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05.03.2012
अन्तर्यात्रा
रचनाकार : डॉ. दीप्ति गुप्ता
कर्मफल
डॉ. दीप्ति गुप्ता

सभी  को कर्म - फल मिलते हैं,
कभी
 के  पाथे, कभी जलते  हैं  
कर्म -भोग  का,  नियत  विधान
नहीं
  होता   इसमें   व्यवधान !
अच्छे
  का  अच्छा, फल  होता
बुरे
   का   होता,    कुपरिणाम!

छल  बल  से, छीना  झपटी की
और - किया,
  दिल   लहुलुहान
कितना
   उत्पात      मचायेगा
 बुद्धि  हीन !  अरे,   नादान !
जब    तेरी      बारी    आयेंगी
,तू
  रोएगा  इस  सिर  को थाम,
नियति   नहीं   छोड़ेगी   तुझको
तोड़ेगी
   तेरा   -    अभिमान !
जिसने   भी  सुकर्म   किए  हैं,
देगी
 उन्हें  -  सुयश   सम्मान !
रावण  
 ने  चोरी  की  सीता तो,
अन्त  हो
  गई   उसकी   गीता
छल  से
 पाण्डव- राज  जो जीता
कौरव
 जीवन,  हो
  गया  रीता
सो  कभी  के पाथे कभी जलते हैं,
सभी को कर्मो
 के फल मिलते  हैं !!

 


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