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05.03.2012
अन्तर्यात्रा
रचनाकार : डॉ. दीप्ति गुप्ता
मुक्तक
डॉ. दीप्ति गुप्ता

1
जीवन बसन्त में आए तुम बहार बन के
पतझड़ में हमने गाए बिरहा उदास मन के !!

2

सावन में मेघा छाए
बरसे उमड़ के,
तन के दिल में उभरते साए
बहलाए हमको थमकें !!

3

टूटे दिल के बंधन होते हैं
बड़े प्रगाढ़ ऊपर से
बिखरे-बिखरे पर अंदर
ऐसे बुनते जाल
अनन्त, अटूट, चिरन्तन
प्यारे से रिश्ते का पाश !

4

क्षिति की क्षति
पेड़ों की दुर्गति
करता ........... दुर्मति


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