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07.31.2014


अंतपुर की व्यथा कथा
अनिल कुमार पुरोहित

भाव विस्तार : कविता
शंकरलाल पुरोहित

हम उन दिनों बीजेबी फ्लैट में रहते थे। मैं बीजेबी में अध्यापक था। अनिल कृषि विश्वविद्यालय में कृषि (स्नातक) पढ़ाई पढ़ रहा था। ऊपर आते ही पंखे का स्विच ऑन किया और बैठ गया, कुर्सी पर। फड़फड़ाहट – एक कबूतर का चूजा पंखे के डैने से टकराकर सामने गिरा। घायल! उठाया और अपने छोटे भाई सुनील को साथ ले कर अपने कालेज के वेटनरी विभाग में गया – खून पोंछ पट्टी की। लाकर फिर से नीचे एक टोकरी से ढांप दिया। दो दिन बाद बच्चा ठीक हो फिर पंख फड़फड़ाने लगा। उसे लेकर ऊपरी ताख पर रखा। वह पढ़ने चला गया। लौट कर देखा – पंखे से टकराकर गिरा था – बिल्ली ने शिकार किया! बिखरे पंख देख दो दिन तक खाना नहीं खाया। गुमसुम रहा। बड़ी मुश्किल से "ब्रह्मज्ञान बघारा" तब रास्ते पर आया। घटना ऐसी बहुत बार होती है। वाल्मीकि के जीवन में पहली बार और अनिल के जीवन में आखरी बार हुई, सो बात नहीं। यह जीवन का दस्तूर है! नियति है। अतः हर युग में नाम, स्थान बदल कर होती आयी है। हम सब उसे देखते हैं। अपने-अपने ढंग से। कायदा भिन्न-भिन्न होता है। पर सत्य तो एक ही है। क्रमशः वह भी सच का सामना करना सीख लेता है। भारत भूमि से जो संस्कार लेकर अनिल पश्चिम में गया है, उनका विकास होना ही था। उसमें जो चेतनागत गहराई दिख रही है, वह उसे पता नहीं चिंतक बना रही है, या कवि अथवा सचेत कवि?

"अंतःपुर की व्यथा" कविता सर्फेस स्ट्रक्चर पर भले ही महाभारत के पात्रों के आधार पर है। डीपर स्ट्रक्चर में तो हमारे आसपास के भाव-जगत में चित्रित हो रही है। यह युद्ध त्रस्त मानवता ही अंतःपुर में व्यथित है। उस दिन घायल पक्षी को बचाने आकुल मन आज इस तीसरे महायुद्ध की आशंका में घिरे मानव को इस पक्ष, उस पक्ष और कृष्ण पक्ष में संवाद कर बचाने को विकल हो रहा है। मैं आलोचक नहीं, पाठक द्रष्टा हूँ इस लंबी कविता का। न मैं संपृक्त हूँ और न निरपेक्ष। यह हर सिलेबल पर मुझे झकझोर रही है। किस प्रकार हिन्दी में संवेदना का विकास हुआ है यही देख रहा हूँ। यशोदा माटी खाये कृष्ण के मुख को देख अवाक होने की तरह मैं भी कविताये अनिल के शब्दोचार से किंकर्त्तव्यविमूढ़ हूँ! आज उसका काव्यात्मक मेटामार्फासिस हो चुका जो "शहर की पगडंडी" से ही शुरू होने लगा था। अब टेक ऑफ़ के बाद वह पूछ रहा जो प्रश्न, मैं उन्हें लिपिबद्ध नहीं कर पा रहा, क्योंकि अभी भी उनके उत्तर तलाशने की अंतःप्रक्रिया में है। भगवान श्री जगन्नाथ जानें उसे यह कैसी दिशा दी है! कवि के लिए छः दिशायें मुक्त हैं!


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