कि अगर बात जल्दी पूरी न हुई, तो सम्भवतः कभी पूरी न हो पावेगी। मोहित उस लड़की के बोलने की शैली में इतना उलझ रहा था कि कोई उत्तर देने हेतु उसे सोचना पड़ रहा था और उधर रज़िया स्वयं भौंचक्की हो रही थी कि वह एक अजनबी से इतना कैसे बोल पा रही है। अपने घर में किसी के सामने उसकी जु़बान ही नहीं खुलती थी और वह अपने को दूसरों की अपेक्षा अत्यंत निरीह अनुभव करती थी। बस मोहित की मौसी जिन्हें वह चाची कहती थी, से वह अवश्य खुलकर बातचीत कर लेती थी। वह अक्सर मौका मिलने पर चाची के पास आ जाती थी और कुछ न कुछ बितयाती रहती थी, जैसे अपने घर की चुप्पी का कोटा यहाँ पूरा कर रही हो। चाची की ससुराल लखनऊ के चौक मुहल्ले में थी और विवाहोपरांत उनका जीवन मुसलमानों के साहचर्य में बीता था अतः वह मुसलमानों के प्रति खुले ख़यालों वाली थीं। अपनी संतान न होने के कारण भी उन्हें रज़िया की बातें बड़ी प्यारी लगतीं थीं और आत्मिक सुख की अनुभूति होती थी। चाची से गहन निकटता की भावना के कारण रज़िया को मोहित से भी निकटता की अनुभूति होने लगी थी और वह मोहित के समक्ष बेझिझक बोल पा रही थी।

अब मोहित प्रकृतिस्थ हो चला था और बोला,

"हाँ हम मोहित हैं। तुम का हियईं रहतीं हौ?"/हाँ, मैं मोहित हूँ। तुम क्या यहीं रहती हो?"

रज़िया फिक्क से हँस दी थी क्योंकि उसे मोहित की बोली बड़ी अजीब लगी थी। पर मोहित का चेहरा देखकर उसके मन में आशंका हुई थी कि कहीं मोहित को बुरा न लग जाये और वह तुरंत संयत हो गई थी। मोहित के स्कूल की किताबें खड़ी बोली में थीं और वह खड़ी बोली समझता था एवं प्रयत्न करने पर बोल भी सकता था। वह यह भी जानता था कि खड़ी बोली पढ़े-लिखे लोगों की भाषा है परंतु उसे खड़ी बोली बोलने का अभ्यास नहीं था, अतः वह रज़िया से गाँव की भाषा में बोल दिया था। यद्यपि रज़िया के हँसने पर उसे अपनी ग्रामीण भाषा की तुच्छता का भान तीक्ष्णता से हुआ था, तथापि रज़िया के अविलम्ब संयत हो जाने और उसके नेत्रों में उत्पन्न खेद की झलक को देखकर वह समझ गया था कि रज़िया की हँसी अकस्मात थी, उसे चिढ़ाने के लिये नहीं थी। उसे रज़िया के हँसते हुए नेत्र मोहक लगे थे। तभी रज़िया ने मोहित के प्रश्न के उत्तर में कहा,

"मेरा घर भी तहसील में ही है, तुम्हारी मौसी के घर के पास ही। मैं रोज़ तुम्हारी मौसी के पास आती हूँ।"

रज़िया की मौसी से निकटता जानकर मोहित और आश्वस्त हो गया था। तब मोहित ने प्रकृतिस्थ होकर रज़िया से पूछा था,

"तुम कौन दर्जा मैं पढ़ती हौ?"

"मैने मकतब में मौलवी साहब से इसी साल अलिफ़ में पढ़ना शुरू किया है।"

मोहित ने अपने गाँव के लोगों को मुसलमानों के विषय में बात करते हुए मौलवी साहब सम्बोधन सुन रखा था। अतः उसने रज़िया से पूछा,

"क्या तुम मुसलमान हो?"

अपनी माँ द्वारा दी हुई सीख के कारण यह प्रश्न करते हुए मोहित के स्वर में एक अजनबीपन आ गया था, जिसे रज़िया का मन, जो अति संवेदनशील था, तुरंत पहिचान गया था और संकुचित होकर उसने धीरे से उत्तर दिया था,

"हाँ।"

तब रज़िया के मुख पर श्याम-श्वेत घटाओं के समान उभरते और मिटते भाव देखकर मोहित के मन को अपने प्रश्न पर स्वयं चोट पहुँची थी और उसका हृदय रज़िया को किसी प्रकार सहज करने को उतावला हो उठा था। उसकी समझ में नहीं आ रहा था कि वह रज़िया को कैसे प्रसन्न करे। कुछ अन्य उपाय न सोच पाकर उसके मुख से अनायास निकला था,

"चलो, मौसी के पास चलते हैं।"

सदैव बुझी सी रहने वाली रज़िया के मन में मोहित को देखकर जो उछाह जागा था, वह मोहित के प्रश्न पर शांत हो रहा था, परंतु मौसी के यहाँ जाने का वह लोभ-संवरण न कर सकी। जब दोनों घर पहुँचे तब मौसी और माँ जाग चुके थे। रज़िया को मोहित के साथ आते देखकर मौसी बोलीं,
"आओ बेटी। क्या तुम मोहित से मिल चुकी हो?"

रज़िया ने हामी में अपना सिर हिलाया। मोहित की माँ रज़िया के आकर्षक चेहरे को देखकर प्यार से मुस्कराने लगीं थीं और उन्होंने उसके सिर पर हाथ रखकर कहा,

"बेटी, तुम्हाओ नांव का है?/बेटी तुम्हारा नाम क्या है?/"

"रज़िया"

यह सुनते ही मोहित की माँ का हाथ उसके सिर से ऐसे हट गया जैसे बिच्छू ने डंक मार दिया हो। उनके चेहरे के बदलते भाव को रज़िया ने भी ताड़ लिया था और वह अपने में गुमसुम होने जा रही थी कि तभी मोहित की मौसी, जो इस बीच चौके की तरफ़ चलीं गईं थीं, दो गिलास शर्बत बना कर ले आईं और पीतल के गिलास वाला शर्बत मोहित को तथा काँच के गिलास वाला रज़िया को थमा दिया। रज़िया को गिलास थमाकर और उसके सिर पर प्यार से हाथ रखकर मौसी ने पूछा,

"रज़िया, तुम्हारी अम्मी की तबियत अब कैसी है?"

मौसी के स्नेहमय व्यवहार से रज़िया सामान्य हो गई थी। उसने उत्तर दिया,

"रोज़ जैसी। ज़्यादातर लेटी ही रहतीं हैं।"

यद्यपि मौसी ने रज़िया को धातु के बर्तन में शर्बत नहीं दिया था तथापि मोहित की माँ रज़िया के प्रति अपनी बहिन की इतनी निकटता देखकर मन ही मन कुढ़ रही थीं। रज़िया उनकी निगाहें पढ़कर अटपटा सा अनुभव कर रही थी और शर्बत पीकर शीघ्र ही चली गई थी। उसके जाते ही मोहित की माँ अपनी बहिन से बोल पड़ीं,

"का तुम्हाये पडोस मैं सब मुसलमानई रहत हैं जो जाय बेटी बनाय रखो है? जाके जूठे गिलास में हमैं तौ कछू पीबे कौं न दीजौ।/क्या तुम्हारे पड़ोस में सब मुसलमान ही रहते हैं, जो इसको बेटी बना रखा है? उसके जूठे गिलास में मुझे तो कुछ भी पीने को मत देना।"

मौसी मुस्कराते हुए बोलीं,

"जिज्जी, तुम्हाओ धरम नाईं भ्रष्ट हुइयै- हमने रज़िया के लैं अलग सै काँच को गिलास और प्लेट रख दये है। उइसें रज़िया है बड़ी अच्छी लड़की। बा बिचारी की अम्मा तौ खाट पकड़े है, बाप सराबी-कबाबी है और भाई लोग निखट्टू हैं। इतनी सी उमर में घर को काम और अम्मा की देखभाल सब सँभारें है। ता पै बिगड़ैल बाप और भाइयन की गाली-गलौज व मार-पीट और सहत है। जा सै घबराई सी रहत है और अपयें घर मैं बहुत कम बोलत है। हम थोरो प्यार सै बोल देतीं हैं ता सै बस हमईं सै बोलत है। लेकिन जब बोलत है तौ मुँह सै फूल से झरत हैं।/ जिज्जी, तुम्हारा धर्म भ्रष्ट नहीं होगा- मैने रज़िया के लिये अलग से काँच का गिलास और प्लेट रख दिये हैं। वैसे रज़िया है बड़ी अच्छी लड़की। उस बेचारी की माँ तो खाट पकड़े है, बाप शराबी-कबाबी है, और भाई लोग निखट्टू हैं। इतनी सी उम्र में घर का काम और अम्मा की देख-भाल सब सँभाले है। उस पर बिगड़ैल बाप और भाइयों की गाली-गलौज और मारपीट भी सहती है। इससे घबराई रहती है और अपने घर पर बहुत कम बोलती है। मैं थोड़े प्यार से बोल देती हूँ, इसलिये मुझसे ही बोलती है। परंतु जब बोलती है तो मुँह से फूल झड़ते हैं।"

मोहित अपनी माँ और मौसी के बीच होने वाली बातचीत को बड़े ध्यान से सुन रहा था और उसे मुसलमानों के बारे में माँ और मौसी के विचारों में इतना अंतर पाकर आश्चर्य हो रहा था- माँ ने तो कहा था कि मुसलमान बुरे होते है और मौसी रज़िया को कितना अच्छा बता रहीं थीं और उससे कितने ममत्व से बात करती रहीं थीं? उसके मन में यह प्रश्न भी जागा कि जब वह इतनी अच्छी है तो उसके लिये अलग गिलास और प्लेट रखने की क्या आवश्यकता है? क्या वह भी सतिया की तरह अछूत है? पर ऐसा होता तो मौसी उसके सिर पर हाथ क्यों रखतीं? ये सारे प्रश्न मोहित के मन में इसलिये भी आ रहे थे क्योंकि मोहित को रज़िया अच्छी लगी थी और उस अनजान जगह पर उसका मन उससे मित्रता करने को मचलने लगा था। मोहित को यद्यपि सतिया भी अच्छी लगती थी परंतु चूँकि बचपन से उसे सिखाया गया था कि सतिया से दूर रहना है इसलिये उस विषय में उसने कभी इतना उद्वेलित होकर नहीं सोचा था जितना आज रज़िया के प्रकरण में सोच रहा था। आज उसके मन में रज़िया और सतिया दोनों के प्रति अपनी माँ की और समाज की मान्यताओं पर गम्भीर प्रश्न उत्पन्न हो रहे थे। उस रात्रि में वह देर तक इस विषय पर सोचता रहा था और उसका मन स्थापित प्रथाओं के प्रति विद्रोह करता रहा था। दूसरे दिन प्रत्यक्षतः तो वह अपनी माँ से इस विषय में कुछ न कह सका परंतु उसने मन ही मन निश्चय कर लिया कि वह रज़िया के मुसलमान होने के बावजूद उससे दोस्ती करेगा और उसके साथ खेले कूदेगा। उसे यह विश्वास भी हो गया था कि इसमें उसकी मौसी उसका साथ देंगी और माँ को समझा लेंगी।

"मोहित, तुम सबके संग घरई मैं सुइयौ; दुपहरिया मैं बाहिर मारे मारे ना फिरियौ।/मोहित तुम सबके साथ घर में ही सोना। दोपहर में बाहर मारे मारे मत घूमना।"

मोहित की माँ ने दूसरे दिन मोहित को वर्जना के स्वर में कहा था। इसके पीछे उनके मन में मोहित को लू-लपट से बचाने की भावना तो थी ही, परंतु यह आशंका भी थी कि मोहित कहीं रज़िया के घर जाकर कुछ खा पी न ले और मुसलमानों का जूठा खाकर अपना धर्मभ्रष्ट न करवा ले। यद्यपि उनकी बहिन ने रज़िया के गुणों की बड़ी प्रशंसा की थी परंतु रूढ़िगत संस्कारों के वशीभूत वह अपने बेटे की एक मुसलमान लड़की से मित्रता के दुष्परिणामों की आशंका से अपने को उबार नहीं पा रहीं थीं।

"अम्मा, तुम जन्तीं हौ कि हमैं दुपहरिया मै नींद नांईं आत है। /अम्मा, तुम जानती हो कि मुझे दोपहर में नींद नहीं आती है।"

मोहित ने इतना भर कहा था जो तथ्यात्मक था और जिसमें माँ की बात को स्पष्टता से न नकारते हुए उसकी अवहेलना की गुंजाइश छोड़ दी गई थी।

दोपहर में सबके सो जाने पर मोहित ने कुछ देर तक शांत लेटे रहने का प्रयत्न किया, परंतु फिर मन ऊब जाने पर वह उठकर घर से बाहर निकल कर तलैया की ओर चला गया था। वहाँ वह जामुन के पेड़ के नीचे चुपचाप खड़े होकर सोचने लगा था कि हो सकता है कि कल की तरह आज भी रज़िया आ जाये, परंतु देर तक प्रतीक्षा करते रहने पर भी रज़िया नहीं आई थी। तब मोहित के मन में यह विचार आने लगा कि हो न हो उसके द्वारा रज़िया से मुसलमान होने की बात पूछने के कारण रज़िया उससे खिन्न होगी और इसीलिये नहीं आ रही है। हीनभावना से ग्रसित व्यक्ति प्रायः किसी भी असफलता हेतु स्वयं को दोषी मानने लगता है। वह ज्यों-ज्यों स्वयं को दोषी अनुभव कर रहा था, उसकी रज़िया से मिलकर उसे अपने द्वारा की गई ग़लती का आभास होने की बात जता देने और उसकी क्षमा प्राप्त कर लेने की उत्कंठा उतनी ही बढ़ रही थी। देर तक रज़िया की प्रतीक्षा करने के उपरांत वह साहस कर उस मकान की ओर चल पड़ा जो रज़िया ने अपना बताया था। वहाँ वह इस आस से इधर-उधर टहलने लगा कि हो सकता है कि रज़िया कहीं बाहर आ जाये।

"अरे मोहित! आओ घर में आ जाओ।" मोहित को अधिक प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ी थी क्योंकि रज़िया ने अपने घर के अधखुले दरवाज़े से मोहित को देख लिया था और वह उसे बुलाने बाहर आ गई थी। उस समय उसके हाथों में मुर्गी का एक चूज़ा फड़फड़ा रहा था, जिसे देखकर मोहित मुस्करा दिया था। आज दोपहर में वह आँगन में गेहूँ फटकती रही थी, जिसके कारण उसे बाहर जाने की फ़ुर्सत नहीं मिली थी। जब उसकी निगाह खोये-खोये से टहलते हुए मोहित पर पड़ी थी, उस समय वह फटकन का दाना मुर्गियों को चुगा रही थी और उनमें से एक चूज़े को अपने हाथ में लेकर प्यार से खिला रही थी।

रज़िया को देखकर और उसका स्वागत हेतु उत्सुक स्वर सुनकर मोहित का मन आश्वस्त और प्रसन्न हो गया था। माँ के निषेध का ध्यान होते हुए भी वह रज़िया का आमंत्रण अस्वीकार न कर सका और धीरे-धीरे आँगन में घुस आया। उस समय घर में शांति थी और बाहर भी कोई नज़र नहीं आ रहा था। तभी रज़िया ने उसे अपनी अम्मी के कमरे में चलने को कहा और उसके झिझकने पर उसकी उँगली पकड़कर अम्मी के कमरे में ले गई। अम्मी बंसखटी पर लेटी हुईं थीं। रज़िया ने अम्मी को सम्बोधित कर कहा,

"अम्मी! मोहित आया है।"

मोहित ने रज़िया की कृशकाय अम्मी को देखा और हाथ जोड़कर नमस्ते की, तो अम्मी उसे दुआ देते हुए बोलीं,

"जीते रहो बेटा। रज़िया कल से तुम्हारे बारे में ही बातें कर रही है।"

अम्मी ने मोहित को पास बुलाकर उसके गालों पर प्यार भरा हाथ रखा। फिर उसके चेहरे को ध्यान से देखकर बोलीं,

"रज़िया मोहित का चेहरा गर्मी से लाल हो रहा है। घड़े के पानी में चीनी मिलाकर शर्बत बना लाओ।"

रज़िया जब शर्बत बनाने चली, तो मोहित के मन में यह शंका उभरी कि रज़िया कहीं उसमें थूक कर न लाये और अम्मी से बात करते समय अनायास उसकी निगाहें रज़िया का पीछा करती रहीं। पर जब उसने देखा कि रज़िया ने गिलास साफ़ कर बिना थूके शर्बत लाकर उसे थमा दिया, तो उसे लगा कि अम्मा की मुसलमानों के प्रति यह धारणा गलत है। रज़िया का दिया हुआ शर्बत उसने बेहिचक पिया, जो अपनी ठंडक और मिठास से मुसलमानों के प्रति उसके मन में उठने वाली शंकाओं को सदैव के लिये शांत कर गया। फिर रज़िया अपनी अम्मी से बोली,

"अम्मी! अब हम बाहर खेल आयें?"

अम्मी ने हामी भरते हुए ताकीद की कि तेज़ धूप में मत खेलना। दोनों जामुन की छाँव में आकर बैठ गये और ऐसे बतियाने लगे, जैसे बरसों के दोस्त हों।

फिर यह क्रम प्रतिदिन चल निकला कि दोपहर में जब मोहित की माँ और मौसी सोने लगतीं और रज़िया धर के काम निबटा चुकती, तब दोनों ताल किनारे आ जाते और कभी न समाप्त होने वाली बातें करते रहते और कच्चे-पक्के जामुन तोड़कर खाते रहते। मन होने पर वे गुल्ली-डंडा, लंगड़ी-टाँग आदि खेल खेलते और फिर रज़िया मोहित के साथ मौसी के घर आ जाती और मोहित के साहचर्य में तब तक खोई रहती जब तक घर वापस लौटना अनिवार्य न हो जाता।

बच्चों में भूत को भूलकर और भविष्य की चिंता किये बिना वर्तमान में पूरी गहराई के साथ जीने की अद्भुत क्षमता होती है- इसीलिये वे बड़ों की तुलना में अधिक तल्लीनता एवं संवेदना से किसी घटना को अनुभव एवं आत्मसात करते हैं; और इसीलिये बचपन के अनुभव हमें बुढ़ापे तक में याद रहते हैं और अपनी मर्मस्पर्शिता के कारण प्रिय लगते रहते हैं।

इन दिनों मोहित और रज़िया का संसार एक दूसरे में सिमट कर रह गया था। इसका एक कारण यह भी था कि ‘आई ऐम नॉट ओ.के.’ की मानसिकता के कारण दोनों को एक दूसरे के आश्रय की आंतरिक आवश्यकता थी, और दोनेां के मन परिस्थिति, काल और दिशा से बेख़बर एक दूसरे से बँधे रहते थे।

मोहित और रज़िया का वह स्वप्निल संसार उस दिन एक झटके से छिन्न-भिन्न हो गया था जब मोहित के गाँव वापस जाने का दिन आ गया था। मोहित के स्वभावानुसार एवं उसकी परिस्थितियों के कारण उसका बिछोह का दुख उतना स्थायी नहीं था जितना रज़िया का था। मोहित के जाते समय वह फफककर रो पड़ी थी। रज़िया को इस संसार में अपनी अम्मी और मोहित की मौसी के अलावा किसी से अपनत्व नहीं मिला था और मोहित के अतिरिक्त आज तक कोई ऐसा नहीं मिला था, जिसमें वह अपना सब कुछ भूलकर एकमेव हो सकी हो। रज़िया अपने हृदय में उठने वाली हूक दबा नहीं पा रही थी। उसकी दशा देखकर मोहित की मौसी ने उसके सिर पर हाथ रखकर उसे सांत्वना देते हुए कहा था,

"रज़िया तू दुखी न हो। अब हम हर साल गर्मियों की छुटटी में मोहित को बुला लिया करेंगे।"

रज़िया सिसकते हुए तब तक मोहित के तांगे को देखती रही थी जब तक मोहित अंाखों से ओझल नही हो गया था।



- क्रमशः


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