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05.03.2012
अन्तर्यात्रा
रचनाकार : डॉ. दीप्ति गुप्ता
वतन
डॉ. दीप्ति गुप्ता

वो आँखो का तारा, वो प्यार हमारा
वो प्यारा वतन है, वो घर है हमारा !

वो पेड़ों की शाखें, चहकती चिरैया
वो मैना की पाँखें, फुदकती गौरैया
वो बचपन हमारा, हमारा गगन है !
वो आँखो का तारा, वो प्यारा वतन है !

वो दादी की बाँहों में, किस्सों का सुनना
वो माँ के दुलारे से, आँचल में छुपना
वो ममता का सागर, हमारा सहन है !
वो आँखो का तारा, वो प्यारा वतन है !

वो आमों की बौरे, वो कोयल की कुहकन
वो बासन्ती फूलों पे, भौंरों की गुन्जन
वो उपवन हमारा, हमारा चमन है !
वो आँखो का तारा, वो प्यारा वतन है !

वो नदियों की कलकल, वो झरनों का झरना
वो सागर की उमड़न, वो लहर का मचलना
वो सतरंगी दुनिया, हमारा सपन है !
वो आँखो का तारा, वो प्यारा वतन है !

वो नदियों के पाटों पे, मेलों के डेरे
वो पूनम की रातों में, गीत – घनेरे
वो मेलों की रौनक, हमारा शगन है !
वो आँखो का तारा, वो प्यारा वतन है !!


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